नई दिशा की ओर

आसमां और भी हैं …

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तू कितनी अच्छी है… तू कितनी भोली है…

Posted On: 13 May, 2012 Others में

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       प्राय: पुराने समय की सभी की माँ सीधी ही होती थीं, या होती हैं, परन्तु मेरी माँ कुछ ज़्यादा ही सीधी थीं । इतनी कि कभी-कभी कोफ़्त होती कि आज के युग में ऐसा भी क्या सीधा होना, कि कोई जो चाहे समझा ले और फ़ायदा उठा ले । अपने जीवन के बीच-बीच के कुछ वर्ष ही मुझे माँ के साथ रहने का मौक़ा मिला था, और आज इस एहसास से परम संतोष होता है, कि माँ के आखिरी वक़्त में मुझे उनकी सेवा का भरपूर मौका भी मिला, साथ ही उन्होंने अपनी अन्तिम साँस भी मेरी मौज़ूदगी और सेवा के दौरान ही ली थी । संयोग या दुर्भाग्य कहा जाय, पिताजी या मेरे बड़े भाई साहब को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाया,  माँ के आकस्मिक निधन तथा अलग-अलग स्थानों पर काफ़ी दूर होने के कारण । अन्य संस्कार ही उनके हाथों सम्पन्न हो पाए ।

      बचपन के दिनों में हमारा सबसे पसन्दीदा समय वह होता था, जब सरयू माई को सेहरा चढ़ाने का कार्यक्रम बनता । कार्यक्रम की प्रमुख संचालिका तो घर की मालकिन दादी (ईया जी) होतीं, परन्तु क्रियान्वयन की बागडोर माँ ही संभालतीं । पाँच मील दूर सरयू के तीर तक जाने के लिये किसकी लढ़िया (बैलगाड़ी) जाएगी, उसमें बैल अपने वाले जुतेंगे, या गाड़ी वाले के, कौन-कौन महिलाएं और बच्चे तिरपाल ढंकी लढ़िया के अन्दर बैठकर जाएंगे, तथा कौन-कौन से पुरुष सदस्य लढ़िया के साथ साइकिल से या पैदल चलेंगे, यह सारा फ़ैसला ईया जी लेती थीं । वही यह भी तय करतीं कि इस बार कड़ाही चढ़ाने का पड़ाव सरयू तीर के किस हिस्से की तरफ़ होगा । कड़ाही चढ़ाने अर्थात सरयू माई को चढ़ाए जाने वाली सामग्री पूड़ी, सब्ज़ी और शुद्ध देसी घी से बने आटे के हलवे को तैयार करने की ज़िम्मेदारी माँ सम्भालतीं । आँख में जलती लकड़ी के धुएं की चुभन के बावज़ूद हम कड़ाही के पास ही बैठे माँ को हलवा-पूरी बनाते देखते रहते, और सरयू माई को चढ़ने से पूर्व ही देसी घी की वातावरण में फ़ैलती खुशबू का जी भरकर लुत्फ़ उठाते । फ़िर सारे पकवान सहित घर से ही माई को चढ़ाने के लिये लाई गई तैयार पियरी (पीले रंग एवं हल्दी से रंगी धोती, जिसके नाम पर एक भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ भी बन चुकी है) और सेहरे के फ़ूल, तथा सरपत और मूंज से बटी हुई बहुत लम्बी रस्सी के साथ पूरा लावलश्कर एक बड़ी सी नाव पर सवार होकर सरयू माई को सेहरा बाँधने के लिये धार के बीच उतर जाता । नदी में उतरने से पूर्व रस्सी का एक छोर इस पार गड़े एक खूंटे के साथ बाँध दिया जाता, और मंसूबा यह होता कि दूसरा छोर उस पार पहुँचकर दूसरे खूँटे के साथ बाँध कर माई का सेहरा पूरा करना है । लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाया । सरयू माई के काफ़ी चौड़े पाट के बीच या तो कभी मंझधार में, या उनकी बहुत कृपा हो गई, तो दूसरे किनारे से कुछ ही दूर रहते रस्सी टूट जाती । फ़िर भी यह मान लिया जाता था कि माई ने सेहरा स्वीकार कर लिया है, और नाव वहीं से वापस इस किनारे पर लौट आती ।

      इस नाव यात्रा में मेरा व्यक्तिगत संस्मरण मात्र वह एहसास है, जो तब माँ के प्रति उपजती खीझ, परन्तु आज उस ममत्व को सोचकर भर आती आँखों के साथ पैबस्त है ।  जैसे-जैसे नाव धार के बीच गहरे उतरती जाती, नाव के चारों ओर किनारे बैठे बड़े लोगों के बीच जाकर उन्हीं की तरह सरयू माई की लहरों का आनन्द लेने के लिये मेरी अकुलाहट भी बढ़ती जाती । लेकिन माँ ने मेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होने दी । मैं रो-रो कर छिटकने के लिये मचलता जाता, और माँ मुझे उतनी ही दृढ़ता के साथ अपने कलेजे से लगाकर भींचती जाती, कि कहीं उसका लाल अपनी अबोध चपलताओं के कारण उसकी गोद से छिटक कर सरयू माई की उफ़नती धार में न समा जाय । मुझे आज ये पंक्तियाँ याद आती हैं–

‘अपना नहीं तुझे सुख-दुख कोई,

मैं मुस्काया तू मुस्काई, मैं रोया तू रोई,

मेरे हँसने पे, मेरे रोने पे, तू बलिहारी है,

ओ माँ… ओ माँ… !’

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125 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

R S chaudhary के द्वारा
June 17, 2012

शाहीम जी आटे का हलवा नही  लपसी कहिये लपसी। आपका ब्‍लाग पढने के बाद हमे अपने पुराने दिन याद आ गये। उस समय हम लोग छोटे बच्‍चे थे हमारे बाबा जी श्रीगींनारी का मेला दिखाने हम लोगों को ले जाते थे. उस समय चार आने की जलेबी देते थे। हम दोनो भई जलेबी लेकर एक कोने मे बैठकर बडे चाव से जलेबी खाते थे। शाम को बाबा की उगली थामे थामे पैदल पैदल का घर पहुच गये पता ही नही चलता था। सात किलोमीटर की दूरी कब खत्‍म हुई पता नही चलता था। आज न समाज है न बाबा का स्‍नेह न बाबा की उगली। बेटा गाडी चलाता है कब श्रीगींनारी पहुचे पता नही। अब जलेबी खरीदने और खाने मे शर्म महसूस होती है। बेटा मन्दिर पर नही जाता है । परिक्रमा करने मे शर्म महसूस करता है। दोस्‍तों के साथ पिकनिक मनाने मे रूचि रखता है. मन्दिर मे जाने मे शर्म महसूस करता है। आपका सजीव चित्रण मुंशी प्रेम चन्‍द्र की याद दिलाता है। साधुवाद।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    श्रद्धेय चौधरी साहब, प्रणाम ! आपने बिल्कुल सही कहा । पुराने समय की स्वप्निल यादें एक टीस, एक हूक सी पैदा करती हैं । काश, कुदरत का कोई चमत्कार हो जाए, और हम एक बार फ़िर उन्हीं दिनों में वापस जा पाते । लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, यह एहसास निराशा भरी मायूसी सा उत्पन्न करता है, और हम यादों में झाँक कर ही थोड़ी देर के लिये आह्लादित हो लेते हैं । मुझे लगता है कि थोड़े पतले पेस्टनुमा हलवे को लपसी कहते हैं । इसी लपसी में कई मसालों सहित हर्रे (हरड़) डाल देने से वह हरा रंग पकड़ लेता था, जो हरियरा कहलाता था । आप ने बचपन में पुत्ररत्न प्राप्त प्रसूता के यहाँ से पास-पड़ोस की कन्याओं द्वारा बाल्टी में कर्छी सहित हरियरे और परात में पूड़ियाँ लेकर बाँटते हुए भी अवश्य देखा होगा । मुझे तो वह स्वाद भुलाए नहीं भूलता । परन्तु पूजा या चढ़ावे के लिये थोड़ा ठोस सा आटे का हलवा ही आज भी चलन में है । आपने महान कथाशिल्पी प्रेमचन्द की याद दिलाकर आँखें नम कर दीं । संयोग देखिये, मैंने माँ द्वारा सरयू माई को कड़ाही चढ़ाने के संदर्भ में सरयू तीर पर बसे जिस कस्बाई शहर का ज़िक्र किया है, उसका नाम बड़हलगंज है । किसी ज़माने में वहाँ के डाकघर में मुंशी प्रेमचन्द के पिता लमही या बनारस से स्थानान्तरित होकर आए थे, और कुछ वर्ष बिना माँ के नन्हें प्रेमचन्द को साथ लिये नौकरी की थी । हमारे लिये तो वह कस्बा इस नाते भी एक तीर्थ के समान ही है । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

मनु (tosi) के द्वारा
June 3, 2012

आदरणीय सर (शाही जी ) आपकी बेहद मार्मिक रचना लेख के सह पढ़ी ये चार लाइने नहीं अपितु सागर है जिसमे अन्तर्मन डूब चुका है ,, रचना मे जो कुछ भी आपने अनुभव बांटे उन्हे पढ़कर लगा कि मैं कसी और लोक मे पहुँच गयी हूँ ॥ मेरे लिए सब नया है ,, पर पढ़ते-पढ़ते लगता है ,, मैं भी उसे जीने लगी , सबकुछ जीवंत सा … धन्यवाद ऐसा लेख देने के लिए …!!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    मनु जी, देर से जवाब दे पाने के लिये खेद है । अपको ये चार लाइनें विशेष रूप से पसन्द आईं, जानकर अत्यन्त प्रसन्नता हुई । बहुत-बहुत धन्यवाद ।

pawansrivastava के द्वारा
May 26, 2012

ताज्जुब की बात है की जब आप इतना अच्छा लिखते हैं तो फिर लिखने में किफ़ायत क्यूँ ? एक हीं पोस्ट ….यह तो हम जैसे पाठकों से अन्याय है ..जबकि हौसला आफजाई करने में आप पीछे नहीं रहते …… लेखकों का उत्साह वर्धन करते हुए खूब कलम चलाते रहते हैं ….अबकी कुछ मेरे फरमाइश /गुजारिश पे भी अगर हो जाये तो बड़ी मेहरबानी .

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    आपके सुझाव का स्वागत. अमल का प्रयास होगा. आभार.

Mohinder Kumar के द्वारा
May 23, 2012

शाही जी, भाव भरी रचना, बचपन में बहुत सी बातें ऐसी होती है जो मासूम मन समझ नहीं पाता है परन्तु समय के साथ जब हम स्वंय मां बाप बन जाते हैं तो सब कुछ स्पष्ट लगने लगता है कि उस समय माता पिता का किसी बात से क्या आशय था. और “मां” तो सबसे ऊपर होती है.. उसे कैसे बिसराया जा सकता है.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    प्रशंसनीय उद्गार हैं मोहिंदर जी. आभार.

jlsingh के द्वारा
May 23, 2012

चाहे जितनी बार पढूं, सिन्धु न मनहीं समाय! वक्ता श्रोता मुग्ध हो, प्रभु के गुण ही गाय ! ‘ईश पुत्री’ बेचैन हैं करें हैं सबसे आस ! गुरुजन, जे जे मौन है, मानवता शर्माय! ‘दारोगा’ पद छीन लिया डंडा ताकत हीन! अब क्यों करें प्रलाप सब, समझें अर्थ महीन!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत देर से पहुंचा. क्षमा कर दें.

swadha के द्वारा
May 22, 2012

माँ मेरे दर्द कि दवा सी है और मेरी राह के काँटों में एक दुआ सी है वो मुझे छांह सी लगती है घनी धूप में भी और मेरे वास्ते अल्लाह की रजा सी है ॉ

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 24, 2012

    भावभीनी प्रतिक्रया हेतु आभार स्वधा जी.

Roshan Dhar Dubey के द्वारा
May 22, 2012

मां …ओह मेरी मां, मां …ओह मेरी मां, तुझसे हि तो है ये मेरी खुशियों का ये जमाना, बचपन मे वो तेरा मेरी अंगुलियों को पकड मुझे चलना सिखाना, तेरा वो अपनी आंचल मे मुझे दर्द मे भी सुकुन से सुलाना, तेरी ममता का कोई अंत नहि ये तुमसे दूर होके मैंने जाना, आज भी याद है मुझे वो बार बार तेरा मुझे अपने सिने से लगाना, जब दुनिया सोति थि सुनि रातो मे तब तेरा मेरे लिये लोरी सुनाना, आसमां मे बिजलि कडकते हि वो तेरा मुझे झूले से उठा अपनी गोदि मे झूलाना, बचपन मे धूप तले वो तेरा मुझे अपने आंचल मे छिपाना, मुझे अब भी याद है मेरे दर्द से तेरी आंखो मे आंसुओं का आना, मां …ओह मेरी मां, तेरी हि आंचल को मैंने आज तक अपनी पुरी दुनिया जाना. लेखक : रोशन धर दुबे लेखन तिथि : 1 जनवरी 2012 आपका लेख पड के मुझे अपना पुराना लेख याद आ गया बस इसे आप सभी के सामने प्रस्तुत कर रहा हुं..! आसा करता हुं आप सभी को पसंद आयेगा…!  शुक्रिया आपको जो आपने मेरे दिल मे एक बार फिर मां शब्द का भाव जगाय, क्युंकि लम्बे अर्से से मै मां से दुर हुं..मगर दिल से नहिं

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 24, 2012

    सराहनीय भावाभिव्यक्ति हेतु हार्दिक आभार .

Rajkamal Sharma के द्वारा
May 22, 2012

हार्दिक आभार :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-)

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 24, 2012

    आभार हेतु आभार .

Akram Ali के द्वारा
May 18, 2012

आदरणीय श्रीमान जी, आपका “माँ से जुडी यादे” ब्लॉग पढ़ा. बेहद अच्छा लगा. और सबसे अहम् बात, जिसको कहना चाहता हूँ, वह यह है की अपने इस लेख से माँ की ममता का जो रूप पाठको के समक्ष रखा है वह वास्तव में वास्तविक व अतुलनीय है. इसके लिए आपका धन्यवाद्.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 18, 2012

    श्री अकरम अली जी, संवेदनशील प्रतिक्रिया के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

Tufail A. Siddequi के द्वारा
May 17, 2012

आदरणीय शाही जी सादर अभिवादन, मंच पर आपका पुनः स्वागत है. साथ ही माँ पर लिखे आपके इस सुपरहिट पोस्ट के सुपरहिट होने और साथ ही दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित होने के लिए आपको ढेरो मुबारकबाद. आपने सच कहा माँ आखिर माँ ही होती है. इस जैसा दूसरा कोई नहीं. अपनी यादों को हमसे साझा करने के लिए शुक्रिया. http://siddequi.jagranjunction.com

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 18, 2012

    तौफ़ील साहब, ब्लाग पर आने, व प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये आपका हार्दिक आभार !

MAHIMA SHREE के द्वारा
May 16, 2012

आदरणीय सर , सादर नमस्कार .. आपकी पहली रचना मैंने ओबिओ पे पढ़ी थी .. यादे .. आज पहली बार jj आपकी दूसरी रचना पढ़ रही हूँ … बेहद खूबसूरती से आपने इस बार भी अपने माँ और गंगा मैया को जोड़ते हुए आपने बचपन में जिए पलो को हमारे साथ साँझा किया और गंगा मैया को सेहरा चढ़ाने का सारा विवरण हमारी आँखों में जीवंत हो उठा जब की हम जानते भी नहीं थे …. आपको हार्दिक बधाई और बहुत-२ धन्यवाद .

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 17, 2012

    आपकी भावपूर्ण प्रतिक्रिया के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद महिमा जी । मेरी वहाँ की पोस्ट याद रखने के लिये भी धन्यवाद । वह मेरी शादी के समय का संस्मरण था, भोजपुरी गायक बशीर खान से सम्बन्धित, और यह माँ से जुड़ी बचपन की यादों से है । आभार !

dineshaastik के द्वारा
May 16, 2012

आदरणीय शाही जी आपका देर से स्वागत  करने के लिये प्रथम  तो क्षमा प्रार्थी हूँ। मेरा मानना है कि यदि कहीं खुदा तो केवल  माँ है, इसके अतिरिक्त और कोई नहीं । मैंने जब भी ईश्वर का स्मरण  करने का प्रयास  किया मेरे स्मृति पटल  पर माँ की ही छवि आ   जाती थी।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 16, 2012

    श्रद्धेय दिनेश जी, हमें अस्तित्व प्रदान करने वाला यदि ईश्वर है, तो माँ को उसका दर्ज़ा स्वत: प्राप्त हो जाता है । इस अर्थ में आपका कथन बिल्कुल सत्य है । आगमन हेतु आभार !

sdvajpayee के द्वारा
May 15, 2012

 पुनरागमन से तसल्‍लीबख्‍स खुशी हुई। श्रीगणेश मां से किया यह और अच्‍छा लगा। संसार का यही सबसे सहज,सर्वप्रिय और सम्‍मानित शब्‍द और रिश्‍ता है। अपने आप में बीजमंत्र । मां कहते-सुनते ही एक  ऊष्‍मा का स्‍फुरण होता है।  एक आग्रह। आपके डिलिटेड ब्‍लाग के कई आलेख बेजोड और संग्रहणीय थे।  मिल सकते हों तो  तो पुस्‍तकीय स्‍वरूप  देने का प्रयास करिएगा।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 16, 2012

    आदरणीय वाजपेयी सर, सादर प्रणाम ! पहले भी, और आज भी, किसी भी ब्लाग पर आपका आशीर्वाद प्राप्त हो जाने के बाद लगता है कि स्वाध्याय पूर्ण हुआ । आज की खुशी तो कुछ विशिष्ट ही है, क्योंकि लम्बे अर्से के बाद प्राप्त हुई है । जहाँ तक मुझे याद है, मेरे लगभग सभी ब्लाग समसामयिक विषयों पर आधारित थे, अत: कहानियों को छोड़कर कोई संग्रहणीय स्तर का रहा हो, ऐसा मुझे नहीं लगता, आपका प्यार है जो इस योग्य समझता है । हाँ, उनपर दर्ज आप महानुभावों की बहुमूल्य टिप्पणियों को खोने का दुख अवश्य है, जिसकी रिकवरी किसी हाल में अब सम्भव नहीं रही । हार्दिक आभार !

JJ Blog के द्वारा
May 15, 2012

आदरणीय आर.एन शाही जी आपका ब्लॉग “मां से जुड़ी यादें” नाम से दिनॉक 15 मई 2012 को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. इस हेतु आपके पास सूचना आपकी मेल आई डी पर भेजी जा चुकी है. मंच की तरफ से आपको हार्दिक बधाइयां धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    काफ़ी दिनों बाद अपनी वापसी के तत्काल बाद जागरण जंक्शन परिवार से यह सम्मान प्राप्त करना मुझे अभिभूत कर रहा है, और मेरे लिये एक बहुमूल्य संस्मरण के समान है । इस हेतु मैं मंच के प्रबंधन, संचालन मंडल तथा अपने तमाम एडीटोरियल व रीडर ब्लागर्स के प्रति एतद्वारा कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ, क्योंकि छोटी या बड़ी कोई भी उपलब्धि बिना सभी के सहयोग, प्यार, व विश्वास के हासिल नहीं होती । साभार !

    rajkamal के द्वारा
    May 15, 2012

    आदरणीय शाही जी को इस “शाही- सम्मान” मिलने पर हार्दिक बधाई और जागरण जंक्शन का हार्दिक धन्यवाद (आंवले का खाया और राजकमल का कहा हमेशा बाद में ही पता चलता है )

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 16, 2012

    मुझे तो इसमें गलत कुछ भी नहीं दिख रहा । सभी जानते हैं कि आपके द्वारा लाकर खिलाए गए आँवले के फ़लस्वरूप ढेर सारे अवतार आज धरती पर किलकारियाँ मार रहे हैं । जिस ललना को आपने अलग-अलग दो ललनाओं के हिस्से के आँवले से तोड़कर दो टुकड़ा खिलाया, उसने दो हृष्टपुष्ट अवतार एकसाथ प्रकट किये । हमें आपकी क्षमताओं पर नाज़ है मान्यवर !

Dr S Shankar Singh के द्वारा
May 15, 2012

प्रिय शाही जी, सादर नमस्कार. जागरण जंक्शन पर आपकी वापसी पाकर बहुत ख़ुशी हुई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    श्रद्धेय डाक्टर साहब, प्रणाम ! मैं स्वयं भी आप सभी से पुन: मिलकर अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ । आभार !

div81 के द्वारा
May 15, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर प्रणाम मंच पर आप को फिर से देख कर बहुत खुशी हुई आप का स्वागत है :) स्मृति के चिन्ह बहुत गहरे होते है और ये माँ को समर्पित आप के इस ब्लॉग से समझ आ गया | मैं रो-रो कर छिटकने के लिये मचलता जाता, और माँ मुझे उतनी ही दृढ़ता के साथ अपने कलेजे से लगाकर भींचती जाती, कि कहीं उसका लाल अपनी अबोध चपलताओं के कारण उसकी गोद से छिटक कर सरयू माई की उफ़नती धार में न समा जाय | बहुत ही खूबसूरती के साथ यादो का पिटारा आप ने खोला इन यादो को मंच मे साझा करने के लिए और मंच मे बड़े प्यारे तरीके से वापसी करने के लिए आप का आभार |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    आप सभी का स्नेह-बन्धन मुझे लौटने के लिये बार-बार विवश कर रहा था दिव्या जी, और जीत अन्तत: भावनाओं की ही होती है, अहंकार की नहीं । आभार !

yamunapathak के द्वारा
May 15, 2012

aadarneeya shaahee सर,आपने इस ब्लॉग से चौकीया और विन्ध्याचल पर चढ़ाए जाने वाली कढाई की भी यादें मेरे ज़ेहन में ताज़ा कर दी.बहुत पहले जाना हुआ था. शुक्रिया.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    वही कड़ाही है यमुना जी, जो हर माई को चढ़ती रही है । कड़ाही में छानकर पकवान के रूप में हम अपने किसी भी इष्ट को दरअसल अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं, खाते तो सबकुछ अन्तत: हम ही हैं । धन्यवाद !

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य" के द्वारा
May 15, 2012

प्रथम तो आदरणीय नए सिरे से स्वागत है , अच्छा लगा | सच है , भगवान की सूरत तेरी सूरत से क्या अलग होगी , ओ माँ | हार्दिक बधाईयां |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    श्रद्धेय शुक्ल जी, हम एक बार फ़िर एक मंच पर एक साथ हैं । माँ के माध्यम से सदा शुभ ही होता रहा है । आभार !

May 14, 2012

आदरणीय आर.एन. शाही सादर प्रणाम माँ की ममता को बहुत अच्छे तरीके से पेश किया है बधाई आपका मेरे ब्लाग पे स्वागत है मेरा लास्ट ब्लाग पढ़े और अपने विचार दें

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    आपके ब्लाग पर एकबार ट्राई किया था, परन्तु लोगिन नहीं था इसलिये फ़ेल हो गया । लोगिन कर पुन: पहुँचूँगा । धन्यवाद ।

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
May 14, 2012

प्यारी प्यारी है ओ माँ ….नाव के चारों ओर किनारे बैठे बड़े लोगों के बीच जाकर उन्हीं की तरह सरयू माई की लहरों का आनन्द लेने के लिये मेरी अकुलाहट भी बढ़ती जाती । लेकिन माँ ने मेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होने दी । मैं रो-रो कर छिटकने के लिये मचलता जाता, और माँ मुझे उतनी ही दृढ़ता के साथ अपने कलेजे से लगाकर भींचती जाती,.. माँ को नमन ..शाही जी इसीलिए तो माँ की ममता का कोई सानी नहीं जग में ..देवी ईश्वर कुछ भी संज्ञा दी जाती है … जय श्री राधे आप के दर्शन को सब लालायित थे …माँ को नमन .. भ्रमर ५

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    लालायित चाहे जो भी रहा हो, लेकिन आपने कलेजे पर सवार होकर जो हुलकारा लगाया, उससे घबराकर मुझे गाड़ी को तुरन्त बैक गीयर देना पड़ गया । बहुत-बहुत धन्यवाद, आपको भी, और आपके गुरुदेव को भी ।

rajkamal के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी ….. सादर प्रणाम ! आदरणीय शाही जी …… सादर परनाम ! आपने अपनी पूज्य माता जी के साथ बिठाये अनमोल पलों को हम सभी के साथ सांझा किया ….. आज पहली बार आपकी जुबानी सरयू मैया को सेहरा बाँधने की बात पता चली ….. इसके लिए हम आपके आभारी है क्योंकि आज तक किसी ने भी इस रस्म के बारे में अपनी यादों को हमसे सांझा नहीं किया था ….. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई की मैया को तो चुनरिया चढ़ाई जाती है फिर यह सेहरा चढ़ाने (बाँधने का क्या प्रयोजन ) क्या इसीलिए तो माता उसको बाँधने में रुकावट पैदा कर देती है ….. खैर यह बात तो आप और मैया जी ही जाने मुझ नादान अबोध बालक को यह सब कैसे मालूम हो सकता है …. (कभी ग्यानी जी के जीते से भी मिलवाये तो आपकी महती किरपा होगी ) आपकी पूज्य माता जी को नमन सहित आपका आभार मुबारकबाद सहित

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    भाई साहब, हमारी विशाल भारत भूमि विभिन्नताओं से भरी हुई है, आप जानते ही हैं. कहावत है कि हर नौ कोस पर भाषा बदल जाती है, रीति रिवाज बदल जाते हैं. उत्तरी बिहार से लेकर पूरब का लगभग आधा उत्तर प्रदेश भोजपुरी, मैथिली, तथा अवधी आदि भाषाएँ बोलने वाला क्षेत्र है, जहां का अधिकांश संस्कार और रस्मोरिवाज प्राय: मिलता जुलता पाया जाता है. ‘इतनी ममता नदियों को भी, जहां माता कह के बुलाते हैं, इतना आदर इंसान तो क्या, पत्थर भी पूजे जाते हैं.’ हमारी इस शस्य श्यामला धरती पर ही देखने को मिल पाता है, दुनिया में और कहीं नहीं है. अब जितने देवता, उतने किस्म की पूजा. सरयू माई या गंगा मैया को पियरी, सेहरा आदि चढाने की परम्परा एक शुद्ध क्षेत्रीय परम्परा है, राष्ट्रीय नहीं. शेष जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, पूजा की पद्धति भी उसी हिसाब से बदलती रहती है, जो कालान्तर में एक परम्परा का रूप ले लेती है. कुछ ऐसा ही होगा, माँ होती तो पूछकर आपको बता देता. उस समय मुझे सिर्फ आम (हलवा-पूरी) खाने से मतलब था, पेड़ गिनने से नहीं. शायद आप समझ गए होंगे.

Piyush Kumar Pant के द्वारा
May 14, 2012

माँ एक ऐसा विषय है जिस पर लिखने के लिए सभी के पास कुछ न कुछ अवश्य होता है….. पर अपनी भावनाओं को इतने सुंदर शब्दों मे बांध पाने के सामर्थ्य हर किसी मे नहीं होती …….. इसलिए कुछ लोग इस दिन भी माँ जैसे विषय को केवल दूसरों के लेखों पर ही महसूस कर आनंदित हो लेते हैं……….. कल से इस पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश कर रहा हूँ……… पर हर बार किसी न किसी कारन चूक जा रहा हूँ……… कभी शब्द नहीं मिलते तो कभी समय……….. ” आँख में जलती लकड़ी के धुएं की चुभन के बावज़ूद………. “  इस तरह की कई घटनाएँ आपके लेख को पढ़ते हुए जब आँखों से सामने से होकर गुजरती तो अचानक स्क्रीन का दृश्य कुछ धुंधला हो जाता और फिर प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द भावनाओं मे बह जाते……… जबरदस्त वापसी ………. और एक बेहतरीन दिन और बेहतरीन लेख के साथ……

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    पीयूष जी, एक लम्बे अंतराल के बाद आपकी एक भावभीनी प्रतिक्रया पाकर मुझे भी कुछ ऐसा ही एहसास हो रहा है, जिसे शब्दों में बयान नहीं कर पाऊँगा. देखें, शायद हम फिर पुराने दिनों की तरह नियमित रूप से मिलते रहेंगे. आभार !

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 14, 2012

परम आदरणीय शाही सर, सादर प्रणाम पूरा लेख तो पढ़ लिया और माँ की महिमा आपके विचार सब जान लिया माँ के बारे मन कुछ भी कहा जाए कम ही लगता है ……..आखिरी की पन्तियाँ सुन्दर लगी

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    इसीलिए तो पहले ही कहा था आनंद जी, कि पढ़ लेते तो अच्छा था ! खैर, आपने पढ़ा भी, और सराहा भी. उससे भी बढ़कर इस ब्लॉग पर आपकी प्रथम प्रतिक्रया मेरे लिए यादगार जैसी रहेगी. आभार ! फिर भी, आपकी ताज़ी मैथिली कविता मुझे भुलाए नहीं भूल रही है. एना एना केना करैछे बउवा, दोसर के मउगी भगैबे, त दरोगवा के न जानैछे, केना कड़क हऊ ? अपन सरकारी डंडा से जब हम्मर ई पूरा खेत उजार के रख देलकै, त केना बुझैछ तोरा छोड़ देतै ? न बउवा न. बात मान ले, आ बुढ़वा के मउगी ओकरा वापस कर दे. तोरा गोर परैछी. हा हा हा हा

    ANAND PRAVIN के द्वारा
    May 15, 2012

    कहला रउरा हमरा के नरक के भागी बनवई …………रौअर आशीर्वाद बस बनल रहे आउर का चाहि दरोगा जी के ता हम सेटिंग करिये लेम कलाकी ऊ तनी खावे वाला दरोगा बा ना बाकी मुरखपूरी वाला दरोग्बा से बहुत डर लागेला कलाकी ऊ पूरा देश भक्त बा पोस्ट के प्रकाशन होवे के पढ़ हमरा बहुत खुशी होयलक़ …………बस अपन छत्रछाया में रखम

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 16, 2012

    तथास्तु बउवा, तथास्तु !

sinsera के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय सर, बहुत इच्छा थी आपको पढने की… और अब माँ की याद का का इतना जीवंत वर्णन पढ़ कर माता जी से मिलने की इच्छा हो आयी…जानती हूँ पूरी नहीं हो सकती..किं बहुना…… सच है, माता पिता की ज़रूरत हर उम्र में महसूस होती है.. कृपया मेरी एक कविता पढ़ कर अपनी राय से अवगत कराइएगा ….. http://sinsera.jagranjunction.com/2012/04/28/%E0%A4%B5%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87/

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    मुझे भी आपकी लेखनी की शैली और बोधगम्यता ने शुरू से ही प्रभावित किया है सरिता जी. कविता पर तो शायद मैं वैसे भी पहुँच ही जाता. धन्यवाद !

May 14, 2012

आदरणीय शाही सर सादर प्रणाम आपका नाम तो यहाँ बहुत सुना है, हाँ आपकी कोई रचना आज पहली बार पढ़ रहा हूँ (क्योंकि मेरे इस मंच पर आने से पहले ही आप किन्हीं कारणों से यहाँ से जा चुके थे). बहुत भावपूर्ण लेखन. वापसी पर स्वागत है आपका. लायक समझें तो मेरे ब्लॉग पर भी एक नज़र जरूर डालियेगा.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    आपकी शालीनता चित्ताकर्षक है गौरव जी. आपके ब्लॉग पर पहुँचना मेरा सौभाग्य होगा. आभार !

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
May 14, 2012

वाह…..वाह ………………shahi जी……………………..बड़ा ही सुन्दर लेख, बधाई ले………………… आपकी फिफ्टी में पूरी कर देता हूँ. फिफ्टी के लिए बधाई स्वीकार करे…………………. आते ही सुन्दर रचना की प्रतुती के लिए धन्यबाद……………………… मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है………………….. http://www.hnif.jagranjunction.com

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    फिफ्टी-फिफ्टी और ट्वेंटी-ट्वेंटी तो जीवन के साथ लगा ही रहता है अंकुर जी ! मैं आपकी पोस्ट पर हाजिरी लगा आया हूँ, जाकर देख लें. धन्यवाद !

minujha के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी मां की ममता को शायद कुछ  ऐसी ही भावनाओं के लिए अनमोल कहा जाता है,मेरे प्रति अपनी मां की सुरक्षा भावना ने कई बार मुझे आक्रोशित किया पर आज  खुद मां बनकर मै उनकी भावनाओं को समझ पा रही हुं… आपको वापस  आया देख  बहुत  खुशी हुई,आभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    मीनू जी, एक स्त्री या फिर माँ ही माँ को बेहतर समझ पाती है. मुझे भी खुद को आप लोगों के बीच पुन: पाकर वर्णनातीत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है. आभार !

yogi sarswat के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी सादर नमस्कार, मैंने जब इस धरती (मंच ) पर कदम रखा , आपसे परिचित ही हुआ था की आपने न जाने किन कारणों वश इस मंच से ब्रेक ले लिया ! आज आपको देखकर अति प्रसनता हो रही है ..! माँ में ही इतनी शक्ति है जो आज उन भावनाओं को शेयर करने के लिए ही आप आये .. आपने अपने अनमोल पलों को हम सबके साथ साँझा किया इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार…! आशा करता हूँ आपका समर्थन , आशीर्वाद और सहयोग इस मंच के लोगों को अब लगातार मिलता रहेगा !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    श्रद्धेय योगी जी, बस एक आत्मचिन्तन का दौर था, जो पूरा हुआ । अब तो मिलते ही रहेंगे । इस जवाब से पूर्व मैं आपके समर्थन में आपकी पोस्ट पर एक पेड़ लगा भी आया हूँ ।

चन्दन राय के द्वारा
May 14, 2012

शाही जी , माँ जैसा इस दुनिया में कोई नहीं है , और गर कोई दुनिया है तो वो भी माँ के कदमो में सर झुकाती है , मेरे कंठ से फूटता सबसे पुण्य पवन उच्चारण है माँ

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    सही कहा चन्दन जी- ‘उसको नहीं देखा हमने कभी, पर इसकी ज़रूरत क्या होगी, ऐ माँ तेरी सूरत से अलग, भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी…’  

R K KHURANA के द्वारा
May 14, 2012

प्रिय शाही जी, सुंदर रचना ! मान तो बस मान होती है ! राम कृष्ण खुराना

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    आदरणीय खुराना साहब, ये मेरी खुशकिस्मती है कि आज मंच पर या फ़ेसबुक पर भी आपकी गतिविधियाँ अत्यन्त सीमित होने के बावज़ूद आप मुझे आशीर्वाद देने अवश्य आ जाते हैं । आपकी इन आत्मीय भावनाओं का शुक्रिया अदा करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं । सादर प्रणाम !

rita singh 'sarjana' के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय श्री शाही जी आपको पुन : इस मंच पर देख कर बहुत ख़ुशी हुई , साथ ही ह्रदय को छूता यह संस्मरण पढ़कर भावुक हो गई ,सच माँ अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए कितनी चिंतित रहती हैं l आभार l

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    मुझे बार-बार आपकी माताजी के अभी भी आप लोगों के बीच होने पर रश्क़ हो रहा है रीता जी । काश मेरी माँ भी आज मेरे साथ होती !

mparveen के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी नमस्कार, आपको देखकर अति प्रसनता हो रही है .. माँ में ही इतनी शक्ति है जो आज उन भावनाओं को शेयर करने के लिए ही आप आये .. आपने अपने अनमोल पलों को हम सबके साथ साँझा किया इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार…

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    हम साथ-साथ थे, और साथ-साथ ही रहेंगे परवीन जी । आभार !

vinitashukla के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी, इस भावपूर्ण आलेख में, माँ की ममता की सुन्दर झलक मिली. सुखद स्मृतियों की यात्रा पर, हमें साथ ले चलने हेतु धन्यवाद.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेया विनीता जी, तब और अब के भारतीय समाज में एक बड़ा फ़र्क़ यह भी आया है, कि अब हमें पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित ये मदर्स डे, फ़ादर्स डे, वैलेन्टाइन्स डे आदि रास आने लगे हैं, और हमारे समाज में भी इनकी सार्थकता बढ़ने लगी है । ज़्यादा दिन नहीं हुए जब हम इन दिवसों की आलोचना करते पश्चिम का मज़ाक़ उड़ाया करते, और इन्हें कथित विकसित देशों के चोंचले समझते थे । तब हमारे ज़ेहन में ऐसी कल्पना भी नहीं थी, कि कभी अपने माता-पिता, भाई-बंधुओं या किसी भी प्रियजन को याद करने के लिये किसी बहाने या विशेष मुहूर्त की आवश्यकता भी पड़ सकती है । अफ़सोस, और दुर्भाग्य भी, कि आज हम उस दौर के बीच से गुजर रहे हैं । अब जब अपनों से मिलन होता है, तो हम पूर्व की तरह अपनी स्मृतियाँ टटोल कर पूर्वजों की वह तमाम यादें, जिनपर कभी ठहाके लगते, तो कभी पलकें भींग जातीं, नहीं दोहरा पा रहे हैं । चाहकर भी नहीं । इससे आगे मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि डर है कि खुद को कोसने लगूँगा ।

Alka Gupta के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी , सादर अभिवादन आज आपको मंच पर माँ की भावपूर्ण स्मृतियों के साथ देख कर मन मुग्ध हो गया…..सच में जीवनदायिनी माँ की ममता का तो कोई भी मूल्य नहीं…… आगे भी अपनी रचनाओं से सराबोर व हम सबका उचित मार्गदर्शन भी करते रहेंगे…… आपका मंच पर बहुत बहुत हार्दिक अभिनन्दन साभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    आपके बेशकीमती उद्गार के प्रति आभार प्रकट करता हूँ अलका जी ।

nishamittal के द्वारा
May 14, 2012

आदरनीय शाही जी ,अभी प्रातकाल मंच पर पहुँची तो आपका सुन्दर भावयुक्त स्मृतियों से भरपूर आलेख देख कर बहुत सुखद लगा.आपकी उपस्थिति आपकी माता जी के प्रति स्मृतियों के साथ हुई जिसने उसकी महत्ता में और भी वृद्धि कर दी.बधाई और शुभकामनाएं

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद निशा जी । आशीर्वाद बनाए रखें ।

akraktale के द्वारा
May 14, 2012

आदरणीय शाही जी सादर, बहुत सुन्दर आलेख पूरा आलेख आपने सरयू माई को समर्पित किया किन्तु मात्र दो पंक्तियाँ माँ की ममता की सरयू माई पर भी भारी पड़ गयी. सच है माँ की ममता का कोई पार नहीं है.जय श्री राधे.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय अशोक जी, सादर ! माँ तो बस माँ ही होती है, चाहे सरयू माई हों, या फ़िर जननी माई । फ़र्क़ सिर्फ़ जननी माई के दूध के कर्ज़ का होता है, जिससे हम ताउम्र उॠण नहीं हो पाते । आभार ।

akraktale के द्वारा
May 13, 2012

आदरणीय शाही जी सादर नमस्कार, आपके पुनरागमन पर आपका स्वागत है.आदरणीय राजकमल जी के साथ ही हम सभी को आपके आने से बहुत प्रसन्नता हुई है जो कई दिनों से आपकी वापसी की प्रतीक्षा कर रहे थे. हर दिन कोई अपने बड़े बुजुर्गों को याद नहीं करता किन्तु कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब उनकी कमी खलती है. कुछ कमी आदरणीय राजकमल जी के आने से दूर हुई है और अब आपके आने से निश्चिन्ता में और भी वृद्धि हुई है. स्वागत.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय अशोक जी, सादर ! आप लोगों के अपनत्व का घनत्व मुझपर हमेशा वैसा ही भारी पड़ता रहा है, जैसा कि आपने ऊपर जननी माई की ममता के विषय में कहा है । इसी अपनत्व की डोर से खिंचा चला आ रहा हूँ । आभार ।

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    आदरणीय अशोक जी, “”"”आपके पुनरागमन पर आपका स्वागत है.”" पुनरागमन पर या द्विरागमन पर………….!!!!!!!!!!!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    राम-राम, कैसी बातें करते हैं ! ये भी कोई गौने की उम्र है ?

jlsingh के द्वारा
May 13, 2012

हे J.J. भैया तोहे पियरी चढ़इबो ……. पूरा भईलो हमरो सपनवां… हाय राम! आज ‘मदर्स डे’ के दिन इतनी प्यारी अनुभूति होगी सोचा न था! …… हम कहते थे न! ….गुरुओं के गुरु शाही साहब हम सबसे ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकते! उनको अपनी मिट्टी से , माँ से और अपने लोगों से अगाध प्रेम है! ….अब गुरुदेव के साथ शाही साहब को साष्टांग दंडवत कहता हूँ! शाही साहब ने जो अपनी माँ के बारे में बताया बहुत कुछ मेरे साथ भी वैसा ही होता था …. मैं माँ को छोड़कर अलग नहीं रह सकता था. अंतिम समय में माँ मेरे पास थी और मैं माँ के पास था. मुझे भी अंतिम क्षणों में ही कुछ दिन सेवा का अवसर मिला था और वह चलते फिरते स्वर्ग सिधार गयी थी! आज भी वह मेरे सपनों में हमेशा आती है. वह किसी खास दिन का इंतज़ार नहीं करती! मेरी भी बहुत सी यादें है, जिन्हें फिर कभी बाटूंगा! फिलहाल तो गले मिलने का समय है….जागरण मंच के सभी ब्लोग्गर बंधुओं और बहनों से निवेदन है, … मंच की मर्यादा बनाये रखें और और बरिष्ठ जनों का सम्मान यथासंभव अवश्य करें! शालीन शब्दों का प्रयोग हो और समालोचना भी मर्यादित भाषा में हो! अगर मुझसे भी कोई गलती होती है तो अवश्य बताया जाय! फिलहाल शाही जी का हार्दिक अभिनन्दन और गुरुदेव को वंदन!- जवाहर.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय जवाहर जी, हमारा सर्वांग माँ का ही प्रतिबिम्ब है । जीवन उसी का दिया हुआ है, तो यादों में अपना स्थान सुरक्षित रखने का पहला हक़ भी उसी का बनता है । उसे यादों और सपनों में आने के लिये क्यू में खड़े होने की ज़रूरत नहीं होती । आप लोगों के स्नेह से अभिभूत हूँ, इससे अधिक कुछ नहीं कह पाऊँगा । आभार ।

    jlsingh के द्वारा
    May 13, 2012

    गुरुदेव का आभार! आपका प्रयास सफल हुआ और हम सब आनंदित हुए!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    गुरुदेव तो कुछ बोल ही नहीं रहे, बस रस के लोभी भँवरे की तरह पूरे बाग़ में मंडराते फ़िर रहे हैं । सारे खेत को धांगकर फ़सल चौपट कर डाली, लेकिन तुर्रा ये कि एक शब्द भी नहीं कहा । बस भाव छलके पड़ रहे हैं, हम उसी के भूखे भी हैं, इसलिये कोई बात नहीं ।

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    बॉस मनौती माने थे मौन व्रत का ! पूरा कर रहे हैं !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय भूषण जी, आपकी छलकी पड़ रही भावनाएँ बता रही हैं कि आप ‘बाँस’ से भी अधिक विभोर हैं । ये आत्मीयता ही मेरी पूँजी रही है, और यही रहेगी भी । अवरुद्ध कंठ से आभार प्रकट करता हूँ ।

    rajkamal के द्वारा
    May 14, 2012

    आदरणीय शाही जी ….. सादर प्रणाम ! आप तो अन्तर्यामी है प्रभु ! सच में ही मैं आपके स्वागत के लिए स्माइली पेस्ट करके आपको सरप्राइज देने जा राह था …. लेकिन तकनीक की जानकारी ना होने के कारण निराशा हाथ लगी ….. लेकिन मेरे इस नाकामी भरे प्रयास को भी आप (सभी ) ने जिस प्रकार से सराहा उस से मैं भी आत्म विभोर हूँ

    rajkamal के द्वारा
    May 14, 2012

    आदरणीय शाही जी ….. सादर प्रणाम ! मुझको पता था की इस रंगमंच पर मेरी एंट्री चौबीस घंटे बाद ही हो पाएगी …. इसलिए शिव सैनिको की तर्ज पर आपके लेख रूपी पिच को जगह जगह से खोद डालने का हसीं गुनाह करने की खता कर बैठा था ….. अब इस टूटी हुई बाउन्ड्री वाले खेत में कौन किस जगह से घुसेगा – आप छह कर भी अंदाजा नहीं लगा पायेंगे ….. खेत की बाड़ तहस नहस करने का मेरा मकसद पूरा हुआ जिसकी की मुझे बहुत खुशी हो रही है ….. अब आप लट्ठ (कलम ) लेकर पुरे खेत में चक्कर लगाते रहिये ….. आज हा हा हा हा हा हा हा हा हा नहीं कहूँगा सिर्फ मुबारकबाद

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    इसमें कोई नई बात कहाँ है ? आपको हमेशा बर्बादियों का जश्न मनाने की ही आदत रही है । आबाद गुलिश्ताँ आपको काटने को दौड़ते हैं । हा हा हा…

ajaydubeydeoria के द्वारा
May 13, 2012

हमारे आदरणीय गुरुदेव के गुरुदेव अर्थात हमारे दादा गुरु परम आदरणीय शाही जी. सादर प्रणाम, कोटि-कोटि नमन. आज हमारे गुरुदेव की ख़ुशी देखते बनती है. हमने आपको देखा नहीं था , सिर्फ नाम सुना था. हम धन्य हो गए. आप आये भी तो अपनी मिटटी की खुशबू ले कर आये. सरजू किनारे के वाशी हम भी हैं. पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं. आपका हार्दिक आभार………

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय अजय जी, हमें मालूम है कि सरयू माई से आपका नाता भी वही है, जो हमारा है । अपने स्नेहीजनों की कुंडली तो रखनी ही पड़ती है । आप हों, दिनेश जी हों, आज़मगढ़ वाले अनिल गुप्ता उर्फ़ ‘अलीन’ जी हों, सभी को हम खूब जानते पहचानते हैं, क्योंकि जहाज के पंछी की तरह आत्मा तो मंच के ऊपर ही मंडराती रही है, गए ही कहाँ थे ? आगे भी छनेगी । आभार !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    आदरणीय अजय जी, “”"”हमारे आदरणीय गुरुदेव के गुरुदेव अर्थात हमारे दादा गुरु परम आदरणीय शाही जी.”" इतना लंबा लिखने की क्या जरुरत……… बस “बुढ़ऊ गुरु” से भी काम चलेगा ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    ‘बुढ़ऊ गुरु’ भी क्या लिखना, खाली ‘बुढ़ऊ’ ही काफ़ी है । लोग इतने से भी समझ जाएंगे ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    क्या लिखें ?

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    लिखिए……… राजकमल बबुआ, सब हाल-समाचार ठीके है आपकी कुशलता के लिए इश्वर से प्रार्थना है ! आगे समाचार यह है कि ………. …………………………………………………………..! थोड़ा लिखना जादा समझना ! चिट्ठी को तार समझना ! डांट-डपट को प्यार समझना !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    तो फ़िर लिखता हूँ – ‘ना चिट्ठी ही आई ना संदेशा आया, हर आहट पे आने का अंदेशा आया… कोई झूठी-मूठी ही किवड़िया हिला दे रे, कोई मेरे…’

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
May 13, 2012

आदरणीय शाही जी , सादर प्रणाम आइये आपका था हमें इंतजार साथ लाये माँ का असीम प्यार स्वागत में आपके दें क्या उपहार न तेरे साथ वो न मेरे साथ वो कैसे भूल सकते माँ का उपकार माँ तुझे प्रणाम.

    rajkamal के द्वारा
    May 13, 2012

    स्माइल विद फाइव स्टार रेटिंग :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय कुशवाहा जी, मैं पहले भी कह चुका हूँ कि आपकी प्रतिक्रिया वाली कविताएँ पोस्ट की गई कविताओं से अधिक मनभावन होती हैं । आपका यह प्यार ही सबसे कीमती उपहार है, और आप तो बस लाजवाब हैं ! आभार ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    लाफ़्टर्स विद नाइन स्टार रेटिंग । नो स्माइलीज !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    “आप तो बस लाजवाब हैं !” ठीक कहा आपने….. आदरणीय शाही जी, सब लोग मूंछ के ऊपर से मुस्काते हैं पर हमारे प्रदीप भैया मूंछ के नीचे से मुस्काते हैं ! जय हो ! जय हो !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    कुछ दिनों में ही मूँछों की जगह नए प्लान्टेशन वाले पेड़ लगे हुए दिखेंगे आपको । हा हा !

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    May 15, 2012

    aadarniy shahi ji, saadar badhai aapko , danik jagran main aapka yeh lekh chapa hai. ek baat yeh nahi samjh paa raha hoon ki aapki utkrsht rachna par ye samman apko mila hai ya vo jo tarif aap hamari kavita, comment ke bare main kiye hain usko chapne main aapka sahara liya gaya hai. ek tir se do shikar aapka hai bahut abhar podh ropan hetu khet taiyar oshadh yukt podhe lagvana ghayal houn kabhi to kahin aur n pade jaana. javahar bhai ji free pass aapne de diya achha kiy abhar.

rajkamal के द्वारा
May 13, 2012

मुबारका ! मुबारका !! आज मेरा चाँद नजर आ गया ईद हो गई हम सभी ब्लागर्स की

    rajkamal के द्वारा
    May 13, 2012

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    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    May 13, 2012

    भये प्रगट कृपाला दिन दयाला कौशल्या हितकारी हर्षित महतारी मुनि मनिहारी अद्भुत रूप बिचारी अगर बनवास से लौटे हैं तो दीवाली मने अगर प्रगट हुए हैं तो सोहर गवे, नया अवतार हो तो ,,बाद में. सुस्वागतम.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    आज मैं देखूँ जिधर-जिधर, ना जाने क्यूँ उधर-उधर, मुझे दो-दो चाँद नज़र आएँ, महताब-दर-महताब ! चाँद की दीद के साथ ही ईद की तैयारियाँ मुक़्क़म्मल ! लेकिन ये चाँद तो सिर्फ़ मेरे हिस्से में ही पड़ता है (पड़ती है), आप तो खुदा की कसम अभी भी ‘बाबाल’ हो । सलामत रहो !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय कुशवाहा जी, बुढ़उती में शादी की शहनाइयों के अफ़साने तो अक्सर देखने-सुनने को मिल जाते हैं । चुटकुलों की मानें तो कई दफ़ा पंडित जी के मुँह से मात्र यह सुनने के लिये बुढ़ऊ लोग फ़ेरे लेते रहते हैं कि ‘लड़का’ अब कन्या का पाणिग्रहण करते हुए सात जन्मों तक सुख-दुख में साथ निभाने का वादा करे । कई बार ये ‘लड़के’ लग्न-मंडप में ही लुढ़क कर एक जन्म पूरा भी कर जाते हैं । लेकिन आपने आज ‘सोहर’ गवाकर एक नया इतिहास रच डाला है । हमें अपने इस दूसरे जन्म पर फ़ख्र है । आभार !

    jlsingh के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय गुरुजन, सादर अभिवादन! मुझे आप लोगों के बीच में घुसना चाहिए या नहीं … नहीं जानता, पर दूसरे जन्मदिन पर बधाई तो दे ही सकता हूँ न! अब सोहर चाहे कुशवाहा जी गावें या शशि जी, गुरुदेव तो शहनाई बजायेंगे ही ……. प्रणाम !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    देखिये प्रदीप भैया के मूंछ के नीचे कि मुस्की …….. “”"”"अगर बनवास से लौटे हैं तो दीवाली मने अगर प्रगट हुए हैं तो सोहर गवे, नया अवतार हो तो ,,बाद में. सुस्वागतम.”"”"” क्या बात है………. क्या बात है ……..???????

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    आदरणीय जवाहर भाई, “”"”मुझे आप लोगों के बीच में घुसना चाहिए या नहीं … नहीं जानता,”"” पर घुसुंगा जरूर ! ही….ही….ही…. !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    अजी आराम से घुसिये, सारा घर आपका ही है ।

Santosh Kumar के द्वारा
May 13, 2012

श्रद्धेय सर ,सादर प्रणाम मंच पर आपके वापस आने के लिए कोटिशः आभार ,..आपने माँ को याद किया और अपना ग्रामीण बचपन याद किया ,.सरयू माई को सेहरा चढाने की प्रथा भी पता चली ,…वाकई आज बहुत ही अच्छा लगा ..सादर आभार ..

    rajkamal के द्वारा
    May 13, 2012

    स्माइल विद रेटिंग :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    संतोष जी, आपकी भावनात्मक पुकार आपके इंडिया गेट प्रवास के दौरान भी साए की तरह मेरे पीछे लगी थी, तो भला बकरे की माँ कब तक खैर मनाती ? आना था, आ गए, कैसे नहीं आते सरकार !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    प्लीज़ नेवर रेट द लव । थैंक्स !

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 14, 2012

    “”"”आपकी भावनात्मक पुकार आपके इंडिया गेट प्रवास के दौरान भी साए की तरह मेरे पीछे लगी थी,”"”"” . आदरणीय संतोष भाई, क्षमाप्रार्थना कि अग्रिम अर्जी के साथ अर्ज है कि ………………. आर०के० बॉस, आदरणीय निशा जी और बिग बॉस, ये आदमी नहीं जिन्नात हैं लोग ! सबके घर झांकते रहते हैं ! आप कुछ इधर-उधर कीजिये न …! आपको पता भी नहीं लगेगा और ये आपके सिर पर सवार ! यहीं तो बुजुर्गों की सार्थकता है !

    santosh kumar के द्वारा
    May 14, 2012

    श्रद्धेय गुरुजनों ,.सादर प्रणाम बुजुर्गों का आशीर्वाद और अनुभव अनमोल है ,..इनके सानिध्य में बच्चों का बेपरवाह और ऊर्जावान रहना सार्थकता को सिद्ध करेगा ,…सादर अभिनन्दन

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 15, 2012

    ज़िन्नात ने कहा- ‘तथास्तु’ !

ANAND PRAVIN के द्वारा
May 13, 2012

परम आदरणीय सर, सादर प्रणाम सबसे पहले तो बिना पढ़े हुए ही आपको मेरे तरफ से शुभकामना……….बस आप आयें आशीर्वाद भी संग लायें ………….वापसी से मंच खिल उठा

    rajkamal के द्वारा
    May 13, 2012

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    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    मेरे लिये तो बस ये भाव ही अनमोल हैं आनन्द जी ! फ़िर भी, यदि पढ़ भी लेते तो अच्छा था । आभार ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    May 14, 2012

    एक्सेप्टेड हार्टिली !


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