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आयातित सांस्कृतिक आक्रमण – “jagranjunction Forum”

Posted On: 11 Jun, 2012 Others में

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        विदेशी आयातित संस्कृति के भारत पर हो रहे निरन्तर हमलों का ही परिणाम है, कि आज लियोन जैसी शख्सियतों को हमारे उस देश में सेलीब्रिटी बनने का गौरव हासिल हो पा रहा है, जहाँ अभी मात्र कुछ दशक पूर्व ही सिनेमा के पर्दे पर महिला कलाकारों की मामूली बेपर्दगी और बोल्ड सीन्स पर पूरे देश में बावेला मच जाया करता था । सिने पत्रकार से लेकर देश के बुद्धिजीवी व जागरूक सामाजिक गणमान्य व्यक्तियों का एक स्वर से किया गया विरोध सेन्सर बोर्ड को झेलना पड़ता था । यह सब कुछ कल ही की बात जैसा प्रतीत होता है । परिदृश्य इतनी तेज़ी से बदल चुके हैं, तथा बदलते जा रहे हैं, कि सम्भवत: बहुत निकट भविष्य में ही जागरण जैसे मंच भी ऐसे विषय पर बहस कराना एक आउटडेटेड कवायद की श्रेणी का मानने लगेंगे । ऐसे विषयों पर चलाई जा रही बहस आज की एक अपडेटेड आवश्यकता है, जिसपर अभी कल तक खुली चर्चा करने की भी हमारे समाज में किसी की हिम्मत नहीं हो पाती थी । हँसी आती है यह सोच कर, कि हमारे समाज में अब पोर्न संस्कृति भी परदा उतारकर अपनी स्वतंत्रता की मांग करने लगी है, जबकि आज भी हमारा बहुसंख्यक समाज अपनी त्याज्य रूढ़ियों तक से भी बाहर निकल पाने में खुद को असमर्थ पाता है । दरअसल इस मांग की प्रवृत्ति भी उसी वर्ग-संघर्ष का एक लक्षण मात्र है, जिसने आज हमारे समाज को अभिजात्य व परम्परावादी नाम के दो खेमों में बाँट दिया है, और जिसके बीच की खाई दिन पर दिन अलंघ्य बनती जा रही है ।
          तस्लीमा नसरीन एक विवादित लेखिका रही हैं । अपनी बेबाक़ प्रस्तुतियों ने उन्हें अपने देश से निर्वासित होने को बाध्य किया । उनकी बिन्दास अभिव्यक्ति भारत की भी एक बड़ी आबादी को रास नहीं आती, हम सभी जानते हैं । परन्तु यह तो मानना ही पड़ता है कि उनके निशाने पर हमेशा समाज की ऐसी दुखती रग ही रही है, जिसका कटु सत्य से बड़ा क़रीबी रिश्ता हुआ करता है । ‘लज्जा’ भी एक ऐसी ही कड़वी सच्चाई थी, जो सामाजिक कठमुल्लेपन के हिमायतियों को हजम नहीं हुई । सनी लियोन के संदर्भ में की गई उनकी टिप्पणी का सामाजिक हाजमे से कोई रिश्ता है या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा, परन्तु उनकी टिप्पणी ने हमें हमारे वास्तविक खतरों की तस्वीर से रूबरू कराने का कार्य किया है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये ।
भूमन्डलीकरण, आर्थिक उदारीकरण के परिणामस्वरूप हमारे लिये स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल सुविधाओं व आदतों से जुड़ी सामग्री का जबरन परोसा जाना, तथा संचार और आवागमन के द्रुत माध्यमों के कारण सिमट कर एक छोटे से गाँव में तब्दील हो चुकी दुनिया एक अजीब से पीड़ा के दौर से गुजर रही है । इस पीड़ा को हर शख्स, हर समाज महसूस कर रहा है, और इसका एहसास कुछ-कुछ प्रसव-पीड़ा, या फ़िर विजातीय ट्रांस्प्लान्टेशन के पश्चात शरीर द्वारा किसी प्रत्यारोपित अंग विशेष को स्वीकार न कर पाने के बावज़ूद उसे स्वीकार करने की विवशता भरी छटपटाहट जैसा प्रतीत होता है । यह द्रुत गति से हो रहा सांस्कृतिक ट्रान्सप्लान्टेशन का दौर है, जो कब तक पीड़ादायी बना रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता । फ़िलवक़्त हमारे घरों में दो काम एक साथ हो रहे हैं । एक तरफ़ म्यूजिक सिस्टम पर भगवद्भजन की स्वरलहरियाँ गूँज रही हैं, आरती का कर्णप्रिय गायन सुना जा रहा है, तो उसी घर के एक कमरे में किसी एक पीढ़ी का कोई प्रतिनिधि अपना लैपटाप खोलकर पश्चिमी से लेकर देसी पोर्नस्टार्स के चौरासी आसनों का छुप-छुप कर आनन्द लेने में मग्न है । क्या पहले भी ऐसा कभी हुआ था ? निश्चय ही जवाब नकारात्मक ही होगा । फ़ेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल हर शख्स अपनी-अपनी ज़रूरत के हिसाब से कर रहा है । बहुआयामी सुविधाएं मुहैया कराने वाली इन साइट्स पर हर व्यक्ति और संस्था की ज़रूरतों के हिसाब से सुविधाएं उपलब्ध हैं । व्यापारी और कार्पोरेट से लेकर खबरची, लेखक रचनाकार तथा वल्गरिटी और पोर्न के शौकीन सभी अपने-अपने हिसाब से नेट पर भिड़े हुए हैं । यूट्यूब पर रामायण, महाभारत, गीता, बाइबिल और कुरान से सम्बन्धित आडियो-वीडियो की यदि भरमार है, तो एक ही क्लिक पर आप सीधे विश्व भर के पोर्नस्टार्स एवं नानस्टार्स के साथ प्राकृतिक-अप्राकृतिक जैसी भी आपकी रुचि है, वैसी रतिक्रिया का प्रशिक्षण व आनन्द लेने के लिये पलक झपकते पहुँच सकते हैं । अब यह आप सोचिये कि दो ध्रुवों की दूरी सदृश अलग-अलग मानसिक आवश्यकताओं को आप कैसे एक साथ जी पाते हैं, वह भी विकृतियों की पराकाष्ठा के साथ । यह वही देश और समाज है, जहाँ पति घर के अन्य वरिष्ठ-कनिष्ठ सदस्यों की नज़र में रात को सोने के लिये घर से बाहर हो जाया करता था, और रात को कब, कैसे घर में घुसकर निकल भी आया, किसीने नहीं देखा । बच्चों की पैदाइश ही इस बात का प्रमाण होती थी, कि उसने पत्नी का मुँह भी देखा है । आज संस्कारों से सम्पन्न इस देश की ‘लज्जा’ का चीरहरण होता देखकर यदि तस्लीमा व्यथित हैं, तो इसपर बहस की गुंजाइश कहाँ है ?
          उपरोक्त तथ्यों के परिपेक्ष्य में कहा जा सकता है कि, सनी लियोन जैसी शख्सियतों को यदि इस देश में महत्व प्राप्त होना शुरू हो चुका है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि भूमन्डलीकरण और संचारक्रांति के बाई प्रोडक्ट आयातित सांस्कृतिक इन्फ़ेक्शन ने अब हमारे समाज पर अपना असर डालना शुरू कर दिया है, जो विश्व बिरादरी में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखने वाले इस देश के स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त घातक है । यह देश सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों को सुख-शांति व आध्यात्मिक शिक्षा का संदेश देने वाली धरती के रूप में जाना जाता रहा है, और सच कहा जाय, तो इससे इतर हमारी अपनी कोई पहचान है भी नहीं । गहराई से देखा जाय, तो इंफ़ेक्शन की जड़ें इतने गहरे उतर चुकी हैं, कि उपचार यदि असम्भव नहीं, तो इतना कठिन ज़रूर हो चुका है, कि अत्यन्त दृढ़ सामाजिक व राजनीतिक इच्छाशक्ति ही हमें इस संक्रमण से निज़ात दिला सकती है, जो फ़िलहाल कहीं नज़र नहीं आती । दूसरे कुछ देश अपनी आन्तरिक सांस्कृतिक पहचान को इस महामारी से बचाने के लिये हमसे बहुत पहले सजग हो चुके थे, और उन्होंने यथासम्भव बीच का रास्ता निकाल पाने में बिना कोई क्षति उठाए, सफ़लता भी प्राप्त की है । उनसे सीख लेकर भी हम कुछ कर पाएंगे, इसमें संदेह है, क्योंकि दृढ इच्छाशक्ति के मामले में हम उनके आगे आज कहीं नहीं ठहरते ।

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108 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shailesh001 के द्वारा
June 22, 2012

अत्यंत महत्वपूर्ण व सामयिक मुद्दा. जिसके बारे में कुछ करने की ज़रुरत है. आद. शाहीजी आपको धन्यवाद। 

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 23, 2012

    बहुत बहुत धन्यवाद श्रद्धेय शैलेश जी.

MAHIMA SHREE के द्वारा
June 20, 2012

आदरणीय शाही सर , सादर नमस्कार .. बेस्ट ब्लागर आफ द वीक बनने पर बहुत बहुत बधाई ,देरी से आने पर क्षमा प्रार्थी हूँ , बड़े दिनों बाद आपका जबरदस्त आलेख पढने को मिला .. कुछ कहना सूरज को दिया दिखाना होगा … बस आप लिखते रहे यही कामना है … सधन्यवाद

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 21, 2012

    आपकी प्रतिक्रिया एवं बधाई संदेश के लिये हार्दिक आभार महिमा जी । देरी के लिये और खिंचाई न करें । मैं खुद किसी के ब्लाग पर जाकर न मिल पाने का दोष बटोरता जा रहा हूँ । कब तक भरपाई कर पाऊँगा, कह नहीं सकता । पुन: आभार ।

Rahul Nigam के द्वारा
June 20, 2012

सचमुच आयातित संस्कृति के नाम पर अश्लीलता का आयात भारतीय संस्कृति के लिए बेहद घातक है. हालांकि भारतीय संस्कृति इतनी कमजोर नहीं है कि सनी लियोन, वीना मालिक और समलैंगिक संबंधो के हिमायती इसको नुकसान पहुचा सकें क्योकि राखी सावंत और पूनम पाण्डेय जैसे लोग तो घर में रहते हुए भारतीय संस्कृति की गरिमा को धूमिल करने में प्रयासरत रह कर भी इसे नुकसान पहुचा पाने में असमर्थ रहे है मगर हमे फिर भी सावधान रहने की जरुरत है और आपका लेख जागरण के माध्यम से जागरूकता लाने में सक्षम है. निर्भीक लेख के लिए प्रशंसा और हौसलाफजाई के पात्र है और ब्लागर आफ दी वीक के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 21, 2012

    श्रद्धेय राहुल जी, एक सुधी प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार ।

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय शाही जी मुबारक और बधाइयाँ …ब्लागर आफ दी वीक के लिए …आज कितनी बार उलझे रहे न जाने मेरी प्रतिक्रियाएं क्यों नहीं जा रही क्या जादू कर रखा है आप ने छू मंतर …. हँसी आती है यह सोच कर, कि हमारे समाज में अब पोर्न संस्कृति भी परदा उतारकर अपनी स्वतंत्रता की मांग करने लगी है, जबकि आज भी हमारा बहुसंख्यक समाज अपनी त्याज्य रूढ़ियों तक से भी बाहर निकल पाने में खुद को असमर्थ पाता है । एक जबरदस्त और सशक्त लेख ….काश लोग इन्ही नजरों से देखें ..अपनी इस धरोहर..प्यारी संस्कृति को ..सच कहा हम सीना ताने इस के बल पर ही तो घुमते हैं और है क्या हमारे पास पचासों साल पीछे सब कुछ … इस नासूर से सच में दृढ निश्चय ही और प्रबल इच्छा शक्ति जन समर्थन से ही निपटा जा सकता है … भ्रमर ५

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 20, 2012

    श्रद्धेय भ्रमर जी, बेहतरीन प्रतिक्रिया हेतु आभार । आपने सही कहा, सीना तानकर घूमने के लिये हमारे पास इन मशहूर पंक्तियों के अतिरिक्त और रहा ही क्या है, सबकुछ दूसरों को बाँटने-लुटाने में ही हमने सदा संतुष्टि महसूस की । हमारी यह प्रवृत्ति भी हमारी संस्कृति की ही विशेषता रही है । वे पंक्तियाँ जो सभी जानते हैं, कुछ इस प्रकार हैं- ‘जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई, तारों की भाषा भारत ने, दुनिया को पहले सिखलाई, देता न दशमलव भारत तो, यूँ चाँद पे जाना मुश्किल था, धरती और चाँद की दूरी का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था, सभ्यता जहाँ पहले आई, सबसे पहले जन्मी है कला, अपना भारत वो भारत है, जिसके पीछे संसार चला, संसार चला और आगे बढ़ा, यूँ आगे बढ़ा बढ़ता ही गया, भगवान करे ये और बढ़े, बढ़ता ही रहे और फ़ूले फ़ले— है प्रीत जहाँ की रीत सदा …

rekhafbd के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय शाही जी ,बेस्ट ब्लागर आफ द वीक बनने पर बहुत बहुत बधाई ,देरी से आने पर क्षमा प्रार्थी हूँ ,पिछले सप्ताह व्यस्त होने पर मै मंच पर नही आ पायी ,हमारी सभ्यता और संस्कृति पर यह आक्रमण बहुत ही घातक सिद्ध हो रहा है ,बढ़िया लेखन पर बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 20, 2012

    आपने देरी की भरपाई कर दी, और मैं भी जवाब देने में एक दिन लेट हुआ, हिसाब बराबर रेखा जी । प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार ।

alkargupta1 के द्वारा
June 18, 2012

आदरणीय शाही जी , सादर अभिवादन कुछ कारणों वश मंच से दूर रहने के कारण आपके यहाँ बहुत विलम्ब से पहुंची इसलिए क्षमा प्रार्थी हूँ | सर्वप्रथम तो सप्ताह के बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! यही कह सकती हूँ कि आज धन लोलुपता ने मनुष्य को कहाँ से कहाँ पर लाकर खड़ा कर दिया है कि नैतिकता तो कहीं दिखाई ही नहीं देती गड्ढे में गिरने के बाद ही बुद्धि का एक दरवाज़ा खुलता है…..हमारी अपनी संस्कृति की अपनी अलग ही विशिष्टताएं हैं उन पर गर्व करने के स्थान पर हम पश्चिम की कमजोरियों को अपनाने का प्रयास करते हैं और नैतिक पतन की ओर बढ़ जाते हैं………… पश्चिमी सभ्यता की आयातित संस्कृति के बारे में अति विश्लेष्णात्मक व उत्कृष्ट आलेख के लिए बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 20, 2012

    श्रद्धेया अलका जी, मैं भी जवाब देर से देने का दोषी हो गया जिसके लिये खुद क्षमा प्रार्थी हूँ । रौशनी जी से मीठी शिकायत इसलिये की थी कि अभी-अभी उनकी एक कविता पोस्ट हुई थी, जिसपर वे सक्रिय थीं । उनके मनमौजीपन से वाक़िफ़ हूँ, इसलिये यूँ ही अपनेपन में शिकायत दर्ज़ कर दिया । यह आप और रेखा जी पर लागू नहीं होता । रौशनी जी से भी क्षमाप्रार्थी हूँ । आपका कथन सत्य है कि खुद को पतन के गड्ढे की ओर धकेलने के दोषी कहीं न कहीं हम भी हैं । आभार ।

roshni के द्वारा
June 17, 2012

शाही जी नमस्कार , ये सच है की लोग गलत चीज़ पहले सीखते है सही बाद में … यही सब यहाँ पर भी हो रहा है … अगर कोई सबसे ज्यदा दोषी है तो हमारा मीडिया जो ऐसी चीजों को लोगों को hightlight करता है .. ये सोचे समझे बिना की इसका समाज पर क्या असर होगा .. एक सशक्त लेख के लिए बधाई … Blogger of the week चुने जाने पर हार्दिक बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    मैं कुछ छुपाता नहीं, आप जानती हैं । इतनी देर से आपके आगमन का बुरा लगा है, लेकिन कृपया आप मेरी बात का बुरा न मानियेगा । देर से ही सही, एक सुलझी प्रतिक्रिया दर्ज़ कराने हेतु हार्दिक आभार ।

Darshan के द्वारा
June 17, 2012

आयातित पाश्चात्य सभ्यता के व्यापारी आज लियोन जैसी शख्सियतों को सेलीब्रिटी बना गौरव हासिल कर रहे हैं तो आज के सिने और दुसरे पत्रकार भी रोज़ी – रोटी के लिए उसी रंग में रंगे हैं | पित्तर बुद्धिजीवी अपने दांत खो बैठे है तो संतानों में थोड़े – बहुते संस्कारों पर स्वार्थ और भोतिकवाद हावी है | आम जागरूक सामाज तो कहीं भी नज़र नहीं आता । दुष्ट राजनेताओं के सामने भारत माता दुरोपदी की भांति मजबूर नज़र आती है | भगवान् कृष्ण का तो दूर – दूर तक कोई पता नहीं | दुष्ट जरासंध के कारन कृष्ण ने मथुरा छोडनी पड़ी तो दुष्ट नेताओं के कारण बाबा रामदेव को दिल्ली | अरविन्द केजरीवाल को सरकारी नौकरी छोड़ने के बावजूद सिक्यूरिटी का पैसा उधार लेकर चुकाना पड़ा | कांग्रेस रुपी कौरव गिनती के सहारे धृतराष्ट्र – मनमोहन को राजगद्दी पर बिठा काम-चलाऊ सरकार चला कर अपनी – अपनी गोटी फिट कर रहें है | बार – बार मुकरने वाले प्रणब मुकर्जी अब राष्ट्रपति बनने चले हैं | महारथी लालकृष्ण अडवाणी बुढ़ापे के कारण अर्जुन का रोल निभाने में असमर्थ हैं | जेटलीजी अर्जुन का रोल निभा सकते हैं पर पांडवों में फूट देख दुरोपदी स्वयम राजगद्दी के सपने देख रही हैं | कृष्ण का सुदर्शन चक्र गडकरी के हाथ में है तो मोदी द्वारिका गुजरात में होने के कारण कृष्ण का पाञ्चजन्य शंख बजा प्रधान मंत्री पद के लिए बार – बार शंखनाद करते हैं | पोर्न संस्कृति नहीं दुराचार, पापाचार है और अपराध का नंगा नाच है | बहुसंख्यक समाज को अपनी शक्ति को पहचानना चाहिये और संगठित हो कर संस्कृति की रक्षा करनी चाहिये | धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे अर्थात कर्म के क्षेत्र में आकर अपनी संस्कृति और संस्कारों की रक्षा करनी चाहिये | वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहितः | राष्ट्र की रक्षा के लिए आगे आयो | राष्ट्र हमारी संस्कृति है | राष्ट्र हमारी पहचान है | जागो कहीं देर न हो जाये | त्याज्य रूढ़ियों से बाहर निकल अपनी आर्यन संस्कृति को पहचानो | यह वक़्त सोने का नहीं , यह वक़्त खोने का नहीं , जागो वतन खतरे में हैं, सारा चमन खतरे में है | क्या सत्य ही वर्ग-संघर्ष ने हमारे समाज को अभिजात्य व परम्परावादी खेमों में बाँट दिया है। शेहरी क्षेत्रों में तो ऐसा ही है | चरित्र गिरता रहेगा, देश लुटता रहेगा, जनता कराहती रहेगी, और हम देखते रहेंगे | शासक वर्ग ऐश और विदेशो का भ्रमण करता रहेगा | नेता और उनका गुट अमीर से अमीर और जनता गरीब से गरीब होती जायेगी| तस्लीमा नसरीन बेबाक़ प्रस्तुतियों ने उन्हें अपने देश से निर्वासित होने को बाध्य किया । ‘लज्जा’ का कड़वा घूँट कठमुल्लों के गले से नहीं उतरा | कठमुल्लों ने तसलीमा को तस्लीम नहीं किया, स्वार्थी राजनीतिज्ञों ने नीति त्याग नीति को भाढ़ में झोंक दिया और प्रणब मुकर्जी ने दुशासन की भांति तसलीमा का चीरहरण कर देश निकाला दे दिया | यह सही है की भूमन्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण से आम जनता पीड़ित है खासकर किसान, कामगार, मजदूर और मजबूर | भारत करीबन ७० प्रतिशत गावों में बसता है और ग्रामवासी अधिकतर संस्कारित और स्वावलम्भी हैं और अभी भूमन्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण का प्रभाव कम हैं | ऐसे में पूंजीपति मफिया , सरकारी मफिया, राजनैतिक मफिया और भूमाफिया उनसे उनकी धरती माँ को छीन लेना चाहता है | सरकारी योजनाओं को बेच दिया जाता है और वैस्तड इन्टेरस्त सरकार और सरकारी सांडों की मदद से उनकी जमीन औने – पौने दामों पर खरीद दस गुणा यां उससे भी कही ज्यादा मुनाफा अपनी तेज़ोरियों में भरते चले जाते हैं | धृतराष्ट्र – मनमोहनजी को कुछ भी नज़र नहीं आता | एक तरफ भजन – आरती और दूसरी ओर लैपटाप पर पश्चिमी से लेकर देसी पोर्नस्टार्स के चौरासी आसनों का चस्का हमारी सभ्यता को ले डूबेगा | भगवान् Ram का चित्र पूजा छोड़ रामचरित मानस को अपनाना पड़ेगा | यूट्यूब पर रामायण, महाभारत, गीता, बाइबिल और कुरान से सम्बन्धित आडियो – वीडियो — सीधे विश्व भर के पोर्नस्टार्स एवं नानस्टार्स के साथ प्राकृतिक – अप्राकृतिक रतिक्रिया का प्रशिक्षण व आनन्द लेने के लिये पलक झपकते पहुँच सकते हैं । अलग – अलग मानसिकता का उत्तर संस्कार ही हैं | यह आपने शालीनता का प्रशंसनीय उधाहरण दिया हमारे परिवारों में पति घर के अन्य सदस्यों की नज़र में रात को सोने के लिये घर से बाहर जाता और रात को घरवालों की नज़र से बच कैसे घर में घुसकर निकल जाता | भूमन्डलीकरण और संचार क्रांति का बाईप्रोडक्ट की इन्फ़ेक्शन से३ बचने के लिये है, हमें अपने संस्कारों ,मूल्यों और गरिमा की रक्षा करनी होगी और विशिष्ट पहचान वाली वैदिक सभ्यता को चरित्र निर्माण द्वारा फिर अपनाना होगा | इसमें ना केवल भारत का अपितु पूरी विश्व बिरादरी का लिये अत्यन्त घातक है कल्याण निहित है | भारत सदियों से विश्व भर के भटके पथिकों की आध्यात्मिक शिक्षा और सुख-शांति का उपदेश देता रहा है। छ देश अपनी आन्तरिक सांस्कृतिक पहचान को इस महामारी से बचाने के लिये बहुत पहले सजग हो चुके थे, एतद देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना | स्वम स्वम चरित्रेन शिक्षारेंण प्रिथवयाम सर्व मानवः |   मानव सभ्यता ने सामाजिक ढाँचे को मर्यादों में बाँधा और वर्जित कर्मों का निषेद किया जिनके मूल्य अंतरराष्ट्रीय जो अनिवार्य आवश्यक मानव अधिकार हैं | मनुष्य का असली वस्त्र तो उसका चरित्र होता है | सभ्यता, शालीनता और नैतिकता के लिये मनुष्यों के लिये वस्त्र आवश्यक हैं, क्यों की दुसरे प्राणियों की भांति मनुष्य योनी में भी भोग अर्थात यौनिक संस्कार भी निहित हैं | आपने बहुत अच्छा लिखा जिससे मुझे और लिखने की प्रेरणा मिली | धन्यवाद !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    श्रद्धेय दर्शन जी, आप एक सुलझे हुए राष्ट्रवादी विद्वान लगते हैं । अब आपकी प्रतिक्रिया का जवाब क्या लिखूँ, जो खुद अपने आप में एक उम्दा ब्लाग है । इसे सँवार कर पोस्ट कर दें, तो अति कृपा होगी । आभार !

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 17, 2012

पूज्यनीय गुरुदेव शाही जी ….. सादर प्रणाम ! मुझको यह उम्मीद कतई भी नहीं थी की बाकी के ब्लागर आफ दा विक के नक्शेकदम पर चलते हुए आप प्रतिकिर्याओ के जवाब न देने की नीति का पालन नहीं करेंगे ….. खैर यह देख कर मन गार्डन -२ हुआ की आपने इस पुराणी परिपाटी कों तोड़ मरोड़कर कर रख दिया है ….. आज के बाद मैं अपनी चुलबुली इस्माइलीज की बत्तीसियाँ चमकाने की बजाय किसी नए ब्लागर का प्रचार और प्रसार किया करूँगा “अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ऐ दिल जमाने के लिए “ “कमजोरों का ह्फ्तावारी सरदार बनने के लिए ढेरों मुबारकबाद” आप जी भर कर रंगदारी (हफ्ता ) वसूले इसी कामना के साथ हार्दिक आभार सहित http://krishnabhardwaj.jagranjunction.com/2012/06/17/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/ (जुबली कुमार जी के पधारने की भी बहुत -२ मुबारकबाद – उनको फेसबुक पर सन्देश दिया है की अपने ब्लॉग पर आपकी जिन पुरानी रचनाओं कों उन्होंने सेव करके रखा हुआ है –जनता की भलाई के लिए उनको आपको लौटा दे )

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    ‘आप आए, तो खयाले, दिल-ए-नासाज़ आया, कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया’ । साथ में आपकी हमनशीं चुलबुली इस्माइलीज नहीं देखकर झटका सा लगा है । मेरे साथ ही ये कंजूसी और बेमुरव्वती भला क्यूँ भाई साहब, अब से भी चिपका दीजिये, तो भी सुकून मिल जाएगा । आपका तो अवतरण ही दूसरों का दर्द ओढ़ने के लिये हुआ है, तो फ़िर फ़ितरत से कश्मकश का कोई फ़ायदा नहीं है । आप जैसे हैं, वैसे ही अच्छे लगते हैं, वैसे ही बने रहें । जवाब देने की जहाँ तक बात है, तो क्या बताऊँ, ऐसी मसरूफ़ियत पहली बार झेल रहा हूँ । सुबह तीन से साढ़े पाँच का समय किसी तरह नेट के लिये निकाल पा रहा हूँ, और यह जवाब लिखने में ही वह समय निकल जा रहा है । बेईमान बन गया हूँ । दूसरे ब्लाग्स तक पहुँचने की हसरत लिये ही फ़िर बन्द कर देना पड़ रहा है । खैर, फ़िर मना लूँगा आप सभी को, टाइम-टाइम की बात है । अल्ला हाफ़िज़ ।

R K KHURANA के द्वारा
June 17, 2012

प्रिय शाही जी, ब्लौगर ऑफ द वीक चुने जाने पर बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    आदरणीय खुराना साहब, आपका पुन: हार्दिक आभार एवं सादर प्रणाम !

R S chaudhary के द्वारा
June 17, 2012

शाही जी हम लोग ठहरे पुरानी सोच के लोग पुरानी मान्‍यताएं पुरानी सोच। समय के साथ मान्‍ताऐ भी बदलती रहती है। जो देश समाज समय के साथ नही बदलता नष्‍ट हो जाता है। जब मै छोटा बच्‍चा था उस समय हम लोग कपास के सूत से बना कपडा पहनते थे। जिस समय टेरीलीन बाजार मे आया लोग अनेक आपत्ति करने लगे. लेकिन आज कपास का कपडा केवल नेताओं के पहनने की चीज मात्र रह गई है। समय के बदलाव को हम आप नही रोक पायेगे।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 18, 2012

    श्रद्धेय चौधरी साहब, प्रणाम ! शुक्र है कि कुछ मान्यताएं कालजयी और सुरक्षा की आवश्यकताएं हुआ करती हैं । इन्हें सामयिक ग्रहण लग सकता है, मिट नहीं सकतीं । जिस कपास को टेरीलीन ने ग्रस लिया था, आज भारत ही नहीं विश्व भर की पसन्द और आवश्यकता बन चुका है । आज काटन से बने कपड़ों की इतनी मांग है, कि कोई भी सिंथेटिक यार्न उसके सामने पानी भरता नज़र आता है । ऐसी ही कालजयी हमारी संस्कृति भी है, जिसके बारे में मशहूर शायर की पंक्तियां आज भी हमारी ज़बान पर आ जाया करती हैं, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा’ । ये आज के दौर के वही दुश्मन हैं, जो हमारी संस्कृति पर निरन्तर हमले किये जा रहे हैं । सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई के जयचन्द हैं ये लोग, जिन्हें अन्तत: मुँह की खानी पड़ेगी । हमने ट्रांसप्लान्टेशन को झेला है, सहन किया है, उसे परखा है, लेकिन अन्तत: हमारी संस्कृति वमन कर इनके विष को अपने शरीर से बाहर फ़ेंक ही देती है । साधुवाद ।

वाहिद काशीवासी के द्वारा
June 16, 2012

गुरुवर को सादर प्रणाम, क्षमाप्रार्थी हूँ कि व्यवसायिक एवं अन्यान्य व्यस्तताओं एवं बाध्यताओं के कारण समय से अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सका। सर्वप्रथम तो मैं भी पुष्टि कर दूं कि यह मैं ही हूँ कोई और नहीं (जिसका प्रमाण है मेरा लॉग इन करके कमेन्ट करना)। किसी भी विषय पर आपकी पारद्रष्टा पारखी नज़र किसी भी प्रशंसा की मुहताज नहीं है। आपका यह लेख विशेष रूप से पाश्चात्य सभ्यता से आयातित कु सांस्कृतिक तत्वों के पीछे छुपे वास्तविक कारणों पर प्रकाश डालता है। वैसे एक बात कहना चाहूँगा कि जिस चीज़ पर जितना पर्दा डालने का प्रयास किया जाएगा वह परदे के पीछे उतनी ही अधिक उघड़ती रहेगी। भारतीय समाज में उन्मुक्तता प्राचीन काल से रही है किन्तु वह मर्यादा के भीतर थी। और यह तो सर्वविदित है कि अति सर्वत्र वर्जयते। अंततः आपके रुतबे को सलाम करूँगा क्यूंकि दो ही पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं का शतकीय औसत सारी कहानी खुद ब खुद ही कह रहा है। बधाईओं सहित,

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 17, 2012

    आप आए हमारे मोहल्ले में बनारसी इमरतियों की खुशबू लेकर, कभी हम आपकी शान, और कभी अपनी फ़टीचर कटी पूँछ को देखते हैं । असली नकली जैसी भी हो, आपकी मौज़ूदगी से माँ-बदौलत की सफ़ेद बालों वाली छाती फ़ूल कर कुप्पा हुई जा रही है । यह दर्ज़ हो गया कि आपका प्रतीक्षित आगमन दारोगा जी के डंडे फ़टकारने से नहीं, बल्कि इस नाचीज़ की अन्तर्नादित पुकार की बदौलत सम्भव हुआ है । लगता है स्वयम्भू दारोगा जी इस चहल-पहल का छुप-छुप कर आनन्द लेने हेतु अपनी फ़ेसबुक वाल की ओट में विश्रामरत हैं, क्योंकि उनका निनाद कहीं गुंजित नहीं हो रहा । खैर, आ ही जाएंगे कभी अपनी चुलबुली इस्माइलीज की बत्तीसियाँ चमकाते । आपकी शिल्पकारी उधार लेकर मेरे चेहरे का मिलान अपने नौनिहालों से करवाते हुए मेरी बूढ़ी भावनाओं का शोषण कर जब मुझे घसीट लाए हैं, तो खुद कहाँ छुप पाएंगे । उन्मुक्तता प्राणी की आन्तरिक प्रकृति है, जो नैसर्गिक होती है । मानव सभ्यता ने उसे सामाजिक ढाँचे को मजबूती प्रदान करने के लिये कुछ मर्यादा व वर्जनाओं की परिधि में आबद्ध किया, क्योंकि यह एक अनिवार्य आवश्यकता है । हमारे अतिरिक्त कोई प्राणी वस्त्र धारण नहीं करता, क्योंकि वह हमारे जैसे बौद्धिक और सामाजिक स्तर का नहीं है । कुछ लोग अब समाज को आदिमकाल की तरह फ़िर से वस्त्रविहीनता की ओर घसीटने पर आमादा हैं, जो भारत जैसे मर्यादित संस्कृतियों वाले देश में कौन स्वीकार करना चाहेगा । आभार ।

allrounder के द्वारा
June 16, 2012

शाही जी, नमस्कार एक सशक्त आलेख और श्रेष्ठ ब्लौगर ऑफ द वीक चुने जाने पर हार्दिक बधाई आपको !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 17, 2012

    हार्दिक आभार सचिन जी.

malik saima के द्वारा
June 16, 2012

shahi ji congratulations for “Best Blogger of the week”

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 17, 2012

    Thanks for your compliments saima ji.

डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
June 15, 2012

badhai

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद डाक्टर साहब ।

डॉ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
June 15, 2012

बहुत सही विषय चुना है आपके द्वारा…इस पर अब गंभीरता से विचार करने की जरूरत है… आपको बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    जब आप जैसे सुलझे विचारवान लोग मान रहे हैं, कि इसपर विचार आवश्यक है, फिर तो एक प्रकार से सामाजिक एकजुटता की मुहर लग जाती है . आभार .

jlsingh के द्वारा
June 15, 2012

परम आदरणीय शाही साहब, सादर प्रणाम ‘बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक’ बनने पर हार्दिक बधाई……. देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    देरी वाले को देरी से ही जवाब दिया जाता है सिंह साहब, आपने ठीक ही किया. आभार.

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
June 15, 2012

परम आदरणीय गुरुदेव सादर प्रणाम बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई……. देरी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.

    rita singh 'sarjana' के द्वारा
    June 15, 2012

    बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक बन्ने के लिए तथा सुन्दर लेख हेतु बधाई स्वीकारे

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    दुबे जी एवं रीता जी, आपका हार्दिक धन्यवाद .

मनु (tosi) के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन- बहुत ही उम्दा आलेख., बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद मनु जी.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
June 15, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन- उत्कृष्ट आलेख. बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक बनने पर हार्दिक बधाई………… http://siddequi.jagranjunction.com

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    धन्यवाद तुफैल साहब.

Dr S Shankar Singh के द्वारा
June 15, 2012

तथ्यपरक उत्तम लेख और बेस्ट ब्लॉगर सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाई. यह भी ध्यान देने योग्य है की पश्चिमी देशों की अच्छी बातों को हम स्वीकार नहीं करते हैं लेकिन पोर्न जैसे कीचड को तुरंत अपना लेते हैं. कमी कुछ हमारी भी है.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    आप ठीक कहते हैं आदरणीय डाक्टर साहब, अपनी कमियों के अभाव में किसी की घुसपैठ की हिम्मत कैसे हो सकती है. आभार.

राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
June 15, 2012

प्रणाम गुरुदेव, आपके लेख पर टिप्पणी करने के काबिल नहीं हूँ मैं………वैसे भी में आपकी ही विचारधारा पर चलने वाला शिष्य हूँ| इस मंच पर अच्छी नस्ल वाले फिर से दबदबा कायम करेंगे, ऐसी कामना करता हूँ… …..और हाँ….ये कमेन्ट मैं स्वयं ही कर रहा हूँ…..

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    ज़रा सूँघ कर देख लूँ, … हाँ, असली वाली बू ही है. आजकल बड़ा भ्रम फैला हुआ लगता है. खैर, जब असली नस्ल वालों का जमावड़ा होगा, तो दबदबे की कौन पूछता है, हाथ की मैल है. कुछ जलेबी नुमा पूंछ वाले आ जुटें, फिर तो पौ बारह. धन्यवाद.

आर.एन. शाही के द्वारा
June 15, 2012

मैं जागरण जंक्शन परिवार के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने मेरे आलेख को इस सम्मान के योग्य समझा ।

dineshaastik के द्वारा
June 14, 2012

ब्लॉगर ऑफ  दा वीक  बनने की बधाई स्वीकृत करें….

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद श्रद्धेय दिनेश जी ।

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
June 14, 2012

शाही जी, नमस्कार- बेस्ट ब्लोगर ऑफ़ द वीक चुने जाने पर हार्दिक बधाई………… आपका आलेख बाकई में पुरस्कार के योग्य था. कृपया इसे भी पड़े. http://hnif.jagranjunction.com/2012/06/06/%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%ac%e0%a5%82%e0%a4%9d%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद अंकुर जी.

vikramjitsingh के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय श्री शाही जी….सादर प्रणाम….. जिस उचित सम्मान के आप हकदार थे…..वो आप को मिला….. हमारी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं……. हमें तो आपके आशीर्वाद की दरकार है….यदि हो सके तो….????? सादर….

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    विक्रम भाई आभार.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन निश्चय ही भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है. देर हो चुकी है. कब चुपके से दीमक लग गयी, लोग जान नहीं सके. आपके विचारों का सदैव सम्मान किया है और यथा संभव पालन भी किया है . अपने दोष को प्रथम स्वीकार करना नैतिक रूप रूप से एक प्रकार का प्रायश्चित ही है. देर हो चुकी, बदलाव की निंदा भी करते रहे और व्यापक रूप से स्वीकार भी करते रहे. सब कुछ आप के सामने है. इसे भी देखिएगा मान्यता मिल जायेगी. हाथ पे हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा. जो कुछ चोरी छुपे हो रहा है. खुल के होगा. शादी की है तो बच्चे भी होंगे. भले ही पालने में नानी याद आ जाये. सुदूर क्षेत्रों में शिक्षा का अभाव , मनोरंजन के सस्ते साधन न होना भी आबादी बढ़ने का प्रमुख कारण है. जागरूक होने के कारण मेने २ बेटियों के बाद आपरेशन कराया . फिर भी तीसरी संतान ने जनम लिया पुत्र रूप में. बताइए दोषी कौन . बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक बन्ने पर बधाई. मुबारक हो आपको खिताब ये सुहाना मैं खुश हूँ बहुत मेरे लिखे पर न जाना बजे शहनाई और द्वारे गीत ये बजवाना अकेले यूँ कभी न निकलना ए राही निकले थे अकेले पकड़ गए शाही ढूढ़ रहे थे कब से जे. जे. के सिपाही बधाई बधाई बधाई. क्षमा प्रार्थी हूँ किसी भी त्रुटी हेतु

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    इस प्यारी और मेरी फेवरिट काव्यात्मक प्रतिक्रया पर कुर्बान जाऊं. मूंछों वाले अवध के नवाब, आप तो बस लाजवाब हो. आभार.

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    June 16, 2012

    मूंछ मूंछ न रही पूँछ पूछ न रही होती थी कभी पूँछ किसी की शान की होती थी कभी मूंछ किसी के आन की सब कुछ बदल गया वो बात न रही आदरणीय शाही जी, सादर आपके पास गिरवी हैं. मेल पे बता सकता हूँ.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 17, 2012

    तो कीजिए फिर मेल, रोका किसने है महामहिम, क्या आप भी ज़नाब वाजिद अली शाह की परिपाटी ही घसीटते रहेंगे ? कोई जूतियाँ डाले तो चलूं !

vasudev tripathi के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय शाही जी, मेरे आंकलन व विश्लेषण पर अब तो jj के जजों ने भी सहमति मुहर लगा दी है.. यद्यपि मैं मानता नहीं कि किसी ठप्पे मुहर अथवा उपाधि से ही लेखनी को प्रमाणपत्र मिलता हो..!! हार्दिक बधाई||

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    वासुदेव जी, यहाँ फ़िर भी आपही के आकलन विश्लेषण की विजय हुई । इसी लिये तो कहता हूँ कि आर्थिक हो, सामाजिक हो, राजनैतिक हो या फ़िर वैश्विक, हर दृष्टिकोण से आकलन विश्लेषण के मामले में आप लाजवाब हैं, और रहेंगे । नम्बर एक से दस तक । आभार !

vinitashukla के द्वारा
June 14, 2012

बहुत बहुत बधाई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद विनीता जी.

nishamittal के द्वारा
June 14, 2012

आदरनीय शाही जी ,उत्कृष्ट लेख पर सम्मान मिलने पर हार्दिक बधाई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    निशा जी हार्दिक आभार.

omshukla के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए हार्दिक बधाई |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    धन्यवाद शुक्ल जी.

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य" के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए हार्दिक बधाई |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    श्रद्धेय शुक्लजी, हार्दिक धन्यवाद.

yamunapathak के द्वारा
June 14, 2012

shaaheejee,बेस्ट ब्लॉगर बनाने पर अतिशय बढ़ाई. लेख की हर बात से सहमत हूँ.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    सहमति जताने के लिए हार्दिक आभार यमुना जी.

satya sheel agrawal के द्वारा
June 14, 2012

शाही साहेब .मैं आपकी बात का पूरा समर्थन करता हूँ.परन्तु जो कुछ हो रहा है उसका रोल बेक होना संभव भी नहीं लगता.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    श्रद्धेय अग्रवाल साहब, असंभव कुछ नहीं होता. बस इच्छाशक्ति वाली बात आड़े आती है. धन्यवाद.

sinsera के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर प्रणाम, सब से पहले सप्ताह भर की बादशाहत की बहुत बहुत बधाई…वैसे आप की लेखनी किसी उपाधि की मोहताज नहीं है… भारतीय समाज में फैलती बेशर्मी की प्रतिस्पर्धा कोई आयातित बीमारी नहीं है बल्कि मुझे ये एक प्रकार का म्यूटेशन लगता है….. लड़कियां पागल हो गयी हैं और अपने पागलपन से ही अपने लिए और दूसरों के लिए जीविका जुटा रही हैं…माना की विकास के लिए परिवर्तन ज़रूरी है लेकिन परिवर्तन अगर नकारात्मक है तो फिर विकास की जगह विनाश ही होना तय है…..मुझे इसीलिए सेक्स स्कैंडल्स में फसने वाली लड़कियों से कभी सहानुभूति नहीं होती…… most of the time they opt it as their own choice…….. आपने सच कहा है, इच्छाशक्ति ही एकमात्र उपाय है…….

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    सरिता जी, आपके उद्गारों पर किसी अन्य बहस की गुंजाइश नहीं बनती । नारी के आत्मसम्मान का शृंगार और सम्पूर्ण सौन्दर्य उसके समर्पित कर्त्तव्यबोध, ज़िम्मेदारियों और बौद्धिकता में सन्निहित है, न कि नुमाइश में । नारी की शालीनता ही सदैव सम्मान का पात्र बनती आई है, न कि उच्छृंखलता । आभार ।

Mohinder Kumar के द्वारा
June 14, 2012

शाही जी, जीवन में मैने एक बात सीखी है कि कोई भी किसी को बिना बात के “भाव” नहीं देता… या तो उसमें वो अपना फ़ायदा देखता है या दूसरे का नुकसान. लियोन का आयात भी शायद इसी श्रेणी में आता है.. हो सकता है कुछ व्यक्ति विशेष इस से कुछ प्रयोजन रखते हों. तस्लीमा और आम आदमी में सिर्फ़ यही फ़र्क है कि वो जो देखती है उसको शब्दों में प्रकट कर देती है और आम आदमी यह कह कर की “हमें क्या लेना देना” अपना पीछा छुडा लेता है. सार भरे लेख के लिये बधाई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    मोहिन्दर जी, अब आप स्वयं देखें कि हम अपनी वास्तविक मंज़िल से भटक कर किस प्रकार पतनोन्मुख मार्ग का चयन करते चले जा रहे हैं । अपनी परम्परागत सभ्यता और संस्कृति की सौदेबाज़ी करने से समाज विकसित तथा समृद्ध हो जाएगा, अन्यथा हम पिछड़े ही रह जाएंगे, ऐसी सोच को थोपने वाले तत्वों को मुँहतोड़ जवाब दिया जाना आवश्यक है । आभार !

vinitashukla के द्वारा
June 14, 2012

आदरणीय शाही जी, प्रणाम. स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हमारी मानसिकता गुलाम ही रही. आयातित(imported ) वस्तुओं तक तो ठीक था, पर हमने उनकी जीवन शैली, यहाँ तक कि विचारधारा को भी import कर लिया. पश्चिम की तडक भडक और ग्लैमर ने, हमारे युवाओं को बाजारवाद का पिट्ठू बनाकर रख दिया. हमारे प्राचीन मूल्य भी उसी तडक भडक में कहीं खो गये. एक चेताने वाली सार्थक पोस्ट पर बधाई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 16, 2012

    विनीता जी, आपके विचार सराहनीय हैं । बेबाक़ और स्पष्टवादिता से परिपूर्ण । साधुवाद ।

minujha के द्वारा
June 13, 2012

आदरणीय शाही जी, नमस्कार आपकी विवेचना को तारीफ  के शब्द दे सकूं ,इस लायक अभी खुद को नही पाती,जहां तक  इस  मुद्दे की बात  है मैनेजमेंट की भूतपूर्व  छात्रा होने के कारण  मुझे यही प्रतीत होता है कि ये चीजें सिर्फ  बाजारवाद का हिस्सा है ,जो समय के साथ साथ  कहीं पीछे  छूट जाएंगी…..,हम  भारतीय तो शुरू से ही नई चीजों और  विचारधाराओॆ के दीवाने बन जाया करते है कुछ ऐसा यहां भी होगा…, पर ऐसी लोकप्रियता ना हमारा हिस्सा बन सकती हैं ना हि इससे हमारी नैतिकता पर संकट आने वाला है ,शायद ये मेरी खुशफहमी ही हो…..,साभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    आपकी बातें तर्क़संगत हैं मीनू जी । अक्सर ऐसे प्रयास होते रहे हैं, जिनका मक़सद मात्र सामयिक लाभ उठाना होता है, और बाद में बातें आई गई हो जाती हैं । दिक्कत तब होती है, जब इनके स्थापित होने के खतरों से लापरवाह समाज इनको इनके मन की करते रहने दे, और सामूहिक विरोध न दर्ज़ किया जाय । विरोध के बाद ही इनके प्रयासों को झटका लगता है, और ये पाँव पीछे समेटने को मजबूर हो पाते हैं । मुखालफ़त के अभाव में ये और आगे बढ़ेंगे, और तब शायद इनके हाबी होने को रोक पाना कुछ ज़्यादा दुरूह होगा । अतीत में कई फ़िल्में ऐसी बनाई गईं, जो सामाजिक मान्यताओं को सीधे-सीधे चोट पहुँचाती थीं । समाज ने टिकट खिड़की पर उनकी जो गत बनाई, कि प्रतिष्ठा बचाने के लिये इन फ़िल्मों को कलात्मक या समानान्तर फ़िल्मों का दर्ज़ा दिलवाकर निर्माता-निर्देशकों की दोबारा ऐसा प्रयोग करने की हिम्मत नहीं हुई । सौभाग्य से हमारा समाज आंतरिक रूप से इन मामलों में अत्यधिक संवेदनशील और जागरूक है । आपकी बुद्धिमत्तापूर्ण टिप्पणी के लिये आभार ।

    minujha के द्वारा
    June 14, 2012

    बहुत बहुत बधाई,रचना इसकी सही मायनों में हकदार थी

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 15, 2012

    बहुत- बहुत धन्यवाद मीनू जी.

yogi sarswat के द्वारा
June 13, 2012

आदरणीय श्री शाही जी सादर नमस्कार ! समाज के नैतिक पतन पर चिंतित होना स्वाभाविक है. आज भी हमारे समाज में नैतिकता देखने को मिल रही है किन्तु चंद लोग रुपये पैसे के बल पर इसे धूमिल करने में लगे हैं मीडिया इस कार्य में उनका बराबरी से सहयोग कर रहा है ! कुछ लोग सिर्फ अपनी दूकान चलाये रखने या उसे और बढ़िया चलाने के लिए नए नए और उल जुलूल प्रयोग करते रहते हैं ! उन्हीं में से एक है महेश भट्ट -जिसने संस्कार क्या होते हैं ये कभी जाना ही नहीं , भारतीय संस्कृति क्या होती है ये समझा ही नहीं ! तो जैसा जिसका दिमाघ होगा वो वैसा ही कुछ करने के लिए लालायित रहेगा ! दूकान खुली है है लोग भी आयेंगे ही !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    आपका कथन सत्य है योगी जी । हमारे समाज के कुछ तथाकथित अत्याधुनिक विचार वाले लोग मात्र सस्ती लोकप्रियता या सिर्फ़ चर्चा में खुद को बनाए रखने के लिये ही ऐसी अजीब-अजीब हरक़तें करते रहते हैं, जिसका असर बड़ा नुकसानदेह होता है । सामाजिक मान्यताओं को ऐसे लोग निरन्तर चोट पहुँचाकर ही संतुष्ट हो पाते हैं । देखा जाय तो यह एक प्रकार का मनोरोग है । आभार ।

akraktale के द्वारा
June 12, 2012

आदरणीय शाही जी नमस्कार, समाज के नैतिक पतन पर चिंतित होना स्वाभाविक है. आज भी हमारे समाज में नैतिकता देखने को मिल रही है किन्तु चंद लोग रुपये पैसे के बल पर इसे धूमिल करने में लगे हैं मीडिया इस कार्य में उनका बराबरी से सहयोग कर रहा है.बार बार ऐसी चीजे परोस कर इसकी लत लगाने की कोशिश की जा रही है.शेर के मुह में एक बार खून लग गया तो परिणाम गंभीर ही होंगे.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    आपका विचार शतप्रतिशत सहमति के योग्य है श्रद्धेय अशोक जी । आभार ।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन सामजिक विषय पर आपने बहुत प्रभावी लेख प्रस्तुत किया है, निश्चय ही भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात है. देर हो चुकी है. कब चुपके से दीमक लग गयी, लोग जान नहीं सके. दोष हमारा ही है. बधाई.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    श्रद्धेय कुशवाहा जी, हम अपनी लाचारी को भी अपना दोष मान लेते हैं, जो हर मामले में उचित नहीं प्रतीत होता । यह तो वही बात हुई कि परिवार की परवरिश नहीं कर पा रहे, तो संतान पैदा करने की अपनी गलती को ही कोसने बैठ जायँ । ऐसा सोचने से नहीं, बल्कि ऐसी प्रवृत्तियों का प्रतिकार करने से ही बात बन सकती है । आभार ।

चन्दन राय के द्वारा
June 12, 2012

शाही जी, मुझे तो पॉर्न स्टार को मिलने वाली लोकप्रियता का विरोध करना उसके अधिकारों पर हमला करने जैसा है, और इक झूठे पाखण्ड जैसा ही लगता है ,जब इस देश में हर किसी को अपनी अभिव्यक्ति की मौलिक स्वीकृति है ,तो निश्चित ही यह नैतिक हमला है, किसी भी विषय को पसंद न पसंद करने का अधिकार हमारा हो सकता है, हालाकिं हम में से बहुतरे इन पोर्न फिल्मो का छुप छुप के आनंद उठा चुके है , —— अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से पॉर्न फिल्मों जैसे पेशे में आता है या न्यूड फोटोशूट करवाता है तो क इसे उसका व्यक्तिगत मसला समझा जाना चाहिए, क्यूंकि क्या हमने उस व्यक्ति की मुलभुत आवश्यकताओं को या उसकी जरूरतों को पूरा करने के पर्याप्त अवसर पैदा किये है , यदि नहीं तो किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का अधिकार हमारा नहीं है — हमारे भीतर ही है अच्छा ,बुरा .सही. गलत हमे इस बात को तलाशना होगा की क्या हमारी संस्कृति इतनी कमजोर है , जो बाह्य सभ्यता ,संस्कृति के प्रभाव में बिखर जाए , — भारत ही वो जगह है जन्हा काम क्रीडा का सबसे बड़ा ग्रन्थ कामसूत्र लिखा गया , में तो इसे बदलते समाज की उची होती उदार सोच ही कहूंगा जो आज हम हर मेहमान का उन्मुक्त भाव से स्वागत कर रहे हैं

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    चन्दन जी, मैं आपके व्यक्तिगत विचारों एवं रुचि की क़द्र करता हूँ, क्योंकि किसी विचार से सहमति हो या असहमति, हर विचार अपनी एक अलग अहमियत रखता है । जहाँ तक मेरी अपनी सोच या विचार की बात है, मैं इस प्रकार के सांस्कृतिक अतिक्रमण के विरुद्ध हूँ, और हमेशा रहूँगा । आपका मानना सही है कि हमारे मूल्य मान्यताओं की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि किसी सांस्कृतिक आक्रमण से धराशायी हो जायँ, परन्तु इतिहास गवाह है कि जब-जब हमपर ऐसे आक्रमण हुए हैं, हमें भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है, सदियों तक एक से दूसरी संस्कृतियों की गुलामी में विवशतापूर्ण जीवन जीना पड़ा है । हमारे अपने ही खून को बाँट कर उनमें आयातित संस्कृतियों का कुछ ऐसा बीजारोपण किया गया, जिसकी फ़सल हम निरन्तर काटते रहने को लाचार हो चुके हैं । क्या यह दंश कुछ कम रहा है, कि आप एक और आयातित सभ्यता की हिमायत करने की वक़ालत कर रहे हैं ? ‘मेहमाँ जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है’ की मान्यता हमारी एक भावनात्मक मान्यता रही है । ईस्ट इंडिया कम्पनी ने हमारी इस भावनात्मक कमज़ोरी का जो फ़ायदा उठाया, क्या आप उससे अनभिज्ञ हैं ? वह छद्म रूप से व्यापार करने हेतु मेहमान बनकर हमारे देश में आई थी, हमने उसे हर प्रकार की स्वतंत्रता दी, जिसके परिणाम स्वरूप कालान्तर में उसने हमें ही गुलाम बना लिया । हमने एक आयातित संस्कृति को अपने ऊपर हाबी हो जाने दिया । आक्रमणकारी मुगलों ने जो किया, उसके परिणामस्वरूप हमारा अपना समाज ही दो संस्कृतियों में विभक्त हो गया । हमने सबको अपने भीतर समाहित किया, फ़िर भी हमारी मौलिक संस्कृति यदि अक्षुण्ण बनी रही, तो यह हमारी सांस्कृतिक मजबूती का प्रमाण है । परन्तु हमारी जड़ें निरन्तर प्रहार से कमज़ोर हुई हैं, यह तो हमें अब मान ही लेना चाहिये । इसका सबसे बड़ा कारण हमारी संस्कृति का उदारवादी दृष्टिकोण ही रहा है, जिसे आप आगे भी जारी रख कर इसकी बची-खुची मौलिकता पर एक और प्रहार कराए जाने की हिमायत कर रहे हैं, जिसका समर्थन कम से कम मैं व्यक्तिगत तौर पर कभी नहीं कर पाऊँगा । आज हमारे समाज में दोहरी मानसिकता रखने का एक फ़ैशन सा चल पड़ा है । घर में हमारी मान्यताएँ कुछ और हैं, तो बाहर सड़क पर कुछ और । इस प्रकार की मानसिकता और उससे उत्पन्न अ-स्थाई विचार कभी भी सर्वमान्य मूल्य और मान्यता का स्वरूप धारण नहीं कर सकते । पूरी पारदर्शिता और ग्राह्यता के साथ जन्म लेने वाले विचारों को ही हम आज तक अपना आदर्श बनाने योग्य मानते आए हैं । मैं आप से एक निहायत ही निज़ी प्रश्न पूछना चाहता हूँ चन्दन जी । वह यह कि, क्या आप इसी दृढ़ता और साफ़गोई के साथ अपने माता-पिता, पत्नी, पुत्र और पुत्री के समक्ष भी सनी लियोन या फ़िर पोर्न संस्कृति को भारत में उसे महत्व दिये जाने, या उन्हें अपनी पूरी वल्गरिटी के साथ खुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी दिये जाने की हिमायत कर पाएंगे ? यदि आपका उत्तर पूरी ईमानदारी के साथ ‘हाँ’ में है, तो मुझे मानना होगा कि आप दोहरी मानसिकता के साथ जीने वाले शख्स नहीं हैं । और यदि आपका उत्तर किंचित संकोच से भी सिक्त है, खुद अपनी अन्तरात्मा के समक्ष भी, तो फ़िर आप स्वयं तय कर लें कि आपके विचारों के संदर्भ में इस देश की बहुसंख्य सामाजिक राय क्या होगी ? हमें याद रखना चाहिये कि मनोरंजन तथा व्यक्तिगत आनन्द के दृष्टिकोण से हमारा दिल बहुत कुछ चाहता है, मांगता है, परन्तु हमारा समाज हमें वह वस्तुएँ बिल्कुल हमारे हिसाब से दे पाना स्वीकार नहीं करता । हम चाहते हैं कि सार्वजनिक पार्क की बेंच पर टांग पर टांग चढ़ाकर सुस्ताते हुए सिगरेट के छल्ले उड़ा पाते, लेकिन वहाँ पहले से ही ‘धूम्रपान निषेध’ का बोर्ड लगा पाते हैं । हम चाहते हैं कि ट्रेन की बर्थ पर यात्रा करते अपनी पत्नी या प्रेमिका को आलिंगनबद्ध कर एक किस कर पाते, परन्तु दूसरे यात्रियों की घूरती आँखें हमें ऐसा करने से रोक देती हैं । जो लोग पोर्न संस्कृति को हमारी मर्यादाओं के भीतर जीने की अभ्यस्त संस्कृति के ऊपर थोपने के हिमायती हैं, वे हमारे समाज की मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते, यही सत्य है । आभार !

    चन्दन राय के द्वारा
    June 14, 2012

    शाही जी , आप एक अग्रज है और में केवल तर्क दे रहा हूँ कृपा मेरे विचारों को अन्यथा ना ले , पर माफ़ कीजिये व्यापारीकरण और कला , संस्कृति के आदान प्रादान में काफी अंतर है , हमे ये जानना आवश्यक हो जाता है की दोहरी मानसिकता क्या है , आज हमारे अपने देश में बेतिओं के साथ बलात्कार हो रहा है , और हम सन्नी लिओन पर हामारे संस्कृति हनन का आरोप लगा कर बचना चाह रहे है ,, ———— आपको तो ज्ञात ही होगा हमारी नाक के ठीक निचे ,दिल्ली ,बम्बई , कलकत्ता जाने कितने शहरो ,कस्बो , में देह व्यापार का अड्डा चल रहा है , जिसमे अमूमन महिला स्वेच्छा से नहीं प्रवेश करती बल्कि उसे धकेला जा रहा है , —- बेटियाँ बेचीं जा रही है , मारी जा रही है , क्या इन सब के लिए सन्नी लिओन ही जिम्मेदार है , क्या हमारे खुद के देश में पूनम पाण्डेय , मल्लिका शेहरावत जैसी अभिनेत्रियाँ नहीं है , क्या राजकपूर साहब ने अपनी अभिनेत्रियाँ का खुलापन नहीं दिखाया था , अत में समझता हूँ हम अपनी कटु कमजोरी को किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप कर के नहीं बचा सकते है , यदि इक अंश भी मेरी बातों से आपको आहात पंहुचा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ , और इक बात हर बच्चे की सोच उसके माँ बाप की सोच का ही दर्पण होता है , पर क्या इक व्यक्ति की बुराई (आपकी नजर में ) इतनी हावी हो सकती है की पूरी संस्कृति को नष्ट कर दे ,

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 15, 2012

    भाई चन्दन जी, यह एक स्वस्थ और प्रबुद्ध बहस है, तो फ़िर किसी के लिये भी अन्यथा लेने जैसी कोई बात है ही नहीं । आखिर मंच का मक़सद भी तो यही वैचारिक मंथन एवं आदान प्रदान है ! आपने हमारे समाज में अन्तर्निहित विद्रूपताओं का ज़िक्र किया, यह तथ्यपरक और सर्वविदित भी है । बेटियाँ बेची जा रही हैं, यह भी कोई नई बात नहीं है । हमारे अतिरिक्त भी कई सभ्यताओं में दासियों, कनीज़ों के रूप में कन्या विक्रय का रिवाज़ रहा है, जिसे किसी हिस्से में सामान्य, तो कहीं आपत्तिजनक नज़रों से देखा जाता रहा है । गणिका या वेश्यावृत्ति भी किसी न किसी रूप में समाज के एक निन्दनीय ही सही, परन्तु अनिवार्य अंग के रूप में पोषित होती ही रही है । बलात्कार और हरण हर युग में होते रहे हैं । परन्तु मुझे नहीं लगता कि किसी भी काल में इन वृत्तियों-बुराइयों को समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक मान्यता प्राप्त हुई हो । यहाँ हमारी बहस इस बात पर केंद्रित है, कि क्या इस प्रकार की निन्दनीय और वर्जित वृत्तियों को हमें आज एकाएक आधुनिकता के नाम पर सामाजिक रूप से सम्मानजनक मान्यता देते हुए धारण कर लिया जाना चाहिये ? बिकाऊ मीडिया और निहित स्वार्थी तत्वों के अतिरिक्त कौन हजम कर पाएगा इनकी मान्यता को ? आपके अनुसार तो कामकला को भी अब अन्य ललित तथा नृत्यकलाओं के सदृश्य एक सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य मान्यता दे दी जानी चाहिये । ये कौन सी कला है, जिसका सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करना आवश्यक हुआ जा रहा है ? आपको याद है न, जब मुम्बई में ताजमहल जल रहा था, एक फ़िल्मकार महोदय पर वहाँ अपनी सनसनीखेज़ फ़िल्म में डालने लायक फ़ुटेज तैयार करने योग्य दृश्य शूट करने की सम्भावना तलाशने का आरोप लगा था ! सनी को स्थापित करने का प्रयास करने वाले भी वही लोग हैं । यदि सड़क पर कहीं बलात्कार होता हुआ इन्हें दिख जाय, तो इनके लिये वह अपराध कम, शूटिंग मैटीरियल अधिक होगा । इनको अपनी प्रोफ़ेशनल संतुष्टि तभी हासिल हो पाएगी, जब बलात्कार और कामकला को सड़क पर प्रदर्शित किये जाने योग्य वस्तु बनाने में कामयाब हो जाएंगे । लानत है ऐसे लोगों पर, आप जाने-अंजाने में जिनके कुत्सित प्रयासों की तारीफ़ किये जा रहे हैं । धन्यवाद ।

dineshaastik के द्वारा
June 12, 2012

परम  श्रद्धेय शाही जी भारत  में बिग  बोस  जैसे सीरियल  का उद्धेश्य क्या था मैं नहीं समझ  पाया और सन्नी लियोन  को उसका हिस्सा बनाने का आशय  भी मैं नहीं समझ  पाया। हम  सब उस  समय  खामोश रहे, संभवतः हमारे अंदर भी इस  तरह के दृश्य  देखने की ललक  थी। या मीडिया हमारे ऊपर इतना हावी हो गया कि वह जैसा चाहता है हमें घुमा देता है। जो कार्य  पहले हमारे तथाकथित  धर्मगुरु करते थे वही काम  आज  मीडिया कर रहा है।  तसलीमा ने जो कहा है सत्य कहा है, उसने हमारी कुंठित  एवं दोहरी मानसिकता वाली सोच  पर प्रहार  किया है।  उन्होंने  वही कहा है जिसका कल  दूरगामी परिणाम  होना है। मुझे लगता है कि यदि  सब कुछ  इसी खामोशी के साथ  होता रहा तो निश्चित  ही कालान्तर में  हमारी सोच  भी फिल्मी दुनियाँ के लोंगो ( महेश भट्टजैसे) की तरह हो जायगी। सराहनीय आलेख  के लिये बधाई……..

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    सारा खेल मीडिया द्वारा ही रचित होता है श्रद्धेय दिनेश जी । उसके अपने निहितार्थ हैं, जिसके लिये उसने सारी नैतिकता को गिरवी रख दिया है । नतीज़तन स्वार्थी राजनीति को उसके इस अनैतिक आचरण को अपने पक्ष में भुनाने का बहाना अलग से मिल जा रहा है । बजाय सही कदम उठाने के, सरकारें मीडिया की उच्छृंखलता की आड़ में जनता का ही मुँह बन्द करने के औजार तलाशने में व्यस्त हैं । अजीब गोरखधंधे की चपेट में इस वक़्त पूरा देश और समाज दोनों ही हैं, घोर भ्रम की स्थिति है । साधुवाद ।

Santosh Kumar के द्वारा
June 11, 2012

श्रद्धेय सर ,.सादर प्रणाम सुन्दर बेबाक विवेचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन आपका ,.. भारत को अपनी सांस्कृतिक पहचान को भयानक खतरे की आहट सुननी चाहिए किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं लगता है ,..यह पतन बहुत पहले शुरू हो गया था जब हमारी शिक्षा व्यवस्था आयातित हुई ,जहाँ नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं रही ,..समाज में जो शक्ति और सम्मान पा गया उसे खुद को बचाए रखने की चिंता से ही मुक्ति नहीं ,….निजी आनंद के सामने बाकी सभी चीजें छोटी हो गयी ,..अब संचार क्रांति ने सभी बचे बंधन खोल दिए हैं उन्मुक्तता ही पहचान और शान बनती जा रही है ,..धार्मिक स्वभाव और अधार्मिक आचरण समाज को कितना विकृत करेगा यह तो समय के गर्भ में है ,…दृढ इच्छाशक्ति कहाँ से आएगी जब हमाम में लगभग सभी नंगे हैं ,.जिन हुक्मरानों को आदर्श बनना चाहिए वो खुद अनैतिक और विदेशी सोच के गुलाम हैं ,…शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के बिना कोई रास्ता मिलना दुरूह ही लगता है ….

    jlsingh के द्वारा
    June 13, 2012

    श्रद्धेय शाही साहब, सादर अभिवादन! हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं जहाँ से लौटना शायद संभव न हो ….. पर शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन शायद कोई नयी रोशनी दिखा पाए….. यहाँ पर मैं संतोष जी के विचार से सहमत हूँ . पहले के पाठ्यक्रम में रामायण, महाभारत के अंश, पौराणिक कथाओं का समावेश होता था. मैंने पढ़ा था — शिवाजी की माँ बचपन से ही शिवाजी को रामायण महाभारत की कहानिया सुनाकर उन्हें प्रेरित करती थी …… आज कितनी माताओं को रामायण महाभारत के बारे में जानकारी है? ….वो तो भला हो रामानंद सागर और और बी आर चोपड़ा को जिन्होंने घर-घर में टी वी के माध्यम से ही लोगों को रामायण महाभारत से अवगत करा दिया. पर वही बुध्धू बक्सा आज बिग बॉस जैसे सीरियल के माध्यम से हमारी पुरानी संस्कृति पर हमला कर रहा है .. जिम्मेदार कौन है? प्रश्न गंभीर है … समय काफी आगे निकल चुका है…… फिर भी आश का दमन नहीं छोड़ना चाहिए! चिंतनीय विषय की प्रस्तुति के लिए आपका आभार !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    भाई संतोष जी एवं श्रद्धेय जवाहर जी, आप दोनों का ही चिन्तन हमारी वर्तमान सामाजिक राजनीतिक विवशता को प्रतिबिम्बित करता है । जिसमें राजनीतिक विवशता एक ओढ़ी हुई लाचार विवशता है । व्यवस्था बनाना उसी की जवाबदेही है, जबकि समाज के हाथ कई जगह कानूनी विवर के कारण लाचार हो जाते हैं । हम सीधे-सीधे किसी के मौलिक अधिकारों का अपहरण नहीं कर सकते, जिसका बेजा फ़ायदा घुसपैठ संस्कृति के ठेकेदार उठा रहे हैं । मीडिया सहित हर संसाधन बिकाऊ बनकर उनका सहयोगी बन जाता है । राजनीति अपनी सुरक्षा के लिये आज हर चीज़ पर प्रतिबंध लगाने के लिये उतारू है, यहाँ तक कि आमजन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी । परन्तु ऐसे मामलों में उसकी आँखें हमेशा बन्द हो जाती हैं । दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है । धन्यवाद ।

Rajkamal Sharma के द्वारा
June 11, 2012

पूज्यनीय गुरुदेव शाही जी ….. सादर प्रणाम ! जैसा की आपने फरमाया है की घर के एक कमरे में भक्तिगान और भगवान का स्तुतिगान तो दूसरे किसी में घर के ही किसी सदस्य द्वारा सन्नी जैसी किसी हिरोइन के रूप का रसपान ….. अब इन दोनों ही कमरों के बीच वाले कमरे में इन दोनों गुणगाणों को मिलाकर कोई भी बीच का रास्ता निकालना बहुत ही खरतनाक हो सकता है ….. मैंने एक फिल्म में देखा था की अपने भैया और भाभी को धोखा देने के लिए बन्द दरवाजे के पास अन्दर की तरफ अगरबती जला कर + सी.डी.प्लेयर पर धार्मिक भजन चला कर वोह महाशय अपनी टांग पर टांग चढ़ा कर मजे से सिगरेट के काश लगा रहे थे …. वैसे यह भी अत्यन्त दृढ़ इच्छाशक्ति का ही एक कमाल कहा जाना चाहिए …….. कोटिश आभार और नमन :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P जय श्री कृष्ण जी

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 14, 2012

    भाई साहब, आपकी तो आदत ही है लोगों को लाजवाब करना, तो लीजिये, मैं भी ‘लाजवाब’ हो गया । बीच के रास्ते से मेरा मतलब है कि भूमन्डलीकरण और बाज़ारवाद के साथ जीना एक सामयिक मजबूरी है, परन्तु चीन जैसे कुछ देशों ने इसे भी बिना अपनी मौलिक संस्कृति की अक्षुण्णता के साथ समझौता किये, इस मजबूरी को भी अपने अनुकूल साँचे में ढाल लिया । हम उनका अनुकरण तो नहीं कर पाएंगे, परन्तु प्रयास कर बहुत से रास्ते निकाले जा सकते हैं, जिससे हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान भी बनी रहे, और विश्वबिरादरी के साथ समय की मांग भी पूरी कर सकें । आभार ।

R K KHURANA के द्वारा
June 11, 2012

प्रिय शाही जी, बाप बड़ा ना भईया सबसे बड़ा रुपिय्या ! यह सब पैसे का खेल है ! आज लोग पैसे के पीछे भाग रहे है ! उसके लिए चाहे उनको कितना ही नीचे गिरना पड़े ! बिग बॉस आदि कार्यक्रम भी इसी का हिस्सा है ! इन्हें तो पैसे से मतलब है चाहे वो कैसे भी आए ! आज लड़कियां अपने आप को “सेक्सी” कहने पर गर्व महसूस करती है ! किसी समय में यह डूब मरने वाली बात थी ! खैर ! बढ़िया लेख के लिए बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    आदरणीय खुराना साहब, प्रणाम ! आपका आशीर्वाद पाना सदैव मेरे लिये एक सुखद अनुभूति रही है । एक अव्यक्त सा उत्साह प्रदान करने हेतु आभार !

अरुण कान्त शुक्ला "आदित्य" के द्वारा
June 11, 2012

आदरणीय , बहुत ही सटीक और सीधे मष्तिष्क तक पहुँचाने वाला विश्लेषण है . विदेश याने अमेरिका हो या यूरोप , अच्छी संस्कृति भी है , जिसमें श्रमशील जनता के संघर्ष हैं , सामाजिक समस्याओं पर अच्छी फ़िल्में हैं , सामाजिक कार्यकर्ता हैं , पर वो बाजार का हिस्सा नहीं बन सकते और आसानी से नहीं बिक सकते और पश्चिम के सौदागरों को पैसा कमा कर नहीं दे सकते , इसलिए वे उसका निर्यात भी नहीं करते और हमारे देश के सौदागर उसका आयात नहीं करते | बाजार के साथ बाजारी संस्कृति ही आयेगी | थाईलेंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जहां माँ बाप तक पैसा कमाने के लिए अपनी लड़कियों को पर्यटन के नाम पर पोर्न व्यवसाय में भेजना खराब समझना बंद कर दिए हैं | इतने सुन्दर आलेख के लिए आपका साधुवाद |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    श्रद्धेय शुक्ल जी, हमारी सांस्कृतिक विशेषता यह भी रही है, कि हमने हमेशा दूसरों की संस्कृति में निहित अच्छाइयों को पूरे स्वागत भाव के साथ सम्मान दिया है, साथ ही उसे अपनाया और आत्मसात भी किया है । पश्चिमी सभ्यता की अच्छाइयों और फ़ायदों को स्वागत भाव के साथ अपनाने का परिणाम ही है, कि उनकी बुराइयों को भी हमने कब ओढ़ना शुरू कर दिया, कुछ पता ही नहीं चला । उसी का परिणाम तो भोग रहे हैं । आभार ।

chaatak के द्वारा
June 11, 2012

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन, आयातित संस्कृति के मुद्दे पर आपने जिस संतुलित अंदाज़ में लिखा है वह काबिल-ए-गौर भी है और काबिल-ए-तारीफ़ भी| तसलीमा नसरीन निश्चय ही एक ज़हीन लेखिका और उत्कृष्ट विचारक हैं| मैं उनकी राय से इत्तेफाक रखता हूँ और आपके द्वारा दिए गए निष्कर्ष पर मैं भी कहना चाहूंगा की ये सिर्फ इच्छा का मामला नहीं वरन हिन्दुस्तानियों में ख़त्म हो रही दृढ इच्छाशक्ति की देन है जिसके हमें भयंकर परिणाम वही झेलने पड़ेंगे जो तसलीमा जी ने कहे हैं| अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    nishamittal के द्वारा
    June 12, 2012

    चातक जी के विचारों से सहमती है मेरी.

    nishamittal के द्वारा
    June 12, 2012

    आदरनीय शाही जी,चातक जी के विचारों से सहमत हूँ.कई बार कमेन्ट बकर चुकी हूँ परन्तु कुछ समस्या है.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    आपका आकलन तथ्यपूर्ण है चातक जी । बहुत भयानक परिणाम होंगे, यदि आगे हमने अपनी संस्कृति में निहित अतिशय उदारवादी दृष्टिकोण को आगे भी ज़ारी रहने दिया । एक स्वर से इस आयात पर अब प्रतिबन्ध लगाने की आवाज़ उठनी ही चाहिये । आभार ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    मेरी सहमति आप और चातक जी, दोनों के ही विचारों से है निशा जी । मैं आपकी तकनीकी विवशता समझ पा रहा हूँ । धन्यवाद ।

vasudev tripathi के द्वारा
June 11, 2012

आदरणीय शाही जी, मैं भी सीमित लिखता हूँ और संभवतः आप भी कभी कभी आते हैं अतः आपके किसी दुसरे तीसरे लेख को ही पढ़ रहा हूँ! विषय से पहले आपकी लेखन शैली की मुक्तकंठ प्रसंशा करना चाहूँगा जिसमें यथार्थतः लेखन स्वयं अपनी जिह्वा से बोलता प्रतिबिंबित होता है| ब्लॉग्गिंग ने लेखकों के नाम पर भीड़ अवश्य जुटा दी है किन्तु मौलिकता विरल हो गई है| यह संस्कृति निरंकुश होती प्रवत्तियों और बाजारवाद का ऐसा चक्रव्यूह है जिसे वेध कर निष्कलंक मनुष्य के रूप में विकसित हो पाना आज के युवा के लिए असंभव तुल्य हो गया है| दोनों अन्योन्याश्रित हैं| भौतिक शरीर की प्राकृतिक आवश्यकताएं निरंकुश होती हैं तो चेतन के अस्तित्व को ही मृतप्राय कर देती हैं.., दुर्भाग्य से वही हो रहा है|

    आर.एन. शाही के द्वारा
    June 13, 2012

    भाई वासुदेव जी, आपने तो बहुत ज़्यादा तारीफ़ कर दी, जबकि मैं खुद आपकी लेखनी का प्रशंसक और कायल भी हूँ । असली मौलिक विश्लेषण की श्रेणी में यदि मुझसे राय मांगी जाय, तो एक से दस नम्बर तक आप का ही नाम दूँगा । आपने सही कहा, बाज़ारवाद ही आज सर पर चढ़कर बोल रहा है, और उसी की चल रही है । साधुवाद ।


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