नई दिशा की ओर

आसमां और भी हैं …

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यूँ ही …

Posted On: 13 Feb, 2013 Others में

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Faasley

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67 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
March 10, 2013

कलेवर में जोश …लेखनी बेजोर …बहुत बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 11, 2013

    आपसे तारीफ़ पाना सुखद होता है ।

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 4, 2013

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 5, 2013

    उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार सक्सेना साहब ।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 2, 2013

परम आदरणीय शाही सर जी सादर अभिवादन. सर जी में सठिया गया मूंछ पर पूंछ की लिंक न पा घबरा गया किया मेल दिया नंबर वापस मेल ढूंढ न पाया सरल करें प्रभु रास्ता मेरा अभी मेंटोज नही खाया दर्शन दें प्रभु.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 2, 2013

    मालिक आप तो जानते ही हैं कि अपन थोड़ा एडवांस चलने वाले जीव हैं । जो शुभ कार्य पहली अप्रैल को करना था, उसे पहली मार्च को ही निपटा डाला तो कौन सी आफ़त आ पड़ी प्रभु ? ही-ही-ही

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    March 6, 2013

    धन्य प्रभु अगर आप जैसे सब हो जाएँ कैसे मरे भूखा कोई बोने से पहले खाएं मार्च के बाद अप्रेल ही आता होली संग फर्स्ट अप्रैल ही भाता स्वागत श्री मान आपसे अनोखा नाता जुग जुग जियो मेरे प्यारे भ्राता सादर

pragati के द्वारा
February 23, 2013

वाह बहुत अच्छी रचना

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 25, 2013

    थैंक यू मैम !

Bhagwan Babu के द्वारा
February 22, 2013
    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 23, 2013

    बहुत-बहुत शुक्रिया भगवान बाबू ।

allrounder के द्वारा
February 21, 2013

नमस्कार शाही जी, क्या खूब कहा है आपने ‘ फासले मिट जाते हैं जो बने, बस कदम उठ कर बढ़ाना चाहिए’ बहुत खूब बधाई स्वीकार करें !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 22, 2013

    आपको यहाँ देखकर अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव हुआ सचिन जी । अब मंच कुछ और गुलज़ार होगा । मैं प्लेनचिट पर विगत कई दिनों से जिस भूत का आवाह्न कर रहा था, वह तो नहीं आया, अब बाई-प्रोडक्ट के रूप में आप ही सही । स्वागत है …

aman kumar के द्वारा
February 21, 2013

बहुत अच्छे ! आप को अच्छी रचना की बधाई !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 21, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद श्रद्धेय अमन जी ।

Santlal Karun के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीय शाही जी, तीन शे’रों की ही यह छोटी-सी ग़ज़ल बड़ी साफ-सुथरी, सरल और मीठी है, लेकिन पूरी ग़ज़ल में ‘हमनुमाया’ बाकी मिसरों के रदीफ़ों जैसे कि ‘बढ़ाना, ‘फ़साना’ और ‘रवाना’ के साथ तालमेल में बँधा हुआ न होने से खटकता है | या फिर बाकी के भी केवल काफ़िये ( चाहिये ) में बँधे होते | संज्ञान में उर्दू शब्दों की कमी के कारण वज़नदार शब्द सुझा पाना मेरे लिए कठिन है, पर मेरी समझ से यहाँ रदीफ़ का तालमेल कुछ इस कदर होना चाहिए — “आ जी जाता है फ़िर कोई हम सफ़र रहगुजर का हमपैमाना चाहिये…” पर यह मैं विनम्र सूझ के कारण कह रहा हूँ, सूझा सो कह दिया | आशा है आप अन्यथा नहीं लेगें | रिश्तों में दूरी की चिंता न करने, सफ़र से न कतराने, बीते को न ढोने और निसंकोच आगे बढ़ने की प्रेरणा भरी ग़ज़ल के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 21, 2013

    आदरणीय संतलाल जी, मैं अपने इस अपरिपक्व प्रयास में कहीं न कहीं पकड़ लिया जाऊँगा, इसका अंदेशा तो मुझे था ही । आप जैसे ग़ज़ल के विद्वद्जन से इन पंक्तियों को सार्थकता का प्रमाणपत्र भी मिल पाएगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं कर सकता था । मंच पर मुझे जानने वाले महिला-पुरुष मित्रगण भली-भाँति जानते हैं कि मैं तुकबंदियाँ चाहे जैसी गढ़ लूँ, कविता, शेर या ग़ज़ल आदि मेरे वश के बाहर की वस्तुएँ हैं । मैं इन विधाओं का भरपूर रसास्वादन करने वाला पिपासु रसिक अवश्य हो सकता हूँ, परन्तु इनका साधक बन पाने के योग्य खुद को कभी नहीं मान पाया । मंच से जुड़े मेरे कई अनुज-सह-शिष्यगण शेर-ओ-शायरी व ग़ज़ल की दुनिया में अच्छी पैठ एवं पकड़ रखने वाले, तथा आज उस्तादों के भी कान काटने वाले बन चुके हैं । मैं चाहकर भी कभी उनका हमक़दम नहीं बन पाया, क्योंकि स्वभाव में ही नहीं है । अपनी इसी कमज़ोरी के कारण मैं ग़ज़ल आदि का गुर सिखाने वाली कुछ अच्छी वेबसाइट्स को भी छोड़कर भाग आया, क्योंकि ‘क़ाफ़िया’ और ‘रदीफ़’ जैसे शब्द मुझे हमेशा ही काट खाने हेतु दौड़ाते से लगे, जैसे किसी मदरसे के मौलवी साहब सोंटा लिये मेरे पीछे लपके चले आ रहे हों । आशा है आप मेरी मजबूरियों को समझेंगे, और अपना आशीर्वाद फ़िर भी बनाए रखेंगे । आभार !

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीय, बहुत कुछ कह डाला आपने चंद शब्दों में दर्द फिर उभर आया आज इन परिंदों में क्या कहें क्या ना कहें ज़िन्दगी के चाल पर हमे तो बस गुनगुनाने का बहाना चाहिए |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 20, 2013

    वाह-वाह ! क्या कहने भीष्मबाला जी । आपकी पंक्तियों में जान है । आपकी रचनाएँ देखने की उत्कंठा हो रही है । आभार !

Malik Parveen के द्वारा
February 20, 2013

आदरणीय शाही जी नमस्कार, जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुयी रचना के लिए हार्दिक बधाई … धन्यवाद.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 20, 2013

    सार्थक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद परवीन जी ।

Sushma Gupta के द्वारा
February 19, 2013

आदरणीय शाही जी, जिन्दगी की रुकावटों को दूर करके ,एक रफ़्तार के साथ आगे वदने का प्रोत्साहन देती हुई ,आपकी यह रचना अद्वितीय है ,इसके लिए आपको साभार वधाई …

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 19, 2013

    सुषमा जी, आपने पंक्तियों के मर्म को स्पर्श करने के उपरांत दो शब्द कहे, इस नवाज़िश हेतु आपका हार्दिक आभार !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
February 18, 2013

आदरणीय शाही जी …अब तो कहना ही पड़ेगा वाह वाह क्या बात है …. सुन्दर …जो खड़े रह जाते हैं किनारे पर कश्तियाँ उनके लिए रूकती नहीं …. जीवन को गति देती अच्छी रचना … भ्रमर ५

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 19, 2013

    उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद भ्रमर जी ।

yogi sarswat के द्वारा
February 18, 2013

आदरणीय श्री शाही साब , सादर नमस्कार ! मैं कविता के साथ साथ प्रतिक्रियाएं भी पढता चला गया ! गज़ब का लिखा है आपने ! जिंतनी खूबसूरत बात उतना ही मोहक प्रस्तुतिकरण और उसी अंदाज़ में वाह वाह !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 18, 2013

    श्रद्धेय योगी जी, अत्यन्त खेद है कि आपकी प्रतिक्रिया पता नहीं कैसे स्पैम में चली गई, जिसे विलम्ब से देख पाया हूँ, और अभी अभी एप्रूव किया ताक़ि पोस्ट पर भी दिखे । आशा है आप इस तक़नीकी खामी को समझते हुए जवाब में हुए इस विलम्ब को अन्यथा नहीं लेंगे । आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।

Shweta के द्वारा
February 16, 2013

उम्दा लिखा है आपने

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 17, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद श्वेता जी ।

rekhafbd के द्वारा
February 16, 2013

आदरणीय शाही जी हजारों अफ़साने जिंदगी में किसे भूलें किसे याद रखें अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    छोटी सी परन्तु सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार रेखा जी ।

राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
February 16, 2013

एकदम झक्कास तकनीकी अंदाज में कविता लिखी है गुरुदेव| लगता है आप इस बीच अज्ञातवास में रहकर अपना तकनीकी कौशल बढ़ा रहे थे, लेखन में तो आप हमारे गुरु- घं……हैं ही….म्मेरा …..मतलब किसी की दुर्घटना की खबर भी यूं देते हैं कि बंदा सीधे आई सी यू से भी उठकर लड़ने चला आये| और इसका भी भरोसा नहीं है कि खबर सही हो या नहीं, या यहाँ भी अपनी साहित्यिकता से बाज न आये हों| खैर अगर खबर सत्य है तो ईश्वर हमारे “रॉयल लोटस” को शीघ्र स्वस्थ करे जिससे कि “जुबली कुमार” की आवाज सुनने को तरस रहे कानों को सुकून मिले| “मुआफ़ कीजिए कविता की तारीफ़ करने के लायक मैं नहीं, जहां रौशनी हो पहले से ही, वहाँ अँधेरे की जगह बनती ही नहीं…” जय हो बाबा वैलेंटाइन जी महाराज की….

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    आईसीयू वाले गुरुदेव के शीघ्र दर्शन देने की सम्भावना है, ऐसा मैं नहीं कह रहा, ज़रा ध्यान लगाकर सुनें, फ़िर कुछ बताएँ । क्या आपको मेरी तरह दूर नेपथ्य से कुछ भुतहा डरावनी सी किलकारियाँ नहीं सुनाई दे रही हैं ? जैसे दो पहलवान नुमा नवजात शिशुओं की आत्माएँ आपस में वयस्कों के अट्टहास को भी मात देने वाली किलकारियाँ मार-मार कर अपने मंच पर शीघ्र आगमन की सूचना देती सी प्रतीत हो रही हों ? भई, मुझे तो ये आवाज़ें काफ़ी देर से सुनाई दे रही हैं । मेरे रोंगटे खड़े हैं, और टांगों में सूखे पत्ते जैसा कम्पन हो रहा है । स्पष्ट है कि कोई ऐसी शक्ति यहाँ शीघ्र ही प्रकट होने वाली है, जिसकी कमर पर कच्छ, एक हाथ में कृपाण, तो दूसरे में बाँस-लट्ठ, कंधे पर हरिश्चंदी कम्बल और पूरे शरीर पर बिल्कुल ताज़ी चिता-भस्म का रमण होगा । उसके आते ही मंच ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगेगा, फ़लस्वरूप पूरी दीर्घा से वृद्ध, अबला एवं बालवृंद का स्वत: पलायन सुनिश्चित है । शेष बचे लोग दहाड़ें मार-मार कर उसके स्तुति-गान में लग जाएंगे, जो गान और रुदन दोनों का ही सम्मिलित स्वरूप होगा । मुझे यह अवश्यम्भावी होनहार स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है, तो आपको भी ज़रूर दिख रहा होगा । शिव-शिव !

atharvavedamanoj के द्वारा
February 16, 2013

खुशामदीद….आदरणीय शाही जी…आपके गजल में ने तो धूम मचा के रख दिया है…आपकी कमी खलने लगी थी…जागरण का यह नंदन कानन बियावान हो गया था…आप आयें तो बादल घुमडने लगे हैं…लगता है अब बारिश होगी| अभी कुछ दिनों पहले आपका ब्लॉग पढ़ने के लिए एयरफोर्स वन खोज रहा था….लेकिन निराशा हाँथ लगी..अब आश्वस्त हो गया हूँ की आप हमें अपनी लेखनी की वरद मसि से सर्वदा अनुग्रहीत करेंगे|आप के ही शब्दों में अब तो छोडो भी मेरे हमदम हसीं, भूलने को बस फ़साना चाहिए …वंदे मातरम

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    वंदेमातरम मनोज जी । एयरफ़ोर्स-वन तो अपने सभी सवार साथियों (तत्कालीन प्रकाशित रचनाएँ) सहित कब का ग्राउंडेड हो चुका है, यादें भर बाक़ी हैं । खैर, हम और आप हैं तो दूसरा उससे भी बढ़िया चार्टर कर लेंगे । इस वसन्त में भी सचमुच बादल घुमड़ रहे हैं, छिटपुट बारिश भी हो रही है । परन्तु जब धूप खिलेगी, तो वासन्ती अंगड़ाइयाँ सम्भवत: पहले से भी अधिक मादक होंगी । आपको ॠतुराज के आगमन की ढेर सारी बधाइयाँ !

sinsera के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय शाही सर, नमस्कार, कभी कभी दिमाग पंचर रहता है, ठीक से कुछ समझ नहीं आता, फिर मैं थोड़ी कन्फ्यूज़ हो गयी कि कविता पढूं या प्रतिक्रियाएं…सब एक से बढ़ कर एक.. थोडा सा जो समझ में आया उससे कुछ ऐसा लगा कि… “प्यार करते हो कैदी तो नहीं हो मेरे, कहो रिहाई दे दूँ चाहते क्या हो..”

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    आखिर कन्फ़्युजियाइये गईं न ? इसी लिये कहावत है कि ढेर पढ़लको भी आफ़ते है । वही कहूँगा, जो आप विद्वानों को भी प्राथमिक पाठशाला में ही पढ़ाया गया था, ‘ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो …!’ मुझे कोई रिहाई नहीं चाहिये, उस पाश में ही जकड़ा रहने दो, जिसमें जीवन का स्पन्दन है । इस स्पंदन से ही वे भावनाएँ प्रस्फ़ुटित होती हैं, जिनकी सूक्ष्म तरंगों में बिना कुछ लिखे बोले भी सात समन्दर पार तक अपना घर बना लेने की अद्भुत क्षमताएँ होती हैं । आभार !

chaatak के द्वारा
February 15, 2013

जिंतनी खूबसूरत बात उतना ही मोहक प्रस्तुतिकरण ! वाह उस्ताद वाह!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    डेढ़ पंक्तियों में ही ‘उस्ताद’ घोषित कर दिया, अजी ‘वाह चातक जी’ बोलिये ! आभार ।

alkargupta1 के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय शाही जी , सादर अभिवादन बहुत ही लम्बे समय बाद अति सुन्दर काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ मंच पर आपकी उपस्थिति देख कर बहुत ही अच्छा लगा … पुनः आगमन के लिए हार्दिक स्वागत है !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    सुन्दर उत्साहजनक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार अलका जी ।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय शाही जी सादर अभिवादन खूबसूरत गजल हेतु दाद क़ुबूल करें चेहरा किताब से क्यों नाराज हो गए कहाँ मुलाकात होगी अब

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    किताबी चेहरे को डी-एक्टीवेट कर के रखा हुआ है, क्योंकि लम्बे समय तक नेट से दूर रहने की बाध्यता थी । खुला छोड़ देने पर लोग हैक कर प्रोफ़ाइल के साथ छेड़छाड़ करने लगते हैं । ऐसा कड़वा अनुभव झेल चुका हूं, इसलिये प्री-काशन लिया । होली के आसपास ही वहाँ भी हरक़त में आऊँगा, कुछ ऐसा सोच रखा है । धन्यवाद ।

Santosh Kumar के द्वारा
February 15, 2013

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम क्या लिखूं !….लगता है सचमुच बसंत आ गया है ,…आप आये साथ में गुरुदेव की नमकीन खुशबू भी लाये ,.मजा आ गया …कोटिशः अभिनन्दन …..बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई …सादर

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    आपको नमकीन की खुशबू आ रही है, जबकि मेरे मुँह में नाम लेने मात्र से ढेर सारी तीखी हरी मिर्चियाँ सी घुल जाती हैं । लेकिन खैर, अपना यदि कुछ कर दे तो सिर्फ़ कपड़ा धोया जा सकता है, अंग को नहीं काटा जा सकता । मुझे वातावरण में कुछ पदचापों की गूँज सी सुनाई पड़ने लगी है । सम्भवत: खतरा सन्निकट ही प्रतीत हो रहा है । शायद वह (अ)शुभ घड़ी आने ही वाली है । धन्यवाद ।

roshni के द्वारा
February 15, 2013

Respected शाही जी नमस्कार शायद आपकी पहली कविता पढ़ रही हूँ .. बहुत सुंदर लिखा आपने .. आपकी ye रचना पढ़कर कुछ लाइन याद आई वही लिख रही हूँ … कश्ती भी न बदली दरिया भी न बदला, हम डूबने वालों का जज्बा भी न बदला, है  शौके ऐ सफ़र ऐसा एक umar से हमें, मंजिल भी न पाई और रास्ता भी न बदला……!!! ऐसे ही और रचनाये लिखते रहिये आभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    मैं नया-नया यहाँ आया था मादाम, इसलिये आपको सचमुच याद नहीं होगा । आपको बताऊँ कि यह मेरी पहली नहीं, बल्कि दूसरी कविता है । पहली वाली का नाम ‘यारो मैं भी तो कवि हूँ’ था, जिसे एक से अधिक बार स्व. अरे-रे-रे, ज़बान फ़िसल गई, श्रद्धेय पंडित रतूड़ी जी के हाथों पुनर्प्रकाशित होने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है । आज यह राज़ भी उगल रहा हूँ, कि पहली वाली की प्रेरणा-स्रोत भी आप सहित मंच की तत्कालीन ढेर सारी कवियित्रियाँ ही थीं, और आज वाली की तो सिर्फ़ आप और आप मात्र हैं । अच्छी-अच्छी तस्वीरों के साथ सम्मोहक पंक्तियाँ उकेरने की आपकी विधा ने ही कहीं न कहीं मुझे ऐसा करने हेतु प्रेरित किया । तस्वीर के ऊपर लिखने का प्रयोग अवश्य आपसे थोड़ा अलग हटकर है । निशा जी का आदेश कुछ पोस्ट करने का था, और इससे बेहतर इतनी जल्दी कुछ हो भी नहीं सकता था । अब आपकी मनमोहक पंक्तियों की पुन: प्रतीक्षा रहेगी । धन्यवाद ! आपकी उपरोक्त अर्थपूर्ण पंक्तियों हेतु अलग से दाद सहित धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ ।

jlsingh के द्वारा
February 14, 2013

श्रद्धेय श्री शाही जी, सादर अभिवादन! राजेंद्र रतुरी जी के पुकार पर एक श्रद्धेय के दर्शन हुए अब दूसरे श्रद्धेय श्री राजकमल जी की प्रतीक्षा है … वक्त सभी फासलों को भुला देता है ..बाकी आपने सबकुछ कह दिया है! वसंत पर्व, मदनोत्सव, फगुनहट सब कुछ का असर दिखने लगा है! जागरण के पनघट पर सभी अपने अपने घट लेकर पधारें, तो चहल पहल लौट आए! पुन: आभार और आदर सहित!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 14, 2013

    फ़ासले बनते-बिगड़ते रहते हैं सिंह साहब ! अगर कुछ अटल है, तो वह दिलों के रिश्ते हैं, जो दृश्य-अदृश्य हर स्थिति में बा-वज़ूद बने रहते हैं । हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है । हल बैल लेकर शाम को घर लौटने वाले किसान गमछे से पसीना पोंछते चौपाल पर मिलेंगे ही । जिनकी प्रतीक्षा आप कर रहे हैं, वे विगत दिनों गुरदासपुर के पास पंजाब-मेल से गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें गम्भीर स्थिति में अखिल-भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती होना पड़ा । फ़िलहाल खतरे से बाहर स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं, तत्पश्चात लौटने की सम्भावना बनती है । बहुत समझाया कि ट्रेन के फ़ुट-बोर्ड पर खड़े होकर यात्रा न किया करो, लेकिन आप जानते ही हैं, उन्हें भ्रम है कि फ़ुट-बोर्ड पर चलते-चलते जो दूर-दूर तक सरसों के पीले फ़ूल दिखाई देते हैं, उन्हीं में से फ़ुदक कर कभी न कभी वह ज़रूर बाहर आएगा, जिसे उनका हमसफ़र, हमराह, जीवन-साथी और न जाने क्या-क्या बनना है । किसी भी समय काजू खाने आपके यहाँ पहुँचने वाला हूँ, उम्मीद है भाभी ने मेरे लिये अवश्य बचा रखे होंगे । धन्यवाद ।

    jlsingh के द्वारा
    February 14, 2013

    गुरुदेव का दुखद समाचार सुनकर दुःख हुआ … अगर कान्टेक्ट नो. मिल जाता तो सांत्वना व्यक्त कर सकता! आप आयें तो सही, काजू जरूर खिलाऊँगा सर! वर्मा जी से मांग कर सही!.. हा.. हा! हा.. हा!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    नहीं दे सकता, डाक्टरों के दल ने उन्हें बिस्तर पर रहते किसी से फ़ोन पर बात करने से मना किया हुआ है । एक्स्ट्रीमली साँरी ! थैंक्स …

    shashibhushan1959 के द्वारा
    February 15, 2013

    बॉस के स्वास्थ्य लाभ और अन्य अनेकों चाहे-अनचाहे लाभ के लिए मैं भी ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ !

    atharvavedamanoj के द्वारा
    February 16, 2013

    ईश्वर राजकमल जी को दीर्घायु बनावे..और वे शीघ्र स्वास्थ्य लाभ कर हमारे बीच आवें …उनके बारे में सुनकर ह्रदय को काफी पीड़ा पहुंची है

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    आप लोग मुझे मरवा कर छोड़ेंगे मनोज जी । निशा जी को पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैंने राजकमल जी के नहीं, बल्कि लंगोट वाले जट्टा ‘गुरुदेव’ के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर प्रसारित की है । कृपया भ्रमित न हों । मात्र कवि भूषण ही हैं जो ‘बाँस’ कह कर सम्बोधित कर रहे हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि ‘दहिने हाथे बाँस बिराजे’ वाले कच्छाधारी महापुरुष कौन हो सकते हैं ।

shashi bhushan के द्वारा
February 13, 2013

आदरणीय शाही जी, सादर ! आप आये बहार आई ! और यह बहार एक सुन्दर भावपूर्ण रचना के साथ आई ! मैं तो बस यहीं कहूंगा……….. “”फासले पर गाँव – कस्बे – राज्य होते ! दिल से दिल की दूरियां होती नहीं ! ये तो इक अनुभूति है, अहसास है ! चीज ऐसी, जो कभी खोती नहीं !”" उम्मीद है, अब आपके सान्निध्य का लाभ अनवरत प्राप्त होता रहेगा ! बॉस (आदरणीय राजकमल जी) पता नहीं कहाँ हैं ? उनकी कमी भी हमेशा खलती है ! सादर !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 14, 2013

    आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया सम्मोहक है कविवर ! आशुकवि हो तो आप जैसा, वरना न हो । बाँस की क्या बात की जाय, बरेलवी बाँस होता, तो तासीर भी नज़ाक़त वाली हो सकती थी । यह तो खालिस पंजाबी जट्टा बाँस है, जिसकी तासीर लट्ठमार और कुछ-कुछ एच1एन1 वाइरस से मिलती-जुलती है । स्वाइन-फ़्लू का प्रकोप जैसे-जैसे बढ़ेगा, इस ‘बाँस’ रूपी वाइरस के लक्षण भी प्रकट होंगे, ऐसी सम्भावना बनती है । आभार !

div81 के द्वारा
February 13, 2013

आदरणीय शाही जी, सादर नमस्कार सबसे पहले तो आप का मंच में स्वागत है, बहुत दिनों बाद वापसी हुई………… फासले मिट ही गए बहुत ही सुंदर प्रस्तुति… बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 13, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद दिव्या जी । प्रस्तुति चाहे जैसी हो, मेरा जो प्रमुख मक़सद था, यानि फ़ासले मिटाना, वह तो मुझे भी मिटता हुआ प्रतीत हो ही रहा है । आपलोगों के सानिध्य में गुज़रते पल मोल देकर नहीं खरीदे जा सकते । सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार ! (इस प्रस्तुति को होली मिलन की भूमिका समझें, उम्मीद है आपको याद होगा) ।

    divya (div 81) के द्वारा
    February 15, 2013

    आदरणीय शाही जी, होली मिलन कि भूमिका से कुछ खतरे कि बू आ रही है दाल कहीं पूरी काली तो नहीं …. बिलकुल सर बहुत अच्छे से याद है आप का आशीर्वाद भूल नहीं सकते :)

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    दाल काली नहीं मैडम, बिल्कुल येलो फ़्राइड है, वासन्ती सरसों के ताज़ा फ़ूलों के तड़के वाली । इस बार हम मूड में हैं और किसी को छोड़ने वाले नहीं हैं । होशियार … खबरदार …

nishamittal के द्वारा
February 13, 2013

आदरनीय शाही जी एक लंबे समय बाद आपकी रचना पढकर सुखद लगा.स्वागत . सोचा पहले कमेन्ट मैं ही दूं.इस विधा में पहली बार पढ़ा शायद आपको .रचना सुन्दर लगी पर पूरी नहीं समझ सकी क्योंकि उर्दू में मेरा शब्दकोश शून्य है.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 13, 2013

    मेरा आपसे भी ज़्यादा शून्य है निशा जी । तस्वीर के ऊपर कुछ लिखने की सूझी, बस रफ़्ते रवाना होता गया । अर्थ पूछेंगी तो पोल खुल जाएगी, इसलिये जो कुछ आपने समझा है, बस वही इसका अर्थ भी है । मुझे विगत दिनों दिये गए आपके आदेश का पालन करना था, उस लिहाज़ से कुछ बुरा तो नहीं ही होगा । प्रथम प्रतिक्रिया हेतु आभार !

    nishamittal के द्वारा
    February 14, 2013

    आपका उर्दू ज्ञान शून्य है ,ये अविश्वसनीय है शाही जी.चलिए जो भी आपने सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है आपके पास समय होने पर सीख लेंगें.आपने अनुरोध स्वेक्कारते हुए रचना प्रस्तुत की जानकार सुखद लगा. हाँ राजकमल जी के दुर्घटना ग्रस्त होने का समाचार जानकर दुःख हुआ.ये समाचार आपके माध्यम से ही प्राप्त हुआ.ईश्वर करे वो शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करें.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 15, 2013

    राम-राम, रब्ब झूठ न बुलवाए, मैंने राजकमल जी की नहीं, ‘बाँस’ रूपी ‘गुरुदेव’ के दुर्घटनाग्रस्त होने की बात की थी । कृपया भ्रमित न हों, अन्यथा अफ़वाह फ़ैलाने के ज़ुर्म में मुझे कहीं मानहानि का दावा न झेलना पड़ जाय । ‘गुरुदेव’ स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं, और जल्दी ही प्रकट होने की सम्भावना है । धन्यवाद !

    jlsingh के द्वारा
    February 15, 2013

    ‘गुरुदेव’ स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और ‘गुरुओं’ के ‘गुरु’ उन्हें स्वस्थ रहने के गुर सिखा रहे है! अब तो सरसों के खेत से ही स्वप्न सुन्दरी को ले प्रकट होंगे …शायद! होली के आगाज नजर आने लगे हैं! और फागुन में …….साष्टांग दंडवत महोदय!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    February 16, 2013

    माँ वाग्देवी के पूजन के पवित्र अनुष्ठान के साथ ही उन्होंने फ़ागुनी बयार को धीमे-धीमे अपनी गति में आ जाने का आदेश भी दे डाला है । अब जम्बूद्वीप के समस्त मानवों का दायित्व बनता है कि अपने-अपने स्तर से वसंतोत्सव को परवान चढ़ाने की दिशा में अग्रसर हों । आपके परमपूज्य 1008 चड्ढीधारी गुरुदेव के बिना कोई उत्सव रंगीन बन ही नहीं सकता, ऐसा देवाधिदेव महादेव ने लगभग उसी समय घोषित कर दिया था, जब उन्होंने सिद्धिविनायक गणपति के ‘प्रथम पूज्य’ होने की घोषणा की थी । अत: आप सभी चेले-चपाटियों का परम कर्त्तव्य बनता है कि, अपने चिरकुट-धारी गुरुदेव का विधि-विधान पूर्वक आवाह्न करें, और यथाशीघ्र उपस्थिति दर्ज़ कराने हेतु उन्हें हर प्रकार से बाध्य करें ।

आर.एन. शाही के द्वारा
March 7, 2013

इट्स ओके सर जी ।


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