नई दिशा की ओर

आसमां और भी हैं …

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आर.एन. शाही


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माता मेरी पुन: बंदिनी

Posted On: 15 Aug, 2013  
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Others social issues में

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एफ़डीआई की हक़ीक़त

Posted On: 19 Mar, 2013  
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Others बिज़नेस कोच में

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अभिव्यक्ति या अश्लीलता – Jagran Junction Forum

Posted On: 12 Mar, 2013  
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यूँ ही …

Posted On: 13 Feb, 2013  
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आयातित सांस्कृतिक आक्रमण – “jagranjunction Forum”

Posted On: 11 Jun, 2012  
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तू कितनी अच्छी है… तू कितनी भोली है…

Posted On: 13 May, 2012  
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125 Comments

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: Sumit Sumit

फ़िर भी, जब रास्ते खोलने और बनाने की बात है, तो आज नहीं तो कल ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत में अपने पाँव जमाएंगी, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिये । अमेरिका को चीन को टक्कर देने के लिये भारतीय खुदरा बाज़ार की ज़रूरत है, और वह किसी भी तरह इसे हासिल करेगा ही, वह भी अपनी शर्तों पर । विश्वबैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष आदि की चाबी उसके पास है, और वह जो चाहेगा, दुनिया की कर्ज़खोर सरकारों को उसकी शर्तें माननी ही पड़ेंगी । सरकार को खुद अपने दलगत हितों के लिये भी एफ़डीआई के पाँव जमाने में भरपूर मदद करना आवश्यक है । आने वाले चुनावों में उसे वोट चाहिये, और वोट के लिये नोट । भ्रष्टाचार ने सरकारी खजाने में जो छेद बनाया है, उसका रिसाव रोक पाना उसके बूते की बात नहीं है । अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है, रफ़्तार भी शिथिल है । कर्ज के बलपर अर्थव्यवस्था में पैबन्द लगाने के लिये व्याजदर का कम होना अनिवार्य है । एफ़डीआई निवेश से जो पैसे देश में आएंगे, उससे व्याजदर पर थोड़ा-बहुत अंकुश ज़रूर लगेगा, इसकी सम्भावना बनती है । अर्थव्यवस्था में टेक लगाने के लिये अंधाधुन्ध कर्ज़ लेने के भी तमाम खतरे हैं । इससे अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ रैंक कम करेंगी, तो फ़िर एफ़डीआई निवेश हतोत्साहित होगा, जिसका खतरा मोल लेना वर्तमान स्थिति में सरकार नहीं चाहेगी । वह चाहेगी कि विदेशी निवेश के माध्यम से नकद लिक्विडिटी का फ़्लो किसी भी तरह बढ़े, ताकि व्याजदरों पर नियन्त्रण के साथ-साथ बिक्री एवं अन्य माध्यमों से टैक्स की वसूली में भी इज़ाफ़ा हो । इस वक्त लोग मुलायम सिंह की जय बोल रहे हैं और आपने ऍफ़ डी. आई . की बात चला डी आदरणीय श्री शाही जी ! आर्थिक विषय बड़े कठिन होते हैं समझने में और उन्हें समझने के लिए उतनी ही अक्ल की जरुरत होती है जितनी सरकार चलाने के लिए , लेकिन उतनी अक्ल भगवान् देना ही भूल गया ! लेकिन आपने एक मंजे हुए प्रोफ़ेसर की तरह स्पष्ट बात कहने की कोशसिह करी है जो समझ में आ जाती है ! ऍफ़ . डी. आई से किसी को फायदा हो या न हो , लेकिन चीन को फायदा अवश्य होगा ! बहुत सुन्दर लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्रद्धेय सिंह साहब, कोई मंडली में शामिल हो या न हो, हमारा झाल-मंजीरा तो बजता ही रहेगा । जहाँ आवश्यकता होगी, तबले की थाप भी देंगे, पूरे रंगरोगन के साथ । बापू जी की होली पर तो महाराष्ट्र सरकार ने ग्रहण लगा दिया, इसलिये अब उधर की कोई 'आसा' नहीं रही । यह सरकार मरते दम तक भी गरीबों को कुछ न कुछ झटके देकर ही जाएगी, इसलिये हरवक़्त तैयार ही रहना है । माया मुलायम सरकार रूपी रावण द्वारा सीबीआई नामक नागपाश में जकड़े गए कुबेर और शनीचर हैं । जबतक कहीं से प्रकट होकर बजरंग बली इनकी बेड़ियाँ तोड़कर इन्हें आज़ाद नहीं कराते, ये रावण की स्तुति करने को बाध्य हैं । करुणानिधि भी 'कनिया' के कारण नागपाश में जकड़े हैं, फ़िर भी उन्होंने इस समय यदि ऐसा करने का साहस दिखाया है, तो कहीं न कहीं इसमें मैच फ़िक्सिंग की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता । एड्स से टुकड़े-टुकड़े में मर रही सरकार इस समय अवश्यम्भावी दर्दनाक़ और बदनाम मौत मरने से बेहतर समझेगी कि किसी तरह से शहीद होती हुई दिखे, ताकि निकट भविष्य में जनता के बीच जाते समय झारखंड मुक्ति मोर्चा वाला मुँह लेकर न जाना पड़े । आभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

श्रद्धेय शाही साहब, सादर अभिवादन! आपके सम्पूर्ण विश्लेषण युक्त आलेख अत्यंत ही समयानुकूल है!... जिसके लिए इतना हो हल्ला हुआ,... किसी तरह इसे संसद से पास भी करा लिया गया! उसका अभी तक कोई उज्जवल भविष्य तो नहीं दिख रहा ... हमारा देश किस कदर दूसरे धनाढ्य देशों के अधीन होता जा रहा है, वह तो हम सब देख ही रहे हैं. गरीब बेरोजगार नवयुवकों के लिए भी चिंता का विषय है! पर सरकार किसकी सुन रही है? एक एक कर कई घटक दल यु पी ए से अलग होते जा रहे हैं, पर माया और मुलायम नदी के दो किनारे की तरह सरकार को सम्हाले हुए हैं... आज भी करूणानिधि के करुणक्रंदन का कुछ असर होता नहीं दीख रहा!... आगे तो राम ही जाने ... हमलोग अपना होली तो पारम्परिक तरीके से ही मनाएंगे! दो भाइयों के साथ होली का सप्ताह शुरू होता है ...आप अपना मंजीरा सम्हालें! .... इस बार लगता है, आशाराम बापू की होली देखकर ही संतोष कर लेंगे क्या?????

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय शाही जी नमस्कार , क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं । साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है । आपने अच्छा प्रकाश डाला है इस मुद्दे पर ... सादर धन्यवाद...

के द्वारा: Malik Parveen Malik Parveen

श्रद्धेय शुक्ल जी, आप एक विचारक से लगते हैं, अत: आपकी इस हूबहू टिप्पणी का ठीक-ठीक अर्थ मैं आपकी अपनी पोस्ट पर भी नहीं निकाल पाया था । देशज शिल्प या कलाओं का पाश्चात्य संस्कृति से कोई लेना देना है नहीं, परन्तु आखिरी पंक्तियों में धर्म सीखने के आधार पर यदि आपका अभिप्राय यौनशिक्षा से है, तो आपकी बात अवश्य समझ में आती है । दरअसल धर्म के संस्कार तो हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म से सम्बन्धित हो, अपनी रगों में भरकर ही पैदा होता है । वैज्ञानिक भाषा में समझें तो अपने माता-पिता के धर्म वाले जीन उसके शरीर में स्वत: मौज़ूद होते हैं । शेष आदतों को भी उसके पारिवारिक संस्कार समयानुसार विकसित करते चले जाते हैं । बाद में जबतक वह बाहरी दुनिया के सम्पर्क में आता है, ये संस्कार अपनी जड़ें जमा चुके होते हैं, अत: बाहरी माहौल से ताउम्र उसके संस्कार इतने प्रभावित नहीं हो पाते कि उसमें कोई आमूलचूल जैसा परिवर्तन सम्भव हो पाए । हमारे संस्कारों का प्रस्तावित यौनशिक्षा से यहीं पर टकराव होना अवश्यम्भावी है, जिसे न तो हमारे बच्चों का, न ही उनके माता-पिता का जेनेटिक संस्कार सहज स्वीकार कर पाएगा । यौनक्रीड़ा एक सहज प्रवृत्ति है, कोई सिखाने की वस्तु नहीं है, हमारे मंदिरों पर उकेरे गए भित्ति-चित्र भी शायद यही संदेश देते से प्रतीत होते हैं । आपने सही कहा कि हम प्रारम्भिक अवस्था में ही अपना धर्म सीखते हैं । उसी क्रम में ही चारों पुरुषार्थों का जिक्र भी आता है । अर्थात बाल्य-किशोरावस्था में धर्म की दीक्षा, यौवन काल में पुरुषार्थ द्वारा अर्थोपार्जन एवं सुविधासम्पन्न होने के पश्चात काम की साधना कर सन्तानोत्पत्ति करते हुए सृष्टिचक्र को अपना योगदान । चौथा मोक्ष वानप्रस्थ आश्रम में ही सम्भव है, क्योंकि मुमुक्षत्व का बोध ध्यान के बिना सम्भव नहीं है । वानप्रस्थ से पूर्व की अवस्थाओं में हमारी प्रवृत्ति इतनी चंचल होती है कि हम ध्यान लगाकर मुमुक्षत्व की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते । चारों पुरुषार्थों को सिद्ध किये बिना मृत्यु को प्राप्त करने की स्थिति 'अकालमृत्यु' इसीलिये कही गई, क्योंकि इस स्थिति में मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती । इस गहन विषय पर कभी बाद में आपसे चर्चा कर मुझे प्रसन्नता होगी । आभार ! 

के द्वारा:

"साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है ।" आदरणीय शाही जी namaskaar आपके लेख की यह पंक्ति हुबहू मेरे ज़ेहन में उठे विचार से मिलती है. पूरा आलेख पढ़कर वाकया समझना आसान हुआ,आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ.उन शिक्षिका को खजुराहो जैसे पर्यटक स्थान पर भी जाने का फिर कोई हक नहीं बनता और मेडिकल के विद्यार्थी जब मृत शरीर की चीर फाड़ करते हैं तब भी क्या ऐसे ही सवाल उठेंगे मुश्किल तो यही है जहां प्रतिक्रियात्मक होना चाहिए वहां शिक्षक नहीं होते और जहां नहीं होना चाहिए वहां अतिप्रतिक्रियात्मक हो जा रहे हैं. इस मुद्दे पर लिख रही थी तब यही एक बात उठी की खजुराहो या इसी प्रकार के अन्य भित्ति चित्रों को भी कटघरे में ye बुद्धिजीवी वर्ग खडा ना कर दे. आपके सभी आलेख बहुत अच्छे होते हैं . एक अच्छे लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

श्रद्धेया अलका जी, सार्थक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार । यह बहस का विषय हो सकता है कि कामक्रिया पर आधारित हमारी परम्परागत धरोहरों को अश्लील होने के आधार पर कला माना जाना चाहिये, अथवा नहीं । परन्तु यह बहस गौण हो गई, और केंद्रबिन्दु बन गया विद्यार्थी के विरुद्ध काँलेज प्रबन्धन द्वारा लिया गया अन्यायपूर्ण निर्णय । विवाद का केंद्रबिन्दु भी यह कार्रवाई ही है । किसी भी समाज को यह नहीं भूलना चाहिये कि उसकी जीवन-पद्धति का मूल उसकी परम्पराओं में ही बसता है, जो कालजयी होता है । मसलन कोई हिन्दू भारतीय दम्पति चाहे किसी भी देश में जाकर बस जाय, उसके परिवार में सौ वर्ष बाद होने वाली संतान का नाम भी राम, श्याम, गुरमीत और सुरजीत आदि ही रखा जाएगा । जाँन, स्मिथ या अब्राहम नहीं । ऐसा ही कुछ हमारी परम्परागत शैली की कलाओं के साथ भी है । वे जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी । जब विदेशी आक्रांताओं द्वारा अनेक हमलों के बावज़ूद इन्हें समाप्त नहीं किया जा सका, तो ऐसे छोटे-मोटे प्रकरण तो सामने आते ही रहते हैं । धन्यवाद ।

के द्वारा:

सही कहा श्रद्धेय शुक्ल जी । मेरा मानना है कि यौनशिक्षा का शिगूफ़ा एक षड्यंत्र है, जिसके तहत भारतीय नौनिहालों को समय पूर्व ही मैच्योर्ड फ़ील कराकर उस रास्ते पर जाने के लिये बाध्य कर दिया जाय, जहाँ उन्हें नहीं जाना चाहिये । विदेशी कंडोम, वियाग्रा एवं ना-ना प्रकार के गर्भनिरोधक का बाज़ार विकसित कर मुनाफ़ा कमाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपना उत्पाद खपाने के लिये भारत की विशाल जनसंख्या वाले बाज़ार की हमेशा ही तलाश रही है । मानव एवं पशुओं में काल्पनिक बीमारियों का खौफ़ पैदा कर ये हर साल यहाँ दवाएँ बेचकर पहले से ही मालामाल हो ही रहे हैं । हमारा कमीशनखोर तंत्र इनकी मदद को हर वक़्त पलक पाँवड़े बिछाकर इनका इंतज़ार करता रहता है । छात्र का मामला तो सीधे-सीधे अहं के तुष्टिकरण हेतु तिल को ताड़ बनाने का मामला है, जो लज्जाजनक है । आभार !

के द्वारा:

एक विचारोत्तेजक लेख के लिए धन्यवाद..| कुल मिलाकर भारतीयों के चरित्र में छिपे दोहरेपन का ही नमूना है ये| यौन शिक्षा कितना भला करेगी, ये तो वक्त ही बताएगा | उसकी उपादेयता पर विचार से पहले इस पहलू पे कोइ ध्यान नहीं दे रहा है की टीव्ही कल्चर तो दस-ग्यारह के बच्चे को ही पूरी शिक्षा दे दे रहे हैं| समाज के अग्रणी हिस्से के लिए सेक्स कभी समस्या नहीं रहा | और न ही उसे किसी शिक्षा की जरूरत रही है| उनके लिए वह हमेशा ही सेक्स आनन्द और उन्मांद रहा है और उनकी सोच में निचले तबके को उसकी पूर्ती करनी जरूरी है| हमारे देश के लोगों का दिखावटी चरित्र हमेशा ही नई पीढी के लिए परेशानी का सबब रहा है| यदि स्कूल को आपत्ति भी थी तो क्षात्र को समझाया जा सकता था , वनिस्पत फेल करने के,,

के द्वारा:

के द्वारा:

अब फ़िर वही पेचीदा सवाल सामने खड़ा है, कि क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं ।हम अपने अपने हिसाब से हर चीज की परिभाषा गढ़ लेते हैं ! मैं समझता हूँ की उस छात्र का इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि जो उसका विषय है उसमें उसे डीपली जाना ही चाहिए लेकिन अगर किसी को चित्र तक में कामुकता दिखती है तो फिर हम क्यों रजा रवि वर्मा को याद करते हैं ? क्यूँ फिर हम मकबूल फ़िदा हुसैन के लिए टेसुए बहाते हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्रद्धेय कविवर भूषण जी, चिन्ता छात्र के भविष्य की ही है । अन्यथा मंशा तो किसी की कुछ भी हो सकती है । क्या यह सम्भव नहीं कि शिक्षिका मैडम ने भी लड़के से कोई पुरानी खुंदक निकाली हो ? सभी वरिष्ठगण के बयान भी किसी न किसी पूर्वाग्रह की ओर संकेत करते से लगते हैं, जिसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता । आग्रह का प्रतिशोध अतार्किक तरीक़े से किसी छात्र के जीवन के साथ खिलवाड़ कर नहीं लिया जाना चाहिये । दूसरी बात कि आप अभी तक होलिया नहीं रहे हैं, तो यह भी हमारे लिये चिन्ता का एक सबब बना हुआ है । जवाहर भाई की आँखें पथरा गईं, परन्तु आपने बिरहिन की अब तक भी कोई सुध नहीं ली है । इतनी निष्ठुरता क्यों कविवर ? कहीं आपकी मस्ती में उस वर्ष जो मैंने साथ नहीं दिया था, उसका बदला तो शिक्षिका महोदया की तर्ज़ पर नहीं ले रहे ? भाई, उस वक़्त की मेरी मानसिकता को भी तो समझने का कष्ट कीजिये ! उसपर तुर्रे की तरह आपके वरिष्ठ नागरिक महोदय की ईशपुत्री उर्फ़ श्रद्धेया सरिता जी का अकारण मंच से बेमौसम रूठना अलग से खटक रहा है । सादर !

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, प्रणाम. बरसों पहले, विदेशी आक्रान्ताओं की 'कृपा' से, हम अपनी मूल संस्कृति, अपनी मूल सभ्यता से कट चुके हैं. विदेशी शिक्षा प्रणाली, विदेशी रहन- सहन, हम पर थोपा गया- एक सुनियोजित षड्यंत्र की तरह. विदेशी फैक्ट्रियों में बने कपडों तथा विदेशी उत्पादों के प्रति झुकाव, गुलाम मानसिकता के तहत बढ़ता चला गया. फिरंगियों द्वारा 'रायबहादुर' बनाए गये महानुभावों और तत्कालीन उच्चवर्ग के परिवारों में, अपने बच्चों को 'विलायत' में पढ़ाने की होड़ लगी रहती थी. आज भी उसी मानसिकता के तहत देशवासी, 'आयातित नग्नता' को धड़ल्ले से अपना रहे हैं पर अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े भित्तिचित्र उन्हें आपत्तिजनक जान पड़ते हैं. यह दोगलापन किसलिए? दरअसल, हममें से ज्यादातर को यह ही नहीं मालूम कि उस युग में इनकी प्रासंगिकता क्या थी. वर्तमान और अतीत के नैतिक मानदंड, आपस में गड्डमड्ड होकर, दुविधा/ कुंठा का ही सृजन करेंगे. आपने सच कहा- शिक्षिका को यदि परम्पराओं की इतनी ही चिंता थी तो उसे पाठन हेतु ऐसा विषय चुनना ही नहीं चाहिए था और विद्यार्थी की मंशा जानकर ही, उस पर कोई एक्शन लिया जाना चाहिए. एक सार्थक, समसामयिक लेख पर हार्दिक साधुवाद. सादर.

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

बेशक उसके पाठ्यक्रम ने श्रद्धेय पांडेय जी । क्योंकि शरारत अपनी जगह होती है और कैरियर की गम्भीरता अपनी जगह । कोई वयस्क छात्र अपने कैरियर की कीमत पर ऐसी शरारत कदापि नहीं करना चाहेगा । क्योंकि असाइनमेंट मैटीरियल ऐसी वस्तु नहीं है जो अकेले शिक्षिका के स्तर तक ही सिमट कर रह जाने वाली हो । उसे फ़ैकल्टी के अन्य सदस्यों द्वारा देखा जाना भी सम्भावित है, तथा किसी भी स्तर पर सम्भावित विवादास्पद सामग्री के माध्यम से आग में हाथ डालना कोई लड़का चाहेगा, ऐसा मुझे नहीं लगता । वहाँ 'न्यूडिटी' को कला का दर्ज़ा प्राप्त है, तभी तो वह कालेज के पाठ्यक्रम में शामिल है ! और मेरा विचार है कि सह-शिक्षा वाले किसी आर्ट महाविद्यालय में यदि 'नग्नता' विषय को कला मानकर क्लास में उसपर व्याख्यान दिया जाना श्लीलता की श्रेणी में आता है, तो फ़िर कामसूत्र के लघुचित्र अश्लील क्यों मान लिये जाने चाहिये ? आपका कथन बिल्कुल सत्य है कि हमारा मानसिक स्तर अभी यौनशिक्षा जैसे विषय को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की इजाज़त नहीं दे पाएगा । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

परम आदरणीय श्री शाही जी, अभिवादन | न्याय चाहे जिस पलड़े मे भी हो, किन्तु यह बात साफ तौर पर स्पष्ट हो गयी है कि अभी हमारा समाज मानसिक स्तर पर पाठ्यक्रमों मे यौन संबंधी शिक्षा के लिए तैयार नहीं है | इस संबंध मे भारत सरकार की सहमति से यौनचरण की आयु सीमा घटाकर 16 वर्ष किए जाने का निर्णय भी विवादास्पद हो गया है क्योंकि शादी की न्यूनतम उम्र सीमा 18 वर्ष होने से समाज मे अराजकता फैलने एवं अवैध सम्बन्धों को बढ़ावा मिलने का खतरा मौजूद है | दूसरी बात यह भी है कि अगर छात्र ने जानबूझ कर शरारत की हो तो आखिर कौन सी मनोवृति उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है ? मेरा मतलब यह है कि उसे ऐसा संस्कार दिया किसने ? समाज ने अथवा उसके पाठ्यक्रम ने ...

के द्वारा:

आदरनीय शाही जी,मंच पर  (सदा की भांति) एक सशक्त लेख के साथ आपकी उपस्थिति सुखद लगी. गत दिनों उपरोक्त विषय पर जो लेख लिखा था मैंने यही लिखना चाहा था कि समुचित वातावरण के अभाव में प्रदान की गई यौन शिक्षा अपराध तो नहीं रोक सकती हाँ परिपक्वता की स्थिति में इस शिक्षा से यौन रोगों पर नियंत्रण शायद लग सके ,अभी तक हमारे परिवारों में ये चर्चा ही नहीं होती तो यौन शिक्षा समाज कैसे स्वीकार कर सकता है अपरिपक्व आयु में . इस संदर्भ में हमारी  समृद्ध सांस्कृतिक विरासत विश्व प्रसिद्ध है.हाँ इस केस के विषय में समस्या attitude की भी हो सकती है विद्यार्थी ने संभवतः शिक्षिका को परेशान करने के लिए ऐसा किया हो और राजनीति के चलते मामला उछल गया हो

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा:

आदरणीय संतलाल जी, मैं अपने इस अपरिपक्व प्रयास में कहीं न कहीं पकड़ लिया जाऊँगा, इसका अंदेशा तो मुझे था ही । आप जैसे ग़ज़ल के विद्वद्जन से इन पंक्तियों को सार्थकता का प्रमाणपत्र भी मिल पाएगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं कर सकता था । मंच पर मुझे जानने वाले महिला-पुरुष मित्रगण भली-भाँति जानते हैं कि मैं तुकबंदियाँ चाहे जैसी गढ़ लूँ, कविता, शेर या ग़ज़ल आदि मेरे वश के बाहर की वस्तुएँ हैं । मैं इन विधाओं का भरपूर रसास्वादन करने वाला पिपासु रसिक अवश्य हो सकता हूँ, परन्तु इनका साधक बन पाने के योग्य खुद को कभी नहीं मान पाया । मंच से जुड़े मेरे कई अनुज-सह-शिष्यगण शेर-ओ-शायरी व ग़ज़ल की दुनिया में अच्छी पैठ एवं पकड़ रखने वाले, तथा आज उस्तादों के भी कान काटने वाले बन चुके हैं । मैं चाहकर भी कभी उनका हमक़दम नहीं बन पाया, क्योंकि स्वभाव में ही नहीं है । अपनी इसी कमज़ोरी के कारण मैं ग़ज़ल आदि का गुर सिखाने वाली कुछ अच्छी वेबसाइट्स को भी छोड़कर भाग आया, क्योंकि 'क़ाफ़िया' और 'रदीफ़' जैसे शब्द मुझे हमेशा ही काट खाने हेतु दौड़ाते से लगे, जैसे किसी मदरसे के मौलवी साहब सोंटा लिये मेरे पीछे लपके चले आ रहे हों । आशा है आप मेरी मजबूरियों को समझेंगे, और अपना आशीर्वाद फ़िर भी बनाए रखेंगे । आभार !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

आदरणीय शाही जी, तीन शे'रों की ही यह छोटी-सी ग़ज़ल बड़ी साफ-सुथरी, सरल और मीठी है, लेकिन पूरी ग़ज़ल में 'हमनुमाया' बाकी मिसरों के रदीफ़ों जैसे कि 'बढ़ाना, 'फ़साना' और 'रवाना' के साथ तालमेल में बँधा हुआ न होने से खटकता है | या फिर बाकी के भी केवल काफ़िये ( चाहिये ) में बँधे होते | संज्ञान में उर्दू शब्दों की कमी के कारण वज़नदार शब्द सुझा पाना मेरे लिए कठिन है, पर मेरी समझ से यहाँ रदीफ़ का तालमेल कुछ इस कदर होना चाहिए -- "आ जी जाता है फ़िर कोई हम सफ़र रहगुजर का हमपैमाना चाहिये..." पर यह मैं विनम्र सूझ के कारण कह रहा हूँ, सूझा सो कह दिया | आशा है आप अन्यथा नहीं लेगें | रिश्तों में दूरी की चिंता न करने, सफ़र से न कतराने, बीते को न ढोने और निसंकोच आगे बढ़ने की प्रेरणा भरी ग़ज़ल के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आईसीयू वाले गुरुदेव के शीघ्र दर्शन देने की सम्भावना है, ऐसा मैं नहीं कह रहा, ज़रा ध्यान लगाकर सुनें, फ़िर कुछ बताएँ । क्या आपको मेरी तरह दूर नेपथ्य से कुछ भुतहा डरावनी सी किलकारियाँ नहीं सुनाई दे रही हैं ? जैसे दो पहलवान नुमा नवजात शिशुओं की आत्माएँ आपस में वयस्कों के अट्टहास को भी मात देने वाली किलकारियाँ मार-मार कर अपने मंच पर शीघ्र आगमन की सूचना देती सी प्रतीत हो रही हों ? भई, मुझे तो ये आवाज़ें काफ़ी देर से सुनाई दे रही हैं । मेरे रोंगटे खड़े हैं, और टांगों में सूखे पत्ते जैसा कम्पन हो रहा है । स्पष्ट है कि कोई ऐसी शक्ति यहाँ शीघ्र ही प्रकट होने वाली है, जिसकी कमर पर कच्छ, एक हाथ में कृपाण, तो दूसरे में बाँस-लट्ठ, कंधे पर हरिश्चंदी कम्बल और पूरे शरीर पर बिल्कुल ताज़ी चिता-भस्म का रमण होगा । उसके आते ही मंच ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगेगा, फ़लस्वरूप पूरी दीर्घा से वृद्ध, अबला एवं बालवृंद का स्वत: पलायन सुनिश्चित है । शेष बचे लोग दहाड़ें मार-मार कर उसके स्तुति-गान में लग जाएंगे, जो गान और रुदन दोनों का ही सम्मिलित स्वरूप होगा । मुझे यह अवश्यम्भावी होनहार स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है, तो आपको भी ज़रूर दिख रहा होगा । शिव-शिव !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

माँ वाग्देवी के पूजन के पवित्र अनुष्ठान के साथ ही उन्होंने फ़ागुनी बयार को धीमे-धीमे अपनी गति में आ जाने का आदेश भी दे डाला है । अब जम्बूद्वीप के समस्त मानवों का दायित्व बनता है कि अपने-अपने स्तर से वसंतोत्सव को परवान चढ़ाने की दिशा में अग्रसर हों । आपके परमपूज्य 1008 चड्ढीधारी गुरुदेव के बिना कोई उत्सव रंगीन बन ही नहीं सकता, ऐसा देवाधिदेव महादेव ने लगभग उसी समय घोषित कर दिया था, जब उन्होंने सिद्धिविनायक गणपति के 'प्रथम पूज्य' होने की घोषणा की थी । अत: आप सभी चेले-चपाटियों का परम कर्त्तव्य बनता है कि, अपने चिरकुट-धारी गुरुदेव का विधि-विधान पूर्वक आवाह्न करें, और यथाशीघ्र उपस्थिति दर्ज़ कराने हेतु उन्हें हर प्रकार से बाध्य करें ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

एकदम झक्कास तकनीकी अंदाज में कविता लिखी है गुरुदेव| लगता है आप इस बीच अज्ञातवास में रहकर अपना तकनीकी कौशल बढ़ा रहे थे, लेखन में तो आप हमारे गुरु- घं......हैं ही....म्मेरा .....मतलब किसी की दुर्घटना की खबर भी यूं देते हैं कि बंदा सीधे आई सी यू से भी उठकर लड़ने चला आये| और इसका भी भरोसा नहीं है कि खबर सही हो या नहीं, या यहाँ भी अपनी साहित्यिकता से बाज न आये हों| खैर अगर खबर सत्य है तो ईश्वर हमारे "रॉयल लोटस" को शीघ्र स्वस्थ करे जिससे कि "जुबली कुमार" की आवाज सुनने को तरस रहे कानों को सुकून मिले| "मुआफ़ कीजिए कविता की तारीफ़ करने के लायक मैं नहीं, जहां रौशनी हो पहले से ही, वहाँ अँधेरे की जगह बनती ही नहीं..." जय हो बाबा वैलेंटाइन जी महाराज की....

के द्वारा:

मैं नया-नया यहाँ आया था मादाम, इसलिये आपको सचमुच याद नहीं होगा । आपको बताऊँ कि यह मेरी पहली नहीं, बल्कि दूसरी कविता है । पहली वाली का नाम 'यारो मैं भी तो कवि हूँ' था, जिसे एक से अधिक बार स्व. अरे-रे-रे, ज़बान फ़िसल गई, श्रद्धेय पंडित रतूड़ी जी के हाथों पुनर्प्रकाशित होने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है । आज यह राज़ भी उगल रहा हूँ, कि पहली वाली की प्रेरणा-स्रोत भी आप सहित मंच की तत्कालीन ढेर सारी कवियित्रियाँ ही थीं, और आज वाली की तो सिर्फ़ आप और आप मात्र हैं । अच्छी-अच्छी तस्वीरों के साथ सम्मोहक पंक्तियाँ उकेरने की आपकी विधा ने ही कहीं न कहीं मुझे ऐसा करने हेतु प्रेरित किया । तस्वीर के ऊपर लिखने का प्रयोग अवश्य आपसे थोड़ा अलग हटकर है । निशा जी का आदेश कुछ पोस्ट करने का था, और इससे बेहतर इतनी जल्दी कुछ हो भी नहीं सकता था । अब आपकी मनमोहक पंक्तियों की पुन: प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ! आपकी उपरोक्त अर्थपूर्ण पंक्तियों हेतु अलग से दाद सहित धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ ।

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फ़ासले बनते-बिगड़ते रहते हैं सिंह साहब ! अगर कुछ अटल है, तो वह दिलों के रिश्ते हैं, जो दृश्य-अदृश्य हर स्थिति में बा-वज़ूद बने रहते हैं । हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है । हल बैल लेकर शाम को घर लौटने वाले किसान गमछे से पसीना पोंछते चौपाल पर मिलेंगे ही । जिनकी प्रतीक्षा आप कर रहे हैं, वे विगत दिनों गुरदासपुर के पास पंजाब-मेल से गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें गम्भीर स्थिति में अखिल-भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती होना पड़ा । फ़िलहाल खतरे से बाहर स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं, तत्पश्चात लौटने की सम्भावना बनती है । बहुत समझाया कि ट्रेन के फ़ुट-बोर्ड पर खड़े होकर यात्रा न किया करो, लेकिन आप जानते ही हैं, उन्हें भ्रम है कि फ़ुट-बोर्ड पर चलते-चलते जो दूर-दूर तक सरसों के पीले फ़ूल दिखाई देते हैं, उन्हीं में से फ़ुदक कर कभी न कभी वह ज़रूर बाहर आएगा, जिसे उनका हमसफ़र, हमराह, जीवन-साथी और न जाने क्या-क्या बनना है । किसी भी समय काजू खाने आपके यहाँ पहुँचने वाला हूँ, उम्मीद है भाभी ने मेरे लिये अवश्य बचा रखे होंगे । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा:

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

श्रद्धेय भ्रमर जी, बेहतरीन प्रतिक्रिया हेतु आभार । आपने सही कहा, सीना तानकर घूमने के लिये हमारे पास इन मशहूर पंक्तियों के अतिरिक्त और रहा ही क्या है, सबकुछ दूसरों को बाँटने-लुटाने में ही हमने सदा संतुष्टि महसूस की । हमारी यह प्रवृत्ति भी हमारी संस्कृति की ही विशेषता रही है । वे पंक्तियाँ जो सभी जानते हैं, कुछ इस प्रकार हैं- 'जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई, तारों की भाषा भारत ने, दुनिया को पहले सिखलाई, देता न दशमलव भारत तो, यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था, धरती और चाँद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था, सभ्यता जहाँ पहले आई, सबसे पहले जन्मी है कला, अपना भारत वो भारत है, जिसके पीछे संसार चला, संसार चला और आगे बढ़ा, यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया, भगवान करे ये और बढ़े, बढ़ता ही रहे और फ़ूले फ़ले--- है प्रीत जहाँ की रीत सदा …

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आदरणीय शाही जी मुबारक और बधाइयाँ ...ब्लागर आफ दी वीक के लिए ...आज कितनी बार उलझे रहे न जाने मेरी प्रतिक्रियाएं क्यों नहीं जा रही क्या जादू कर रखा है आप ने छू मंतर .... हँसी आती है यह सोच कर, कि हमारे समाज में अब पोर्न संस्कृति भी परदा उतारकर अपनी स्वतंत्रता की मांग करने लगी है, जबकि आज भी हमारा बहुसंख्यक समाज अपनी त्याज्य रूढ़ियों तक से भी बाहर निकल पाने में खुद को असमर्थ पाता है । एक जबरदस्त और सशक्त लेख ....काश लोग इन्ही नजरों से देखें ..अपनी इस धरोहर..प्यारी संस्कृति को ..सच कहा हम सीना ताने इस के बल पर ही तो घुमते हैं और है क्या हमारे पास पचासों साल पीछे सब कुछ ... इस नासूर से सच में दृढ निश्चय ही और प्रबल इच्छा शक्ति जन समर्थन से ही निपटा जा सकता है ... भ्रमर ५

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी , सादर अभिवादन कुछ कारणों वश मंच से दूर रहने के कारण आपके यहाँ बहुत विलम्ब से पहुंची इसलिए क्षमा प्रार्थी हूँ | सर्वप्रथम तो सप्ताह के बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! यही कह सकती हूँ कि आज धन लोलुपता ने मनुष्य को कहाँ से कहाँ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि नैतिकता तो कहीं दिखाई ही नहीं देती गड्ढे में गिरने के बाद ही बुद्धि का एक दरवाज़ा खुलता है.....हमारी अपनी संस्कृति की अपनी अलग ही विशिष्टताएं हैं उन पर गर्व करने के स्थान पर हम पश्चिम की कमजोरियों को अपनाने का प्रयास करते हैं और नैतिक पतन की ओर बढ़ जाते हैं............ पश्चिमी सभ्यता की आयातित संस्कृति के बारे में अति विश्लेष्णात्मक व उत्कृष्ट आलेख के लिए बधाई

के द्वारा: alkargupta1 alkargupta1

श्रद्धेय चौधरी साहब, प्रणाम ! आपने बिल्कुल सही कहा । पुराने समय की स्वप्निल यादें एक टीस, एक हूक सी पैदा करती हैं । काश, कुदरत का कोई चमत्कार हो जाए, और हम एक बार फ़िर उन्हीं दिनों में वापस जा पाते । लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, यह एहसास निराशा भरी मायूसी सा उत्पन्न करता है, और हम यादों में झाँक कर ही थोड़ी देर के लिये आह्लादित हो लेते हैं । मुझे लगता है कि थोड़े पतले पेस्टनुमा हलवे को लपसी कहते हैं । इसी लपसी में कई मसालों सहित हर्रे (हरड़) डाल देने से वह हरा रंग पकड़ लेता था, जो हरियरा कहलाता था । आप ने बचपन में पुत्ररत्न प्राप्त प्रसूता के यहाँ से पास-पड़ोस की कन्याओं द्वारा बाल्टी में कर्छी सहित हरियरे और परात में पूड़ियाँ लेकर बाँटते हुए भी अवश्य देखा होगा । मुझे तो वह स्वाद भुलाए नहीं भूलता । परन्तु पूजा या चढ़ावे के लिये थोड़ा ठोस सा आटे का हलवा ही आज भी चलन में है । आपने महान कथाशिल्पी प्रेमचन्द की याद दिलाकर आँखें नम कर दीं । संयोग देखिये, मैंने माँ द्वारा सरयू माई को कड़ाही चढ़ाने के संदर्भ में सरयू तीर पर बसे जिस कस्बाई शहर का ज़िक्र किया है, उसका नाम बड़हलगंज है । किसी ज़माने में वहाँ के डाकघर में मुंशी प्रेमचन्द के पिता लमही या बनारस से स्थानान्तरित होकर आए थे, और कुछ वर्ष बिना माँ के नन्हें प्रेमचन्द को साथ लिये नौकरी की थी । हमारे लिये तो वह कस्बा इस नाते भी एक तीर्थ के समान ही है । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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'आप आए, तो खयाले, दिल-ए-नासाज़ आया, कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया' । साथ में आपकी हमनशीं चुलबुली इस्माइलीज नहीं देखकर झटका सा लगा है । मेरे साथ ही ये कंजूसी और बेमुरव्वती भला क्यूँ भाई साहब, अब से भी चिपका दीजिये, तो भी सुकून मिल जाएगा । आपका तो अवतरण ही दूसरों का दर्द ओढ़ने के लिये हुआ है, तो फ़िर फ़ितरत से कश्मकश का कोई फ़ायदा नहीं है । आप जैसे हैं, वैसे ही अच्छे लगते हैं, वैसे ही बने रहें । जवाब देने की जहाँ तक बात है, तो क्या बताऊँ, ऐसी मसरूफ़ियत पहली बार झेल रहा हूँ । सुबह तीन से साढ़े पाँच का समय किसी तरह नेट के लिये निकाल पा रहा हूँ, और यह जवाब लिखने में ही वह समय निकल जा रहा है । बेईमान बन गया हूँ । दूसरे ब्लाग्स तक पहुँचने की हसरत लिये ही फ़िर बन्द कर देना पड़ रहा है । खैर, फ़िर मना लूँगा आप सभी को, टाइम-टाइम की बात है । अल्ला हाफ़िज़ ।

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श्रद्धेय चौधरी साहब, प्रणाम ! शुक्र है कि कुछ मान्यताएं कालजयी और सुरक्षा की आवश्यकताएं हुआ करती हैं । इन्हें सामयिक ग्रहण लग सकता है, मिट नहीं सकतीं । जिस कपास को टेरीलीन ने ग्रस लिया था, आज भारत ही नहीं विश्व भर की पसन्द और आवश्यकता बन चुका है । आज काटन से बने कपड़ों की इतनी मांग है, कि कोई भी सिंथेटिक यार्न उसके सामने पानी भरता नज़र आता है । ऐसी ही कालजयी हमारी संस्कृति भी है, जिसके बारे में मशहूर शायर की पंक्तियां आज भी हमारी ज़बान पर आ जाया करती हैं, 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा' । ये आज के दौर के वही दुश्मन हैं, जो हमारी संस्कृति पर निरन्तर हमले किये जा रहे हैं । सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई के जयचन्द हैं ये लोग, जिन्हें अन्तत: मुँह की खानी पड़ेगी । हमने ट्रांसप्लान्टेशन को झेला है, सहन किया है, उसे परखा है, लेकिन अन्तत: हमारी संस्कृति वमन कर इनके विष को अपने शरीर से बाहर फ़ेंक ही देती है । साधुवाद ।

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आयातित पाश्चात्य सभ्यता के व्यापारी आज लियोन जैसी शख्सियतों को सेलीब्रिटी बना गौरव हासिल कर रहे हैं तो आज के सिने और दुसरे पत्रकार भी रोज़ी - रोटी के लिए उसी रंग में रंगे हैं | पित्तर बुद्धिजीवी अपने दांत खो बैठे है तो संतानों में थोड़े - बहुते संस्कारों पर स्वार्थ और भोतिकवाद हावी है | आम जागरूक सामाज तो कहीं भी नज़र नहीं आता । दुष्ट राजनेताओं के सामने भारत माता दुरोपदी की भांति मजबूर नज़र आती है | भगवान् कृष्ण का तो दूर - दूर तक कोई पता नहीं | दुष्ट जरासंध के कारन कृष्ण ने मथुरा छोडनी पड़ी तो दुष्ट नेताओं के कारण बाबा रामदेव को दिल्ली | अरविन्द केजरीवाल को सरकारी नौकरी छोड़ने के बावजूद सिक्यूरिटी का पैसा उधार लेकर चुकाना पड़ा | कांग्रेस रुपी कौरव गिनती के सहारे धृतराष्ट्र - मनमोहन को राजगद्दी पर बिठा काम-चलाऊ सरकार चला कर अपनी - अपनी गोटी फिट कर रहें है | बार - बार मुकरने वाले प्रणब मुकर्जी अब राष्ट्रपति बनने चले हैं | महारथी लालकृष्ण अडवाणी बुढ़ापे के कारण अर्जुन का रोल निभाने में असमर्थ हैं | जेटलीजी अर्जुन का रोल निभा सकते हैं पर पांडवों में फूट देख दुरोपदी स्वयम राजगद्दी के सपने देख रही हैं | कृष्ण का सुदर्शन चक्र गडकरी के हाथ में है तो मोदी द्वारिका गुजरात में होने के कारण कृष्ण का पाञ्चजन्य शंख बजा प्रधान मंत्री पद के लिए बार - बार शंखनाद करते हैं | पोर्न संस्कृति नहीं दुराचार, पापाचार है और अपराध का नंगा नाच है | बहुसंख्यक समाज को अपनी शक्ति को पहचानना चाहिये और संगठित हो कर संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये | धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे अर्थात कर्म के क्षेत्र में आकर अपनी संस्कृति और संस्कारों की रक्षा करनी चाहिये | वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहितः | राष्ट्र की रक्षा के लिए आगे आयो | राष्ट्र हमारी संस्कृति है | राष्ट्र हमारी पहचान है | जागो कहीं देर न हो जाये | त्याज्य रूढ़ियों से बाहर निकल अपनी आर्यन संस्कृति को पहचानो | यह वक़्त सोने का नहीं , यह वक़्त खोने का नहीं , जागो वतन खतरे में हैं, सारा चमन खतरे में है | क्या सत्य ही वर्ग-संघर्ष ने हमारे समाज को अभिजात्य व परम्परावादी खेमों में बाँट दिया है। शेहरी क्षेत्रों में तो ऐसा ही है | चरित्र गिरता रहेगा, देश लुटता रहेगा, जनता कराहती रहेगी, और हम देखते रहेंगे | शासक वर्ग ऐश और विदेशो का भ्रमण करता रहेगा | नेता और उनका गुट अमीर से अमीर और जनता गरीब से गरीब होती जायेगी| तस्लीमा नसरीन बेबाक़ प्रस्तुतियों ने उन्हें अपने देश से निर्वासित होने को बाध्य किया । ‘लज्जा’ का कड़वा घूँट कठमुल्लों के गले से नहीं उतरा | कठमुल्लों ने तसलीमा को तस्लीम नहीं किया, स्वार्थी राजनीतिज्ञों ने नीति त्याग नीति को भाढ़ में झोंक दिया और प्रणब मुकर्जी ने दुशासन की भांति तसलीमा का चीरहरण कर देश निकाला दे दिया | यह सही है की भूमन्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण से आम जनता पीड़ित है खासकर किसान, कामगार, मजदूर और मजबूर | भारत करीबन ७० प्रतिशत गावों में बसता है और ग्रामवासी अधिकतर संस्कारित और स्वावलम्भी हैं और अभी भूमन्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण का प्रभाव कम हैं | ऐसे में पूंजीपति मफिया , सरकारी मफिया, राजनैतिक मफिया और भूमाफिया उनसे उनकी धरती माँ को छीन लेना चाहता है | सरकारी योजनाओं को बेच दिया जाता है और वैस्तड इन्टेरस्त सरकार और सरकारी सांडों की मदद से उनकी जमीन औने - पौने दामों पर खरीद दस गुणा यां उससे भी कही ज्यादा मुनाफा अपनी तेज़ोरियों में भरते चले जाते हैं | धृतराष्ट्र - मनमोहनजी को कुछ भी नज़र नहीं आता | एक तरफ भजन - आरती और दूसरी ओर लैपटाप पर पश्चिमी से लेकर देसी पोर्नस्टार्स के चौरासी आसनों का चस्का हमारी सभ्यता को ले डूबेगा | भगवान् Ram का चित्र पूजा छोड़ रामचरित मानस को अपनाना पड़ेगा | यूट्यूब पर रामायण, महाभारत, गीता, बाइबिल और कुरान से सम्बन्धित आडियो - वीडियो -- सीधे विश्व भर के पोर्नस्टार्स एवं नानस्टार्स के साथ प्राकृतिक - अप्राकृतिक रतिक्रिया का प्रशिक्षण व आनन्द लेने के लिये पलक झपकते पहुँच सकते हैं । अलग - अलग मानसिकता का उत्तर संस्कार ही हैं | यह आपने शालीनता का प्रशंसनीय उधाहरण दिया हमारे परिवारों में पति घर के अन्य सदस्यों की नज़र में रात को सोने के लिये घर से बाहर जाता और रात को घरवालों की नज़र से बच कैसे घर में घुसकर निकल जाता | भूमन्डलीकरण और संचार क्रांति का बाईप्रोडक्ट की इन्फ़ेक्शन से३ बचने के लिये है, हमें अपने संस्कारों ,मूल्यों और गरिमा की रक्षा करनी होगी और विशिष्ट पहचान वाली वैदिक सभ्यता को चरित्र निर्माण द्वारा फिर अपनाना होगा | इसमें ना केवल भारत का अपितु पूरी विश्व बिरादरी का लिये अत्यन्त घातक है कल्याण निहित है | भारत सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों की आध्यात्मिक शिक्षा और सुख-शांति का उपदेश देता रहा है। छ देश अपनी आन्तरिक सांस्कृतिक पहचान को इस महामारी से बचाने के लिये बहुत पहले सजग हो चुके थे, एतद देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना | स्वम स्वम चरित्रेन शिक्षारेंण प्रिथवयाम सर्व मानवः |   मानव सभ्यता ने सामाजिक ढाँचे को मर्यादों में बाँधा और वर्जित कर्मों का निषेद किया जिनके मूल्य अंतरराष्ट्रीय जो अनिवार्य आवश्यक मानव अधिकार हैं | मनुष्य का असली वस्त्र तो उसका चरित्र होता है | सभ्यता, शालीनता और नैतिकता के लिये मनुष्यों के लिये वस्त्र आवश्यक हैं, क्यों की दुसरे प्राणियों की भांति मनुष्य योनी में भी भोग अर्थात यौनिक संस्कार भी निहित हैं | आपने बहुत अच्छा लिखा जिससे मुझे और लिखने की प्रेरणा मिली | धन्यवाद !

के द्वारा:

पूज्यनीय गुरुदेव शाही जी ..... सादर प्रणाम ! मुझको यह उम्मीद कतई भी नहीं थी की बाकी के ब्लागर आफ दा विक के नक्शेकदम पर चलते हुए आप प्रतिकिर्याओ के जवाब न देने की नीति का पालन नहीं करेंगे ..... खैर यह देख कर मन गार्डन -२ हुआ की आपने इस पुराणी परिपाटी कों तोड़ मरोड़कर कर रख दिया है ..... आज के बाद मैं अपनी चुलबुली इस्माइलीज की बत्तीसियाँ चमकाने की बजाय किसी नए ब्लागर का प्रचार और प्रसार किया करूँगा “अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ऐ दिल जमाने के लिए “ “कमजोरों का ह्फ्तावारी सरदार बनने के लिए ढेरों मुबारकबाद” आप जी भर कर रंगदारी (हफ्ता ) वसूले इसी कामना के साथ हार्दिक आभार सहित http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/ (जुबली कुमार जी के पधारने की भी बहुत -२ मुबारकबाद – उनको फेसबुक पर सन्देश दिया है की अपने ब्लॉग पर आपकी जिन पुरानी रचनाओं कों उन्होंने सेव करके रखा हुआ है –जनता की भलाई के लिए उनको आपको लौटा दे )

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

शाहीम जी आटे का हलवा नही  लपसी कहिये लपसी। आपका ब्‍लाग पढने के बाद हमे अपने पुराने दिन याद आ गये। उस समय हम लोग छोटे बच्‍चे थे हमारे बाबा जी श्रीगींनारी का मेला दिखाने हम लोगों को ले जाते थे. उस समय चार आने की जलेबी देते थे। हम दोनो भई जलेबी लेकर एक कोने मे बैठकर बडे चाव से जलेबी खाते थे। शाम को बाबा की उगली थामे थामे पैदल पैदल का घर पहुच गये पता ही नही चलता था। सात किलोमीटर की दूरी कब खत्‍म हुई पता नही चलता था। आज न समाज है न बाबा का स्‍नेह न बाबा की उगली। बेटा गाडी चलाता है कब श्रीगींनारी पहुचे पता नही। अब जलेबी खरीदने और खाने मे शर्म महसूस होती है। बेटा मन्दिर पर नही जाता है । परिक्रमा करने मे शर्म महसूस करता है। दोस्‍तों के साथ पिकनिक मनाने मे रूचि रखता है. मन्दिर मे जाने मे शर्म महसूस करता है। आपका सजीव चित्रण मुंशी प्रेम चन्‍द्र की याद दिलाता है। साधुवाद।

के द्वारा:

के द्वारा:

आप आए हमारे मोहल्ले में बनारसी इमरतियों की खुशबू लेकर, कभी हम आपकी शान, और कभी अपनी फ़टीचर कटी पूँछ को देखते हैं । असली नकली जैसी भी हो, आपकी मौज़ूदगी से माँ-बदौलत की सफ़ेद बालों वाली छाती फ़ूल कर कुप्पा हुई जा रही है । यह दर्ज़ हो गया कि आपका प्रतीक्षित आगमन दारोगा जी के डंडे फ़टकारने से नहीं, बल्कि इस नाचीज़ की अन्तर्नादित पुकार की बदौलत सम्भव हुआ है । लगता है स्वयम्भू दारोगा जी इस चहल-पहल का छुप-छुप कर आनन्द लेने हेतु अपनी फ़ेसबुक वाल की ओट में विश्रामरत हैं, क्योंकि उनका निनाद कहीं गुंजित नहीं हो रहा । खैर, आ ही जाएंगे कभी अपनी चुलबुली इस्माइलीज की बत्तीसियाँ चमकाते । आपकी शिल्पकारी उधार लेकर मेरे चेहरे का मिलान अपने नौनिहालों से करवाते हुए मेरी बूढ़ी भावनाओं का शोषण कर जब मुझे घसीट लाए हैं, तो खुद कहाँ छुप पाएंगे । उन्मुक्तता प्राणी की आन्तरिक प्रकृति है, जो नैसर्गिक होती है । मानव सभ्यता ने उसे सामाजिक ढाँचे को मजबूती प्रदान करने के लिये कुछ मर्यादा व वर्जनाओं की परिधि में आबद्ध किया, क्योंकि यह एक अनिवार्य आवश्यकता है । हमारे अतिरिक्त कोई प्राणी वस्त्र धारण नहीं करता, क्योंकि वह हमारे जैसे बौद्धिक और सामाजिक स्तर का नहीं है । कुछ लोग अब समाज को आदिमकाल की तरह फ़िर से वस्त्रविहीनता की ओर घसीटने पर आमादा हैं, जो भारत जैसे मर्यादित संस्कृतियों वाले देश में कौन स्वीकार करना चाहेगा । आभार ।

के द्वारा:

गुरुवर को सादर प्रणाम, क्षमाप्रार्थी हूँ कि व्यवसायिक एवं अन्यान्य व्यस्तताओं एवं बाध्यताओं के कारण समय से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सका। सर्वप्रथम तो मैं भी पुष्टि कर दूं कि यह मैं ही हूँ कोई और नहीं (जिसका प्रमाण है मेरा लॉग इन करके कमेन्ट करना)। किसी भी विषय पर आपकी पारद्रष्टा पारखी नज़र किसी भी प्रशंसा की मुहताज नहीं है। आपका यह लेख विशेष रूप से पाश्चात्य सभ्यता से आयातित कु सांस्कृतिक तत्वों के पीछे छुपे वास्तविक कारणों पर प्रकाश डालता है। वैसे एक बात कहना चाहूँगा कि जिस चीज़ पर जितना पर्दा डालने का प्रयास किया जाएगा वह परदे के पीछे उतनी ही अधिक उघड़ती रहेगी। भारतीय समाज में उन्मुक्तता प्राचीन काल से रही है किन्तु वह मर्यादा के भीतर थी। और यह तो सर्वविदित है कि अति सर्वत्र वर्जयते। अंततः आपके रुतबे को सलाम करूँगा क्यूंकि दो ही पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं का शतकीय औसत सारी कहानी खुद ब खुद ही कह रहा है। बधाईओं सहित,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा:

भाई चन्दन जी, यह एक स्वस्थ और प्रबुद्ध बहस है, तो फ़िर किसी के लिये भी अन्यथा लेने जैसी कोई बात है ही नहीं । आखिर मंच का मक़सद भी तो यही वैचारिक मंथन एवं आदान प्रदान है ! आपने हमारे समाज में अन्तर्निहित विद्रूपताओं का ज़िक्र किया, यह तथ्यपरक और सर्वविदित भी है । बेटियाँ बेची जा रही हैं, यह भी कोई नई बात नहीं है । हमारे अतिरिक्त भी कई सभ्यताओं में दासियों, कनीज़ों के रूप में कन्या विक्रय का रिवाज़ रहा है, जिसे किसी हिस्से में सामान्य, तो कहीं आपत्तिजनक नज़रों से देखा जाता रहा है । गणिका या वेश्यावृत्ति भी किसी न किसी रूप में समाज के एक निन्दनीय ही सही, परन्तु अनिवार्य अंग के रूप में पोषित होती ही रही है । बलात्कार और हरण हर युग में होते रहे हैं । परन्तु मुझे नहीं लगता कि किसी भी काल में इन वृत्तियों-बुराइयों को समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक मान्यता प्राप्त हुई हो । यहाँ हमारी बहस इस बात पर केंद्रित है, कि क्या इस प्रकार की निन्दनीय और वर्जित वृत्तियों को हमें आज एकाएक आधुनिकता के नाम पर सामाजिक रूप से सम्मानजनक मान्यता देते हुए धारण कर लिया जाना चाहिये ? बिकाऊ मीडिया और निहित स्वार्थी तत्वों के अतिरिक्त कौन हजम कर पाएगा इनकी मान्यता को ? आपके अनुसार तो कामकला को भी अब अन्य ललित तथा नृत्यकलाओं के सदृश्य एक सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य मान्यता दे दी जानी चाहिये । ये कौन सी कला है, जिसका सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करना आवश्यक हुआ जा रहा है ? आपको याद है न, जब मुम्बई में ताजमहल जल रहा था, एक फ़िल्मकार महोदय पर वहाँ अपनी सनसनीखेज़ फ़िल्म में डालने लायक फ़ुटेज तैयार करने योग्य दृश्य शूट करने की सम्भावना तलाशने का आरोप लगा था ! सनी को स्थापित करने का प्रयास करने वाले भी वही लोग हैं । यदि सड़क पर कहीं बलात्कार होता हुआ इन्हें दिख जाय, तो इनके लिये वह अपराध कम, शूटिंग मैटीरियल अधिक होगा । इनको अपनी प्रोफ़ेशनल संतुष्टि तभी हासिल हो पाएगी, जब बलात्कार और कामकला को सड़क पर प्रदर्शित किये जाने योग्य वस्तु बनाने में कामयाब हो जाएंगे । लानत है ऐसे लोगों पर, आप जाने-अंजाने में जिनके कुत्सित प्रयासों की तारीफ़ किये जा रहे हैं । धन्यवाद ।

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन निश्चय ही भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है. देर हो चुकी है. कब चुपके से दीमक लग गयी, लोग जान नहीं सके. आपके विचारों का सदैव सम्मान किया है और यथा संभव पालन भी किया है . अपने दोष को प्रथम स्वीकार करना नैतिक रूप रूप से एक प्रकार का प्रायश्चित ही है. देर हो चुकी, बदलाव की निंदा भी करते रहे और व्यापक रूप से स्वीकार भी करते रहे. सब कुछ आप के सामने है. इसे भी देखिएगा मान्यता मिल जायेगी. हाथ पे हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा. जो कुछ चोरी छुपे हो रहा है. खुल के होगा. शादी की है तो बच्चे भी होंगे. भले ही पालने में नानी याद आ जाये. सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव , मनोरंजन के सस्ते साधन न होना भी आबादी बढ़ने का प्रमुख कारण है. जागरूक होने के कारण मेने २ बेटियों के बाद आपरेशन कराया . फिर भी तीसरी संतान ने जनम लिया पुत्र रूप में. बताइए दोषी कौन . बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बन्ने पर बधाई. मुबारक हो आपको खिताब ये सुहाना मैं खुश हूँ बहुत मेरे लिखे पर न जाना बजे शहनाई और द्वारे गीत ये बजवाना अकेले यूँ कभी न निकलना ए राही निकले थे अकेले पकड़ गए शाही ढूढ़ रहे थे कब से जे. जे. के सिपाही बधाई बधाई बधाई. क्षमा प्रार्थी हूँ किसी भी त्रुटी हेतु

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: vinitashukla vinitashukla

आदरणीय शाही जी, सादर प्रणाम, सब से पहले सप्ताह भर की बादशाहत की बहुत बहुत बधाई...वैसे आप की लेखनी किसी उपाधि की मोहताज नहीं है... भारतीय समाज में फैलती बेशर्मी की प्रतिस्पर्धा कोई आयातित बीमारी नहीं है बल्कि मुझे ये एक प्रकार का म्यूटेशन लगता है..... लड़कियां पागल हो गयी हैं और अपने पागलपन से ही अपने लिए और दूसरों के लिए जीविका जुटा रही हैं...माना की विकास के लिए परिवर्तन ज़रूरी है लेकिन परिवर्तन अगर नकारात्मक है तो फिर विकास की जगह विनाश ही होना तय है.....मुझे इसीलिए सेक्स स्कैंडल्स में फसने वाली लड़कियों से कभी सहानुभूति नहीं होती...... most of the time they opt it as their own choice........ आपने सच कहा है, इच्छाशक्ति ही एकमात्र उपाय है.......

के द्वारा: sinsera sinsera

शाही जी , आप एक अग्रज है और में केवल तर्क दे रहा हूँ कृपा मेरे विचारों को अन्यथा ना ले , पर माफ़ कीजिये व्यापारीकरण और कला , संस्कृति के आदान प्रादान में काफी अंतर है , हमे ये जानना आवश्यक हो जाता है की दोहरी मानसिकता क्या है , आज हमारे अपने देश में बेतिओं के साथ बलात्कार हो रहा है , और हम सन्नी लिओन पर हामारे संस्कृति हनन का आरोप लगा कर बचना चाह रहे है ,, ------------ आपको तो ज्ञात ही होगा हमारी नाक के ठीक निचे ,दिल्ली ,बम्बई , कलकत्ता जाने कितने शहरो ,कस्बो , में देह व्यापार का अड्डा चल रहा है , जिसमे अमूमन महिला स्वेच्छा से नहीं प्रवेश करती बल्कि उसे धकेला जा रहा है , ---- बेटियाँ बेचीं जा रही है , मारी जा रही है , क्या इन सब के लिए सन्नी लिओन ही जिम्मेदार है , क्या हमारे खुद के देश में पूनम पाण्डेय , मल्लिका शेहरावत जैसी अभिनेत्रियाँ नहीं है , क्या राजकपूर साहब ने अपनी अभिनेत्रियाँ का खुलापन नहीं दिखाया था , अत में समझता हूँ हम अपनी कटु कमजोरी को किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप कर के नहीं बचा सकते है , यदि इक अंश भी मेरी बातों से आपको आहात पंहुचा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ , और इक बात हर बच्चे की सोच उसके माँ बाप की सोच का ही दर्पण होता है , पर क्या इक व्यक्ति की बुराई (आपकी नजर में ) इतनी हावी हो सकती है की पूरी संस्कृति को नष्ट कर दे ,

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

आपकी बातें तर्क़संगत हैं मीनू जी । अक्सर ऐसे प्रयास होते रहे हैं, जिनका मक़सद मात्र सामयिक लाभ उठाना होता है, और बाद में बातें आई गई हो जाती हैं । दिक्कत तब होती है, जब इनके स्थापित होने के खतरों से लापरवाह समाज इनको इनके मन की करते रहने दे, और सामूहिक विरोध न दर्ज़ किया जाय । विरोध के बाद ही इनके प्रयासों को झटका लगता है, और ये पाँव पीछे समेटने को मजबूर हो पाते हैं । मुखालफ़त के अभाव में ये और आगे बढ़ेंगे, और तब शायद इनके हाबी होने को रोक पाना कुछ ज़्यादा दुरूह होगा । अतीत में कई फ़िल्में ऐसी बनाई गईं, जो सामाजिक मान्यताओं को सीधे-सीधे चोट पहुँचाती थीं । समाज ने टिकट खिड़की पर उनकी जो गत बनाई, कि प्रतिष्ठा बचाने के लिये इन फ़िल्मों को कलात्मक या समानान्तर फ़िल्मों का दर्ज़ा दिलवाकर निर्माता-निर्देशकों की दोबारा ऐसा प्रयोग करने की हिम्मत नहीं हुई । सौभाग्य से हमारा समाज आंतरिक रूप से इन मामलों में अत्यधिक संवेदनशील और जागरूक है । आपकी बुद्धिमत्तापूर्ण टिप्पणी के लिये आभार ।

के द्वारा:

भाई संतोष जी एवं श्रद्धेय जवाहर जी, आप दोनों का ही चिन्तन हमारी वर्तमान सामाजिक राजनीतिक विवशता को प्रतिबिम्बित करता है । जिसमें राजनीतिक विवशता एक ओढ़ी हुई लाचार विवशता है । व्यवस्था बनाना उसी की जवाबदेही है, जबकि समाज के हाथ कई जगह कानूनी विवर के कारण लाचार हो जाते हैं । हम सीधे-सीधे किसी के मौलिक अधिकारों का अपहरण नहीं कर सकते, जिसका बेजा फ़ायदा घुसपैठ संस्कृति के ठेकेदार उठा रहे हैं । मीडिया सहित हर संसाधन बिकाऊ बनकर उनका सहयोगी बन जाता है । राजनीति अपनी सुरक्षा के लिये आज हर चीज़ पर प्रतिबंध लगाने के लिये उतारू है, यहाँ तक कि आमजन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी । परन्तु ऐसे मामलों में उसकी आँखें हमेशा बन्द हो जाती हैं । दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है । धन्यवाद ।

के द्वारा:

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

चन्दन जी, मैं आपके व्यक्तिगत विचारों एवं रुचि की क़द्र करता हूँ, क्योंकि किसी विचार से सहमति हो या असहमति, हर विचार अपनी एक अलग अहमियत रखता है । जहाँ तक मेरी अपनी सोच या विचार की बात है, मैं इस प्रकार के सांस्कृतिक अतिक्रमण के विरुद्ध हूँ, और हमेशा रहूँगा । आपका मानना सही है कि हमारे मूल्य मान्यताओं की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि किसी सांस्कृतिक आक्रमण से धराशायी हो जायँ, परन्तु इतिहास गवाह है कि जब-जब हमपर ऐसे आक्रमण हुए हैं, हमें भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है, सदियों तक एक से दूसरी संस्कृतियों की गुलामी में विवशतापूर्ण जीवन जीना पड़ा है । हमारे अपने ही खून को बाँट कर उनमें आयातित संस्कृतियों का कुछ ऐसा बीजारोपण किया गया, जिसकी फ़सल हम निरन्तर काटते रहने को लाचार हो चुके हैं । क्या यह दंश कुछ कम रहा है, कि आप एक और आयातित सभ्यता की हिमायत करने की वक़ालत कर रहे हैं ? ‘मेहमाँ जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है’ की मान्यता हमारी एक भावनात्मक मान्यता रही है । ईस्ट इंडिया कम्पनी ने हमारी इस भावनात्मक कमज़ोरी का जो फ़ायदा उठाया, क्या आप उससे अनभिज्ञ हैं ? वह छद्म रूप से व्यापार करने हेतु मेहमान बनकर हमारे देश में आई थी, हमने उसे हर प्रकार की स्वतंत्रता दी, जिसके परिणाम स्वरूप कालान्तर में उसने हमें ही गुलाम बना लिया । हमने एक आयातित संस्कृति को अपने ऊपर हाबी हो जाने दिया । आक्रमणकारी मुगलों ने जो किया, उसके परिणामस्वरूप हमारा अपना समाज ही दो संस्कृतियों में विभक्त हो गया । हमने सबको अपने भीतर समाहित किया, फ़िर भी हमारी मौलिक संस्कृति यदि अक्षुण्ण बनी रही, तो यह हमारी सांस्कृतिक मजबूती का प्रमाण है । परन्तु हमारी जड़ें निरन्तर प्रहार से कमज़ोर हुई हैं, यह तो हमें अब मान ही लेना चाहिये । इसका सबसे बड़ा कारण हमारी संस्कृति का उदारवादी दृष्टिकोण ही रहा है, जिसे आप आगे भी जारी रख कर इसकी बची-खुची मौलिकता पर एक और प्रहार कराए जाने की हिमायत कर रहे हैं, जिसका समर्थन कम से कम मैं व्यक्तिगत तौर पर कभी नहीं कर पाऊँगा । आज हमारे समाज में दोहरी मानसिकता रखने का एक फ़ैशन सा चल पड़ा है । घर में हमारी मान्यताएँ कुछ और हैं, तो बाहर सड़क पर कुछ और । इस प्रकार की मानसिकता और उससे उत्पन्न अ-स्थाई विचार कभी भी सर्वमान्य मूल्य और मान्यता का स्वरूप धारण नहीं कर सकते । पूरी पारदर्शिता और ग्राह्यता के साथ जन्म लेने वाले विचारों को ही हम आज तक अपना आदर्श बनाने योग्य मानते आए हैं । मैं आप से एक निहायत ही निज़ी प्रश्न पूछना चाहता हूँ चन्दन जी । वह यह कि, क्या आप इसी दृढ़ता और साफ़गोई के साथ अपने माता-पिता, पत्नी, पुत्र और पुत्री के समक्ष भी सनी लियोन या फ़िर पोर्न संस्कृति को भारत में उसे महत्व दिये जाने, या उन्हें अपनी पूरी वल्गरिटी के साथ खुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी दिये जाने की हिमायत कर पाएंगे ? यदि आपका उत्तर पूरी ईमानदारी के साथ ‘हाँ’ में है, तो मुझे मानना होगा कि आप दोहरी मानसिकता के साथ जीने वाले शख्स नहीं हैं । और यदि आपका उत्तर किंचित संकोच से भी सिक्त है, खुद अपनी अन्तरात्मा के समक्ष भी, तो फ़िर आप स्वयं तय कर लें कि आपके विचारों के संदर्भ में इस देश की बहुसंख्य सामाजिक राय क्या होगी ? हमें याद रखना चाहिये कि मनोरंजन तथा व्यक्तिगत आनन्द के दृष्टिकोण से हमारा दिल बहुत कुछ चाहता है, मांगता है, परन्तु हमारा समाज हमें वह वस्तुएँ बिल्कुल हमारे हिसाब से दे पाना स्वीकार नहीं करता । हम चाहते हैं कि सार्वजनिक पार्क की बेंच पर टांग पर टांग चढ़ाकर सुस्ताते हुए सिगरेट के छल्ले उड़ा पाते, लेकिन वहाँ पहले से ही ‘धूम्रपान निषेध’ का बोर्ड लगा पाते हैं । हम चाहते हैं कि ट्रेन की बर्थ पर यात्रा करते अपनी पत्नी या प्रेमिका को आलिंगनबद्ध कर एक किस कर पाते, परन्तु दूसरे यात्रियों की घूरती आँखें हमें ऐसा करने से रोक देती हैं । जो लोग पोर्न संस्कृति को हमारी मर्यादाओं के भीतर जीने की अभ्यस्त संस्कृति के ऊपर थोपने के हिमायती हैं, वे हमारे समाज की मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते, यही सत्य है । आभार !

के द्वारा:

श्रद्धेय शाही साहब, सादर अभिवादन! हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं जहाँ से लौटना शायद संभव न हो ..... पर शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन शायद कोई नयी रोशनी दिखा पाए..... यहाँ पर मैं संतोष जी के विचार से सहमत हूँ . पहले के पाठ्यक्रम में रामायण, महाभारत के अंश, पौराणिक कथाओं का समावेश होता था. मैंने पढ़ा था -- शिवाजी की माँ बचपन से ही शिवाजी को रामायण महाभारत की कहानिया सुनाकर उन्हें प्रेरित करती थी ...... आज कितनी माताओं को रामायण महाभारत के बारे में जानकारी है? ....वो तो भला हो रामानंद सागर और और बी आर चोपड़ा को जिन्होंने घर-घर में टी वी के माध्यम से ही लोगों को रामायण महाभारत से अवगत करा दिया. पर वही बुध्धू बक्सा आज बिग बॉस जैसे सीरियल के माध्यम से हमारी पुरानी संस्कृति पर हमला कर रहा है .. जिम्मेदार कौन है? प्रश्न गंभीर है ... समय काफी आगे निकल चुका है...... फिर भी आश का दमन नहीं छोड़ना चाहिए! चिंतनीय विषय की प्रस्तुति के लिए आपका आभार !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

शाही जी, मुझे तो पॉर्न स्टार को मिलने वाली लोकप्रियता का विरोध करना उसके अधिकारों पर हमला करने जैसा है, और इक झूठे पाखण्ड जैसा ही लगता है ,जब इस देश में हर किसी को अपनी अभिव्यक्ति की मौलिक स्वीकृति है ,तो निश्चित ही यह नैतिक हमला है, किसी भी विषय को पसंद न पसंद करने का अधिकार हमारा हो सकता है, हालाकिं हम में से बहुतरे इन पोर्न फिल्मो का छुप छुप के आनंद उठा चुके है , ------ अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से पॉर्न फिल्मों जैसे पेशे में आता है या न्यूड फोटोशूट करवाता है तो क इसे उसका व्यक्तिगत मसला समझा जाना चाहिए, क्यूंकि क्या हमने उस व्यक्ति की मुलभुत आवश्यकताओं को या उसकी जरूरतों को पूरा करने के पर्याप्त अवसर पैदा किये है , यदि नहीं तो किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का अधिकार हमारा नहीं है -- हमारे भीतर ही है अच्छा ,बुरा .सही. गलत हमे इस बात को तलाशना होगा की क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है , जो बाह्य सभ्यता ,संस्कृति के प्रभाव में बिखर जाए , --- भारत ही वो जगह है जन्हा काम क्रीडा का सबसे बड़ा ग्रन्थ कामसूत्र लिखा गया , में तो इसे बदलते समाज की उची होती उदार सोच ही कहूंगा जो आज हम हर मेहमान का उन्मुक्त भाव से स्वागत कर रहे हैं

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

परम  श्रद्धेय शाही जी भारत  में बिग  बोस  जैसे सीरियल  का उद्धेश्य क्या था मैं नहीं समझ  पाया और सन्नी लियोन  को उसका हिस्सा बनाने का आशय  भी मैं नहीं समझ  पाया। हम  सब उस  समय  खामोश रहे, संभवतः हमारे अंदर भी इस  तरह के दृश्य  देखने की ललक  थी। या मीडिया हमारे ऊपर इतना हावी हो गया कि वह जैसा चाहता है हमें घुमा देता है। जो कार्य  पहले हमारे तथाकथित  धर्मगुरु करते थे वही काम  आज  मीडिया कर रहा है।  तसलीमा ने जो कहा है सत्य कहा है, उसने हमारी कुंठित  एवं दोहरी मानसिकता वाली सोच  पर प्रहार  किया है।  उन्होंने  वही कहा है जिसका कल  दूरगामी परिणाम  होना है। मुझे लगता है कि यदि  सब कुछ  इसी खामोशी के साथ  होता रहा तो निश्चित  ही कालान्तर में  हमारी सोच  भी फिल्मी दुनियाँ के लोंगो ( महेश भट्टजैसे) की तरह हो जायगी। सराहनीय आलेख  के लिये बधाई........

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

श्रद्धेय सर ,.सादर प्रणाम सुन्दर बेबाक विवेचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,.. भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान को भयानक खतरे की आहट सुननी चाहिए किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं लगता है ,..यह पतन बहुत पहले शुरू हो गया था जब हमारी शिक्षा व्यवस्था आयातित हुई ,जहाँ नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं रही ,..समाज में जो शक्ति और सम्मान पा गया उसे खुद को बचाए रखने की चिंता से ही मुक्ति नहीं ,....निजी आनंद के सामने बाकी सभी चीजें छोटी हो गयी ,..अब संचार क्रांति ने सभी बचे बंधन खोल दिए हैं उन्मुक्तता ही पहचान और शान बनती जा रही है ,..धार्मिक स्वभाव और अधार्मिक आचरण समाज को कितना विकृत करेगा यह तो समय के गर्भ में है ,...दृढ इच्छाशक्ति कहाँ से आएगी जब हमाम में लगभग सभी नंगे हैं ,.जिन हुक्मरानों को आदर्श बनना चाहिए वो खुद अनैतिक और विदेशी सोच के गुलाम हैं ,...शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के बिना कोई रास्ता मिलना दुरूह ही लगता है ....

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

पूज्यनीय गुरुदेव शाही जी ..... सादर प्रणाम ! जैसा की आपने फरमाया है की घर के एक कमरे में भक्तिगान और भगवान का स्तुतिगान तो दूसरे किसी में घर के ही किसी सदस्य द्वारा सन्नी जैसी किसी हिरोइन के रूप का रसपान ..... अब इन दोनों ही कमरों के बीच वाले कमरे में इन दोनों गुणगाणों को मिलाकर कोई भी बीच का रास्ता निकालना बहुत ही खरतनाक हो सकता है ..... मैंने एक फिल्म में देखा था की अपने भैया और भाभी को धोखा देने के लिए बन्द दरवाजे के पास अन्दर की तरफ अगरबती जला कर + सी.डी.प्लेयर पर धार्मिक भजन चला कर वोह महाशय अपनी टांग पर टांग चढ़ा कर मजे से सिगरेट के काश लगा रहे थे .... वैसे यह भी अत्यन्त दृढ़ इच्छाशक्ति का ही एक कमाल कहा जाना चाहिए ........ कोटिश आभार और नमन :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय , बहुत ही सटीक और सीधे मष्तिष्क तक पहुँचाने वाला विश्लेषण है . विदेश याने अमेरिका हो या यूरोप , अच्छी संस्कृति भी है , जिसमें श्रमशील जनता के संघर्ष हैं , सामाजिक समस्याओं पर अच्छी फ़िल्में हैं , सामाजिक कार्यकर्ता हैं , पर वो बाजार का हिस्सा नहीं बन सकते और आसानी से नहीं बिक सकते और पश्चिम के सौदागरों को पैसा कमा कर नहीं दे सकते , इसलिए वे उसका निर्यात भी नहीं करते और हमारे देश के सौदागर उसका आयात नहीं करते | बाजार के साथ बाजारी संस्कृति ही आयेगी | थाईलेंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जहां माँ बाप तक पैसा कमाने के लिए अपनी लड़कियों को पर्यटन के नाम पर पोर्न व्यवसाय में भेजना खराब समझना बंद कर दिए हैं | इतने सुन्दर आलेख के लिए आपका साधुवाद |

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी, मैं भी सीमित लिखता हूँ और संभवतः आप भी कभी कभी आते हैं अतः आपके किसी दुसरे तीसरे लेख को ही पढ़ रहा हूँ! विषय से पहले आपकी लेखन शैली की मुक्तकंठ प्रसंशा करना चाहूँगा जिसमें यथार्थतः लेखन स्वयं अपनी जिह्वा से बोलता प्रतिबिंबित होता है| ब्लॉग्गिंग ने लेखकों के नाम पर भीड़ अवश्य जुटा दी है किन्तु मौलिकता विरल हो गई है| यह संस्कृति निरंकुश होती प्रवत्तियों और बाजारवाद का ऐसा चक्रव्यूह है जिसे वेध कर निष्कलंक मनुष्य के रूप में विकसित हो पाना आज के युवा के लिए असंभव तुल्य हो गया है| दोनों अन्योन्याश्रित हैं| भौतिक शरीर की प्राकृतिक आवश्यकताएं निरंकुश होती हैं तो चेतन के अस्तित्व को ही मृतप्राय कर देती हैं.., दुर्भाग्य से वही हो रहा है|

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

मां ...ओह मेरी मां, मां ...ओह मेरी मां, तुझसे हि तो है ये मेरी खुशियों का ये जमाना, बचपन मे वो तेरा मेरी अंगुलियों को पकड मुझे चलना सिखाना, तेरा वो अपनी आंचल मे मुझे दर्द मे भी सुकुन से सुलाना, तेरी ममता का कोई अंत नहि ये तुमसे दूर होके मैंने जाना, आज भी याद है मुझे वो बार बार तेरा मुझे अपने सिने से लगाना, जब दुनिया सोति थि सुनि रातो मे तब तेरा मेरे लिये लोरी सुनाना, आसमां मे बिजलि कडकते हि वो तेरा मुझे झूले से उठा अपनी गोदि मे झूलाना, बचपन मे धूप तले वो तेरा मुझे अपने आंचल मे छिपाना, मुझे अब भी याद है मेरे दर्द से तेरी आंखो मे आंसुओं का आना, मां ...ओह मेरी मां, तेरी हि आंचल को मैंने आज तक अपनी पुरी दुनिया जाना. लेखक : रोशन धर दुबे लेखन तिथि : 1 जनवरी 2012 आपका लेख पड के मुझे अपना पुराना लेख याद आ गया बस इसे आप सभी के सामने प्रस्तुत कर रहा हुं..! आसा करता हुं आप सभी को पसंद आयेगा...!  शुक्रिया आपको जो आपने मेरे दिल मे एक बार फिर मां शब्द का भाव जगाय, क्युंकि लम्बे अर्से से मै मां से दुर हुं..मगर दिल से नहिं

के द्वारा: Roshan Dhar Dubey Roshan Dhar Dubey

भाई साहब, हमारी विशाल भारत भूमि विभिन्नताओं से भरी हुई है, आप जानते ही हैं. कहावत है कि हर नौ कोस पर भाषा बदल जाती है, रीति रिवाज बदल जाते हैं. उत्तरी बिहार से लेकर पूरब का लगभग आधा उत्तर प्रदेश भोजपुरी, मैथिली, तथा अवधी आदि भाषाएँ बोलने वाला क्षेत्र है, जहां का अधिकांश संस्कार और रस्मोरिवाज प्राय: मिलता जुलता पाया जाता है. 'इतनी ममता नदियों को भी, जहां माता कह के बुलाते हैं, इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं.' हमारी इस शस्य श्यामला धरती पर ही देखने को मिल पाता है, दुनिया में और कहीं नहीं है. अब जितने देवता, उतने किस्म की पूजा. सरयू माई या गंगा मैया को पियरी, सेहरा आदि चढाने की परम्परा एक शुद्ध क्षेत्रीय परम्परा है, राष्ट्रीय नहीं. शेष जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, पूजा की पद्धति भी उसी हिसाब से बदलती रहती है, जो कालान्तर में एक परम्परा का रूप ले लेती है. कुछ ऐसा ही होगा, माँ होती तो पूछकर आपको बता देता. उस समय मुझे सिर्फ आम (हलवा-पूरी) खाने से मतलब था, पेड़ गिनने से नहीं. शायद आप समझ गए होंगे.

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी ..... सादर प्रणाम ! आदरणीय शाही जी ...... सादर परनाम ! आपने अपनी पूज्य माता जी के साथ बिठाये अनमोल पलों को हम सभी के साथ सांझा किया ..... आज पहली बार आपकी जुबानी सरयू मैया को सेहरा बाँधने की बात पता चली ..... इसके लिए हम आपके आभारी है क्योंकि आज तक किसी ने भी इस रस्म के बारे में अपनी यादों को हमसे सांझा नहीं किया था ..... लेकिन एक बात समझ में नहीं आई की मैया को तो चुनरिया चढ़ाई जाती है फिर यह सेहरा चढ़ाने (बाँधने का क्या प्रयोजन ) क्या इसीलिए तो माता उसको बाँधने में रुकावट पैदा कर देती है ..... खैर यह बात तो आप और मैया जी ही जाने मुझ नादान अबोध बालक को यह सब कैसे मालूम हो सकता है .... (कभी ग्यानी जी के जीते से भी मिलवाये तो आपकी महती किरपा होगी ) आपकी पूज्य माता जी को नमन सहित आपका आभार मुबारकबाद सहित

के द्वारा:

माँ एक ऐसा विषय है जिस पर लिखने के लिए सभी के पास कुछ न कुछ अवश्य होता है..... पर अपनी भावनाओं को इतने सुंदर शब्दों मे बांध पाने के सामर्थ्य हर किसी मे नहीं होती ........ इसलिए कुछ लोग इस दिन भी माँ जैसे विषय को केवल दूसरों के लेखों पर ही महसूस कर आनंदित हो लेते हैं........... कल से इस पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश कर रहा हूँ......... पर हर बार किसी न किसी कारन चूक जा रहा हूँ......... कभी शब्द नहीं मिलते तो कभी समय........... " आँख में जलती लकड़ी के धुएं की चुभन के बावज़ूद.......... "  इस तरह की कई घटनाएँ आपके लेख को पढ़ते हुए जब आँखों से सामने से होकर गुजरती तो अचानक स्क्रीन का दृश्य कुछ धुंधला हो जाता और फिर प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द भावनाओं मे बह जाते......... जबरदस्त वापसी .......... और एक बेहतरीन दिन और बेहतरीन लेख के साथ......

के द्वारा: Piyush Kumar Pant Piyush Kumar Pant

श्रद्धेया विनीता जी, तब और अब के भारतीय समाज में एक बड़ा फ़र्क़ यह भी आया है, कि अब हमें पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित ये मदर्स डे, फ़ादर्स डे, वैलेन्टाइन्स डे आदि रास आने लगे हैं, और हमारे समाज में भी इनकी सार्थकता बढ़ने लगी है । ज़्यादा दिन नहीं हुए जब हम इन दिवसों की आलोचना करते पश्चिम का मज़ाक़ उड़ाया करते, और इन्हें कथित विकसित देशों के चोंचले समझते थे । तब हमारे ज़ेहन में ऐसी कल्पना भी नहीं थी, कि कभी अपने माता-पिता, भाई-बंधुओं या किसी भी प्रियजन को याद करने के लिये किसी बहाने या विशेष मुहूर्त की आवश्यकता भी पड़ सकती है । अफ़सोस, और दुर्भाग्य भी, कि आज हम उस दौर के बीच से गुजर रहे हैं । अब जब अपनों से मिलन होता है, तो हम पूर्व की तरह अपनी स्मृतियाँ टटोल कर पूर्वजों की वह तमाम यादें, जिनपर कभी ठहाके लगते, तो कभी पलकें भींग जातीं, नहीं दोहरा पा रहे हैं । चाहकर भी नहीं । इससे आगे मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि डर है कि खुद को कोसने लगूँगा ।

के द्वारा:

के द्वारा:

हे J.J. भैया तोहे पियरी चढ़इबो ....... पूरा भईलो हमरो सपनवां... हाय राम! आज 'मदर्स डे' के दिन इतनी प्यारी अनुभूति होगी सोचा न था! ...... हम कहते थे न! ....गुरुओं के गुरु शाही साहब हम सबसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकते! उनको अपनी मिट्टी से , माँ से और अपने लोगों से अगाध प्रेम है! ....अब गुरुदेव के साथ शाही साहब को साष्टांग दंडवत कहता हूँ! शाही साहब ने जो अपनी माँ के बारे में बताया बहुत कुछ मेरे साथ भी वैसा ही होता था .... मैं माँ को छोड़कर अलग नहीं रह सकता था. अंतिम समय में माँ मेरे पास थी और मैं माँ के पास था. मुझे भी अंतिम क्षणों में ही कुछ दिन सेवा का अवसर मिला था और वह चलते फिरते स्वर्ग सिधार गयी थी! आज भी वह मेरे सपनों में हमेशा आती है. वह किसी खास दिन का इंतज़ार नहीं करती! मेरी भी बहुत सी यादें है, जिन्हें फिर कभी बाटूंगा! फिलहाल तो गले मिलने का समय है....जागरण मंच के सभी ब्लोग्गर बंधुओं और बहनों से निवेदन है, ... मंच की मर्यादा बनाये रखें और और बरिष्ठ जनों का सम्मान यथासंभव अवश्य करें! शालीन शब्दों का प्रयोग हो और समालोचना भी मर्यादित भाषा में हो! अगर मुझसे भी कोई गलती होती है तो अवश्य बताया जाय! फिलहाल शाही जी का हार्दिक अभिनन्दन और गुरुदेव को वंदन!- जवाहर.

के द्वारा: jlsingh jlsingh




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