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अभिव्यक्ति या अश्लीलता - Jagran Junction Forum

Posted On: 12 Mar, 2013 Others में

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एक तरफ़ जहाँ देश में स्कूली शिक्षा के स्तर पर छोटे-छोटे बच्चों को यौन शिक्षा देने का मन बनाया जा रहा हो, वहीं इस पर बहस के दौरान ही पटना आर्ट्स काँलेज में गोपाल शून्य नामक कला के विद्यार्थी को मात्र इस आधार पर फ़ेल कर दिया जाना कुछ समझ में नहीं आया, कि उसने अपनी महिला टीचर को असाइनमेंट के तहत कामसूत्र के लघुचित्र प्रस्तुत करने की ज़ुर्रत कर डाली । यदि कला के उस विद्यार्थी का कृत्य आपत्तिजनक मानकर काँलेज प्रबंधन द्वारा एकमत से उसे फ़ेल करने के निर्णय को न्यायोचित माना जाय, तो फ़िर इस प्रश्न का खड़ा होना स्वाभाविक और समयानुकूल ही कहा जाएगा, कि आखिर अपनी किस मानसिक परिपक्वता की बिना पर हम छोटे स्कूली बच्चों को यौनशिक्षा प्रदान करने की तैयारियाँ कर रहे हैं ?

पटना आर्ट्स काँलेज प्रकरण जो प्रकाश में आकर वहाँ बहस-बवाल का मुद्दा बना हुआ है, उसका सार-संक्षेप यह है कि पाठ्यक्रम के तहत क्लास में मांगे गए लघुचित्र-असाइनमेंट में गोपाल शून्य नामक आर्ट के विद्यार्थी द्वारा कामसूत्र पर आधारित कुछ चित्र बनाकर अपनी महिला शिक्षिका रीता शर्मा को दिया गया, जिसे शिक्षिका ने उसकी विकृत मानसिकता का परिचायक मानते हुए काँलेज प्रबंधन के पास विद्यार्थी गोपाल द्वारा जानबूझ कर यौन प्रताड़ना की मंशा से अश्लील चित्र प्रस्तुत किये जाने की शिकायत की । प्राचार्य चन्द्रभूषण श्रीवास्तव की अध्यक्षता में काँलेज प्रबंधन की हुई बैठक में विद्यार्थी के कृत्य को सर्वसम्मति से आपत्तिजनक क़रार देते हुए उसे फ़ेल कर दिया गया ।

विद्यार्थी का पक्ष है कि उसकी पढ़ाई का विषय चूँकि ‘कामुकता’ पर ही केंद्रित रहा है, अतएव उसे लघुचित्र में कामसूत्र को कला के रूप में शामिल करने में कुछ भी असामान्य नहीं लगा था । असाइनमेंट में किसी स्थापित शैली की प्रतिकृतियाँ ही बनानी होती हैं । इस महाविद्यालय में प्रथम वर्ष में ही ‘नग्नता’ विषय की पढ़ाई होती है, फ़िर कामसूत्र से जुड़े चित्र, जिन्हें मुगलकाल तक में आपत्तिजनक नहीं माना गया, अश्लील माने जाने का कोई औचित्य नहीं बनता । कामसूत्र को तो हमारी परम्पराओं में भी कला के रूप में मान्यता दी गई है, फ़िर कला सिखाने वाले महाविद्यालय को इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।

जबकि शिक्षिका एवं काँलेज प्रबन्धन का तर्क़ है कि इस काँलेज में लड़कियाँ भी पढ़ती हैं, अत: ऐसी विकृत मानसिकता को बढ़ावा देकर हम गलत उदाहरण प्रस्तुत करने का मौका किसी विद्यार्थी को नहीं दे सकते । सम्बन्धित विद्यार्थी विकृत मानसिकता का है । यदि कामकला परम्पराओं में है, तो गुरुशिष्य परम्परा भी हमारे देश की ही परम्परा है, जहाँ किसी शिष्य को अपने गुरु की भावनाओं एवं सम्मान का ध्यान रखते हुए ही अपना आचरण निश्चित करना चाहिये । बहरहाल, इस विवाद में गोपाल शून्य का पलड़ा काफ़ी हल्का है, क्योंकि काँलेज के अधिकांश विद्यार्थी भी सम्भवत: उसकी सोच से इत्तफ़ाक़ नहीं रखते, और विरोध में मुखर हो रहे हैं ।

अब फ़िर वही पेचीदा सवाल सामने खड़ा है, कि क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं । साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है ।

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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
March 24, 2013

बहुत दुखद है प्राचीन कला की नायब कृति को अश्लील मानना. मगर जैसी घटना का जिक्र आपने किया है इससे इस पर सवाल खड़े होना लाजमी है की यौन शिक्षा किस तरह दी जायेगी? सुन्दर आलेख आदरणीय शाही जी. 

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 25, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद श्रद्धेय अशोक जी ।

Santosh Kumar के द्वारा
March 19, 2013

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम नीर क्षीर करते आपके लेख और प्रबुद्धजनों के वार्तालाप को पढ़कर मूरख के लिखने को कुछ नहीं बचता है ,… यही कह सकता हूँ कि हम दोगले चक्रव्यूह में हैं ,…सरकार कब क्या किसके लिए करती सोचती है यह अनसुलझा प्रश्न नहीं लगता है ,….. विचारोत्तेजक लेख के लिए सादर अभिनन्दन वन्देमातरम !

Malik Parveen के द्वारा
March 19, 2013

आदरणीय शाही जी नमस्कार , क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं । साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है । आपने अच्छा प्रकाश डाला है इस मुद्दे पर … सादर धन्यवाद…

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 19, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद परवीन जी ।

abhishek shukla के द्वारा
March 18, 2013

श्रद्धेय शाही जी, आपका बहुत बहुत आभार, आपने बहुत सही कहा। वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है इसके लिए हम पाश्चात्य दर्शन या संस्कृति को उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते, अलग बात है ये उनकी संस्कृति का अन्धानुकरण है जो मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टिकोण से उचित नहीं है। दूसरों के अन्धानुकरण के प्रयास में हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं यह कहीं से भी सुखद भविष्य की ऒर इंगित नहीं करता। जिस अवस्था में हम धर्म सीखते हैं उसमे यदि सरकार ऐसी शिक्षा दिलाएगी तो भारत और भारतीयता दोनों ढूँढने से नहीं मिलेंगे।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 19, 2013

    श्रद्धेय शुक्ल जी, आप एक विचारक से लगते हैं, अत: आपकी इस हूबहू टिप्पणी का ठीक-ठीक अर्थ मैं आपकी अपनी पोस्ट पर भी नहीं निकाल पाया था । देशज शिल्प या कलाओं का पाश्चात्य संस्कृति से कोई लेना देना है नहीं, परन्तु आखिरी पंक्तियों में धर्म सीखने के आधार पर यदि आपका अभिप्राय यौनशिक्षा से है, तो आपकी बात अवश्य समझ में आती है । दरअसल धर्म के संस्कार तो हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म से सम्बन्धित हो, अपनी रगों में भरकर ही पैदा होता है । वैज्ञानिक भाषा में समझें तो अपने माता-पिता के धर्म वाले जीन उसके शरीर में स्वत: मौज़ूद होते हैं । शेष आदतों को भी उसके पारिवारिक संस्कार समयानुसार विकसित करते चले जाते हैं । बाद में जबतक वह बाहरी दुनिया के सम्पर्क में आता है, ये संस्कार अपनी जड़ें जमा चुके होते हैं, अत: बाहरी माहौल से ताउम्र उसके संस्कार इतने प्रभावित नहीं हो पाते कि उसमें कोई आमूलचूल जैसा परिवर्तन सम्भव हो पाए । हमारे संस्कारों का प्रस्तावित यौनशिक्षा से यहीं पर टकराव होना अवश्यम्भावी है, जिसे न तो हमारे बच्चों का, न ही उनके माता-पिता का जेनेटिक संस्कार सहज स्वीकार कर पाएगा । यौनक्रीड़ा एक सहज प्रवृत्ति है, कोई सिखाने की वस्तु नहीं है, हमारे मंदिरों पर उकेरे गए भित्ति-चित्र भी शायद यही संदेश देते से प्रतीत होते हैं । आपने सही कहा कि हम प्रारम्भिक अवस्था में ही अपना धर्म सीखते हैं । उसी क्रम में ही चारों पुरुषार्थों का जिक्र भी आता है । अर्थात बाल्य-किशोरावस्था में धर्म की दीक्षा, यौवन काल में पुरुषार्थ द्वारा अर्थोपार्जन एवं सुविधासम्पन्न होने के पश्चात काम की साधना कर सन्तानोत्पत्ति करते हुए सृष्टिचक्र को अपना योगदान । चौथा मोक्ष वानप्रस्थ आश्रम में ही सम्भव है, क्योंकि मुमुक्षत्व का बोध ध्यान के बिना सम्भव नहीं है । वानप्रस्थ से पूर्व की अवस्थाओं में हमारी प्रवृत्ति इतनी चंचल होती है कि हम ध्यान लगाकर मुमुक्षत्व की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते । चारों पुरुषार्थों को सिद्ध किये बिना मृत्यु को प्राप्त करने की स्थिति ‘अकालमृत्यु’ इसीलिये कही गई, क्योंकि इस स्थिति में मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो पाती । इस गहन विषय पर कभी बाद में आपसे चर्चा कर मुझे प्रसन्नता होगी । आभार ! 

jlsingh के द्वारा
March 18, 2013

आदरणीय शाही साहब, सादर अभिवादन! आपके इसी ब्लॉग को ‘क्या इस शिक्षा के लिए तैयार है हम ‘ को दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ में चाप गया है कृपया तसल्ली कर लें! सादर !

    jlsingh के द्वारा
    March 18, 2013

    कृपया ‘चाप गया’ को छापा गया है पढ़ें !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 18, 2013

    जागरण जंक्शन परिवार का यह सम्मान प्रदान करने हेतु हार्दिक आभार । साथ ही आप महोदय का भी जिनके द्वारा इस खबर को यहाँ चाँपने के कारण मुझे यह जानकारी प्राप्त हुई ।

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 18, 2013

    कृपया ‘चाँपने’ को ‘छापने’ पढ़ें । हा हा हा हा

yamunapathak के द्वारा
March 15, 2013

“साथ ही कामकला को स्थापत्य के माध्यम से विश्व भर में प्रतिष्ठित करने वाले हमारे खजुराहो, कोणार्क और चार धामों में से एक जगन्नाथपुरी के मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए भित्ति-चित्रों को भी हमें एक झटके से अश्लील क़रार देकर उनपर आवरण चढ़ाने पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है ।” आदरणीय शाही जी namaskaar आपके लेख की यह पंक्ति हुबहू मेरे ज़ेहन में उठे विचार से मिलती है. पूरा आलेख पढ़कर वाकया समझना आसान हुआ,आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ.उन शिक्षिका को खजुराहो जैसे पर्यटक स्थान पर भी जाने का फिर कोई हक नहीं बनता और मेडिकल के विद्यार्थी जब मृत शरीर की चीर फाड़ करते हैं तब भी क्या ऐसे ही सवाल उठेंगे मुश्किल तो यही है जहां प्रतिक्रियात्मक होना चाहिए वहां शिक्षक नहीं होते और जहां नहीं होना चाहिए वहां अतिप्रतिक्रियात्मक हो जा रहे हैं. इस मुद्दे पर लिख रही थी तब यही एक बात उठी की खजुराहो या इसी प्रकार के अन्य भित्ति चित्रों को भी कटघरे में ye बुद्धिजीवी वर्ग खडा ना कर दे. आपके सभी आलेख बहुत अच्छे होते हैं . एक अच्छे लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई साभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 16, 2013

    श्रद्धेया यमुना जी, आपका कथन पूर्णतया सत्य है कि हम अतिप्रतिक्रियात्मक होते जा रहे हैं । मुझे नहीं लगता कि यह सिर्फ़ शिक्षक समुदाय पर लागू होता है, बल्कि कहा जाय तो समाज में सहज प्रवृत्तियों से कट कर दूर होते जाने की एक छूत सी लग गई है । हमारी संवेदनशीलता अपना स्वरूप बदल कर निजी सोच के दायरे तक सिमटने लगी है । मामूली बातों में भी नकारात्मकता का बोध होने लगा है, क्योंकि कहीं न कहीं हर कोई खुद से ही क्षुब्ध है, जबकि कसर किसी और माध्यम से निकालना चाहता है । प्रबुद्ध प्रतिक्रिया हेतु आभार ।

bhagwanbabu के द्वारा
March 15, 2013

जिनकी मानसिकता विकृत हो जाती है… किसी विषय पर… उसे किसी के विकृत होने का इलजाम लगाकर खुद सुकून पाने का मौका मिल जाता है … यही किया है इस शिक्षिका ने… धन्यवाद …. http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/03/15/%E0%A4%A2%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%A2%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%81-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%B5%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81/

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 16, 2013

    ठीक कहा भगवान बाबू, चहुँओर विकृतियों के हाबी होने का काल है, संक्रमण का काल है, जिसकी मियाद ब्लैकहोल के आकार जैसी बढ़ती ही जा रही है । आभार !

alkargupta1 के द्वारा
March 14, 2013

आदरणीय शाही जी , सदर अभिवादन मेरी दृष्टि में तो सर्वप्रथम तो शिक्षिका को निष्पक्ष रूप से छात्र के द्वारा बनाये गए चित्रों का सही आकलन करना चाहिए था कि वे उनके मानदंडों के आधार पर सही है या नहीं …. और यदि उसकी दृष्टि में आपत्तिजनक थे भी तो उसे छात्र को अपने विश्वास में लेकर अपने स्तर परउसकी मानसिक स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए था न कि उसे फेल करके उसके भविष्य के साथ कोई खिलवाड़ क्योंकि जब शिक्षिका का तो विषय ही यही था इसलिए निसंकोच संवादों के माध्यम से समस्या को अपने स्तर पर ही सुलझा लेना चाहिए था ……….विचारणीय अर्थपूर्ण आलेख

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 15, 2013

    श्रद्धेया अलका जी, सार्थक प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार । यह बहस का विषय हो सकता है कि कामक्रिया पर आधारित हमारी परम्परागत धरोहरों को अश्लील होने के आधार पर कला माना जाना चाहिये, अथवा नहीं । परन्तु यह बहस गौण हो गई, और केंद्रबिन्दु बन गया विद्यार्थी के विरुद्ध काँलेज प्रबन्धन द्वारा लिया गया अन्यायपूर्ण निर्णय । विवाद का केंद्रबिन्दु भी यह कार्रवाई ही है । किसी भी समाज को यह नहीं भूलना चाहिये कि उसकी जीवन-पद्धति का मूल उसकी परम्पराओं में ही बसता है, जो कालजयी होता है । मसलन कोई हिन्दू भारतीय दम्पति चाहे किसी भी देश में जाकर बस जाय, उसके परिवार में सौ वर्ष बाद होने वाली संतान का नाम भी राम, श्याम, गुरमीत और सुरजीत आदि ही रखा जाएगा । जाँन, स्मिथ या अब्राहम नहीं । ऐसा ही कुछ हमारी परम्परागत शैली की कलाओं के साथ भी है । वे जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी । जब विदेशी आक्रांताओं द्वारा अनेक हमलों के बावज़ूद इन्हें समाप्त नहीं किया जा सका, तो ऐसे छोटे-मोटे प्रकरण तो सामने आते ही रहते हैं । धन्यवाद ।

अरुण कान्त शुक्ला के द्वारा
March 14, 2013

एक विचारोत्तेजक लेख के लिए धन्यवाद..| कुल मिलाकर भारतीयों के चरित्र में छिपे दोहरेपन का ही नमूना है ये| यौन शिक्षा कितना भला करेगी, ये तो वक्त ही बताएगा | उसकी उपादेयता पर विचार से पहले इस पहलू पे कोइ ध्यान नहीं दे रहा है की टीव्ही कल्चर तो दस-ग्यारह के बच्चे को ही पूरी शिक्षा दे दे रहे हैं| समाज के अग्रणी हिस्से के लिए सेक्स कभी समस्या नहीं रहा | और न ही उसे किसी शिक्षा की जरूरत रही है| उनके लिए वह हमेशा ही सेक्स आनन्द और उन्मांद रहा है और उनकी सोच में निचले तबके को उसकी पूर्ती करनी जरूरी है| हमारे देश के लोगों का दिखावटी चरित्र हमेशा ही नई पीढी के लिए परेशानी का सबब रहा है| यदि स्कूल को आपत्ति भी थी तो क्षात्र को समझाया जा सकता था , वनिस्पत फेल करने के,,

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 14, 2013

    सही कहा श्रद्धेय शुक्ल जी । मेरा मानना है कि यौनशिक्षा का शिगूफ़ा एक षड्यंत्र है, जिसके तहत भारतीय नौनिहालों को समय पूर्व ही मैच्योर्ड फ़ील कराकर उस रास्ते पर जाने के लिये बाध्य कर दिया जाय, जहाँ उन्हें नहीं जाना चाहिये । विदेशी कंडोम, वियाग्रा एवं ना-ना प्रकार के गर्भनिरोधक का बाज़ार विकसित कर मुनाफ़ा कमाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपना उत्पाद खपाने के लिये भारत की विशाल जनसंख्या वाले बाज़ार की हमेशा ही तलाश रही है । मानव एवं पशुओं में काल्पनिक बीमारियों का खौफ़ पैदा कर ये हर साल यहाँ दवाएँ बेचकर पहले से ही मालामाल हो ही रहे हैं । हमारा कमीशनखोर तंत्र इनकी मदद को हर वक़्त पलक पाँवड़े बिछाकर इनका इंतज़ार करता रहता है । छात्र का मामला तो सीधे-सीधे अहं के तुष्टिकरण हेतु तिल को ताड़ बनाने का मामला है, जो लज्जाजनक है । आभार !

yogi sarswat के द्वारा
March 14, 2013

अब फ़िर वही पेचीदा सवाल सामने खड़ा है, कि क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ? कला की डिग्रियाँ बाँटने वाले एक आधुनिक महाविद्यालय की शिक्षिका, जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से किसी अन्य विषय की बजाय एक ऐसे विषय को अपने कैरियर के रूप में चुना, जहाँ ‘नग्नता’ की पढ़ाई को सामान्य माना जाता है । परन्तु वह शिक्षिका महोदया व्यक्तिगत स्तर पर लालित्य से परिपूर्ण परम्परागत शैली में बनाई गई कामसूत्र की प्रतिकृतियों को असाइनमेंट के रूप में स्वीकार करना घोर आपत्तिजनक और अश्लील मानती हैं । जिस मानक के आधार पर गोपाल शून्य को फ़ेल किया गया है, यदि उसे अखिल भारतीय स्तर पर मान्यता दे दी जाय, तो कई परम्पराएँ खुद-ब-खुद ध्वस्त हो जाती हैं ।हम अपने अपने हिसाब से हर चीज की परिभाषा गढ़ लेते हैं ! मैं समझता हूँ की उस छात्र का इसमें कोई दोष नहीं है क्योंकि जो उसका विषय है उसमें उसे डीपली जाना ही चाहिए लेकिन अगर किसी को चित्र तक में कामुकता दिखती है तो फिर हम क्यों रजा रवि वर्मा को याद करते हैं ? क्यूँ फिर हम मकबूल फ़िदा हुसैन के लिए टेसुए बहाते हैं !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 14, 2013

    श्रद्धेय योगी जी, संयोग ही है कि जिन मक़बूल फ़िदा हुसैन के लिये टेसुए बहाने की आप बात कर रहे हैं, पटना आर्ट्स काँलेज के अथाँरिटिज के लिये वे एक सराहनीय व आदर्श चरित्र वाली शख्सियत हैं । वहाँ के अधिकारियों द्वारा ज़नाब हुसैन की इस बात के लिये तारीफ़ की गई है कि समाज द्वारा आपत्ति प्रकट करने पर अपना रास्ता बदल कर श्री हुसैन ने एक सराहनीय मिसाल पेश की, जबकि यह लड़का कुतर्कों का सहारा ले रहा है । अब इसे काँलेज प्रबन्धन का अहंकार नहीं तो और क्या कहेंगे, जिन्हें यह भी गवारा नहीं कि अपने कैरियर पर खतरा मँड़राता देख कोई छात्र अपनी सफ़ाई में कुछ कहने का भी साहस करे । धन्यवाद !

    nishamittal के द्वारा
    March 14, 2013

    क्या विरोधाभास है कालेज प्रबंधन के बयानों में ,यही तो दोहरी नीति है ,

manoranjanthakur के द्वारा
March 14, 2013

कम सब्दो में सम्पूर्ण मनोदसा का चित्रण …..बहुत बहुत बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 14, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद ठाकुर जी ।

Rachna Varma के द्वारा
March 13, 2013

आदरणीय शाही जी आपने सही कहा कि एक गुरु जब अपना विषय चुनता है तो उसे उस विषय कि सूक्ष्मता को स्वयं समझना चाहिए यह तो एक आर्ट कालेज के उच्च स्तर के विद्यार्थी के द्वारा बनायीं गयी कृति को जांचने का विषय मात्र था मै स्वयं माँ हो कर कभी -कभी अपने बच्चो के द्वारा पूछे गए प्रश्नों को सुन कर चौक जाती हूँ मगर उन्हें यथोचित उत्तर देना मेरा धर्म है इसलिए मुझे हर प्रश्न का उत्तर देना पड़ता है | धन्यवाद

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    आपने बिल्कुल सही कहा श्रद्धेया । किसी शिक्षक या शिक्षिका का सम्बन्ध अपने शिष्य से यदि भावनात्मक है, तो उसके किसी भी प्रयास को ममत्व के भाव से ही लेगा, न कि अतार्किक धृष्टता की नज़र से देखेगा । बात करें गुरु-शिष्य परम्परा की विशालताओं की, परन्तु सम्बन्धों में यदि कोई भावना झलके ही नहीं, तो शिष्य का हर कृत्य संदेहास्पद ही लगेगा । गुरु के स्थान पर बैठने वाले की दृष्टि में भी गुरुता होनी ही चाहिये । आभार !

rekhafbd के द्वारा
March 13, 2013

आदरणीय शाही जी ,आपने सही लिखा है कि क्या हमारा समाज खुद को मानसिक स्तर पर इस योग्य बना पाया है, कि अपने बच्चों को यौनशिक्षा दिला सके ?,सशक्त आलेख ,आभार

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    श्रद्धेया रेखा जी, यह अकेला प्रकरण ही यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त है कि हमारी मानसिक स्थिति अभी हमारे बच्चों के लिये ऐसी शिक्षा की वकालत नहीं कर पाएगी । बहुत-बहुत धन्यवाद ।

vinitashukla के द्वारा
March 13, 2013

आदरणीय शाही जी, प्रणाम. बरसों पहले, विदेशी आक्रान्ताओं की ‘कृपा’ से, हम अपनी मूल संस्कृति, अपनी मूल सभ्यता से कट चुके हैं. विदेशी शिक्षा प्रणाली, विदेशी रहन- सहन, हम पर थोपा गया- एक सुनियोजित षड्यंत्र की तरह. विदेशी फैक्ट्रियों में बने कपडों तथा विदेशी उत्पादों के प्रति झुकाव, गुलाम मानसिकता के तहत बढ़ता चला गया. फिरंगियों द्वारा ‘रायबहादुर’ बनाए गये महानुभावों और तत्कालीन उच्चवर्ग के परिवारों में, अपने बच्चों को ‘विलायत’ में पढ़ाने की होड़ लगी रहती थी. आज भी उसी मानसिकता के तहत देशवासी, ‘आयातित नग्नता’ को धड़ल्ले से अपना रहे हैं पर अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े भित्तिचित्र उन्हें आपत्तिजनक जान पड़ते हैं. यह दोगलापन किसलिए? दरअसल, हममें से ज्यादातर को यह ही नहीं मालूम कि उस युग में इनकी प्रासंगिकता क्या थी. वर्तमान और अतीत के नैतिक मानदंड, आपस में गड्डमड्ड होकर, दुविधा/ कुंठा का ही सृजन करेंगे. आपने सच कहा- शिक्षिका को यदि परम्पराओं की इतनी ही चिंता थी तो उसे पाठन हेतु ऐसा विषय चुनना ही नहीं चाहिए था और विद्यार्थी की मंशा जानकर ही, उस पर कोई एक्शन लिया जाना चाहिए. एक सार्थक, समसामयिक लेख पर हार्दिक साधुवाद. सादर.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    आपने अपनी बेबाक़ राय जाहिर करते हुए असली बात कह दी श्रद्धेया । छुद्र स्वार्थ के वशीभूत दोहरे मानदंड प्रदर्शित करना आज एक बेशर्म चलन सा बनता जा रहा है । सिद्धान्त और व्यवहार में अन्तर रखना एक फ़ैशन बन चुका है । सिद्धांतत: कला की शिक्षा में जो विषय काँलेज के लिये मान्य है, वही व्यवहार में इतना दकियानूसी बन जाय, तो निर्णय का विवादास्पद बनना स्वाभाविक है । आपकी विस्तृत राय के लिये साधुवाद ।

ajay के द्वारा
March 13, 2013

शाही जी सादर अभिवादन! अभिव्यक्ति या अश्लीलता मुद्दे पर एक मुद्दा छूट गया है वह यह कि यद्द्यपि छात्र का असाइनमेंट आपत्तिजनक और अश्लील था तथापि यह देखने वाली बात है कि उसकी रचनाएँ कला की तकनीकी दृष्टि से प्रशंसनीय हैं अथवा नहीं. अगर मानकों पर खरी हैं तो उसे फेल नहीं किया जा सकता. हाँ… यौन उत्पीडन का अभियोग अलग से अवश्य चलाया जा सकता है.

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    आपने सही कहा श्रद्धेय अजय जी । ऊपर श्रद्धेया विनीता जी की टिप्पणी भी कुछ ऐसा ही कहती प्रतीत होती है । यदि कामकला से जुड़े हमारे परम्परागत प्रतीक अश्लील नहीं हैं, तो फ़िर छात्र के लघुचित्रों को कला की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिये । आभार !

shashi bhushan के द्वारा
March 13, 2013

आदरणीय शाही जी, सादर ! गोपाल शून्य के तर्क को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए ! और उसे फेल तो हरगिज नहीं किया जाना चाहिए ! जहां तक बात यौन शिक्षा की है, तो वह तो सरासर मूर्खता की बात है ! जीवन में बहुत सी बातें उम्र, समय और परिस्थितियाँ सिखला देती हैं ! इनके लिए किसी स्कूल-कालेज की जरुरत नहीं पड़ती ! सादर !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    श्रद्धेय कविवर भूषण जी, चिन्ता छात्र के भविष्य की ही है । अन्यथा मंशा तो किसी की कुछ भी हो सकती है । क्या यह सम्भव नहीं कि शिक्षिका मैडम ने भी लड़के से कोई पुरानी खुंदक निकाली हो ? सभी वरिष्ठगण के बयान भी किसी न किसी पूर्वाग्रह की ओर संकेत करते से लगते हैं, जिसे न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता । आग्रह का प्रतिशोध अतार्किक तरीक़े से किसी छात्र के जीवन के साथ खिलवाड़ कर नहीं लिया जाना चाहिये । दूसरी बात कि आप अभी तक होलिया नहीं रहे हैं, तो यह भी हमारे लिये चिन्ता का एक सबब बना हुआ है । जवाहर भाई की आँखें पथरा गईं, परन्तु आपने बिरहिन की अब तक भी कोई सुध नहीं ली है । इतनी निष्ठुरता क्यों कविवर ? कहीं आपकी मस्ती में उस वर्ष जो मैंने साथ नहीं दिया था, उसका बदला तो शिक्षिका महोदया की तर्ज़ पर नहीं ले रहे ? भाई, उस वक़्त की मेरी मानसिकता को भी तो समझने का कष्ट कीजिये ! उसपर तुर्रे की तरह आपके वरिष्ठ नागरिक महोदय की ईशपुत्री उर्फ़ श्रद्धेया सरिता जी का अकारण मंच से बेमौसम रूठना अलग से खटक रहा है । सादर !

    jlsingh के द्वारा
    March 14, 2013

    श्रद्धेय शाही साहब, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम मैं भी अपना खुन्नस यही पर निकाल लूं! या कहूं कि आपने मेरी शिकायत कविवर और सरिता जी तक पहुँचाने का भरपूर प्रयास किया, जिसके लिए आपकी जितनी सराहना और आदर किया जाय, कम होगा! इसके बाद मै आपके और विनीता जी के विचारों के साथ पूर्ण सहमती रखता हूँ. छात्र को फेल तो कदापि नहीं किया जाना चाहिए. दूसरी सजा उसकी मानसिकता (attitude) के हिशाब से तय की जा सकती है! उपयुक्त विषय को मंच पर रखकर आपने श्रेयष्कर काम किया है, जैसा कि आप हमेशा से करते रहे हैं! हालाँकि मैं इस समाचार से बिलकुल ही अनभिग्य था. आभार और साधूवाद!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    प्रतिक्रिया के लिये आभार शालिनी जी । आपके प्रयासों को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता ।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 13, 2013

परम आदरणीय शाही सर जी सादर अभिवादन कबीर दास जी ने कहीं उल्लेख किया है दिन में जिन कार्यों का समाज के ठेकेदार विरोध करते हैं वही वे लोग रात में वेश्याओं के तलुए चाट ते हैं. क्या किया जा सकता है. लेख हेतु बधाई .

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    बात तो सोलह आने सच और खरी है सर जी । आभार !

Baijnath Pandey के द्वारा
March 12, 2013

परम आदरणीय श्री शाही जी, अभिवादन | न्याय चाहे जिस पलड़े मे भी हो, किन्तु यह बात साफ तौर पर स्पष्ट हो गयी है कि अभी हमारा समाज मानसिक स्तर पर पाठ्यक्रमों मे यौन संबंधी शिक्षा के लिए तैयार नहीं है | इस संबंध मे भारत सरकार की सहमति से यौनचरण की आयु सीमा घटाकर 16 वर्ष किए जाने का निर्णय भी विवादास्पद हो गया है क्योंकि शादी की न्यूनतम उम्र सीमा 18 वर्ष होने से समाज मे अराजकता फैलने एवं अवैध सम्बन्धों को बढ़ावा मिलने का खतरा मौजूद है | दूसरी बात यह भी है कि अगर छात्र ने जानबूझ कर शरारत की हो तो आखिर कौन सी मनोवृति उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है ? मेरा मतलब यह है कि उसे ऐसा संस्कार दिया किसने ? समाज ने अथवा उसके पाठ्यक्रम ने …

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 13, 2013

    बेशक उसके पाठ्यक्रम ने श्रद्धेय पांडेय जी । क्योंकि शरारत अपनी जगह होती है और कैरियर की गम्भीरता अपनी जगह । कोई वयस्क छात्र अपने कैरियर की कीमत पर ऐसी शरारत कदापि नहीं करना चाहेगा । क्योंकि असाइनमेंट मैटीरियल ऐसी वस्तु नहीं है जो अकेले शिक्षिका के स्तर तक ही सिमट कर रह जाने वाली हो । उसे फ़ैकल्टी के अन्य सदस्यों द्वारा देखा जाना भी सम्भावित है, तथा किसी भी स्तर पर सम्भावित विवादास्पद सामग्री के माध्यम से आग में हाथ डालना कोई लड़का चाहेगा, ऐसा मुझे नहीं लगता । वहाँ ‘न्यूडिटी’ को कला का दर्ज़ा प्राप्त है, तभी तो वह कालेज के पाठ्यक्रम में शामिल है ! और मेरा विचार है कि सह-शिक्षा वाले किसी आर्ट महाविद्यालय में यदि ‘नग्नता’ विषय को कला मानकर क्लास में उसपर व्याख्यान दिया जाना श्लीलता की श्रेणी में आता है, तो फ़िर कामसूत्र के लघुचित्र अश्लील क्यों मान लिये जाने चाहिये ? आपका कथन बिल्कुल सत्य है कि हमारा मानसिक स्तर अभी यौनशिक्षा जैसे विषय को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की इजाज़त नहीं दे पाएगा । धन्यवाद !

आर.एन. शाही के द्वारा
March 12, 2013

आपका तर्क़ उचित है निशा जी, और विद्यार्थी की मंशा शरारतपूर्ण होने से इन्कार नहीं किया जा सकता । परन्तु मामला किसी गली-मुहल्ले की बजाय एक आर्ट काँलेज और उसके विद्यार्थी के भविष्य से जुड़ा हुआ है, अत: कार्रवाई के औचित्य को तो सिद्ध करना ही पड़ेगा । इसका प्रमाण क्या हो सकता है कि विद्यार्थी की मंशा गलत या शरारतपूर्ण ही थी, जबकि उसके द्वारा चुना गया विषय इस देश की परम्पराओं के साथ जुड़ा हुआ है । उसे अपनी सफ़ाई का मौका दिये बिना बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया निर्णय भी पक्षपातपूर्ण ही कहा जाएगा ।

nishamittal के द्वारा
March 12, 2013

आदरनीय शाही जी,मंच पर  (सदा की भांति) एक सशक्त लेख के साथ आपकी उपस्थिति सुखद लगी. गत दिनों उपरोक्त विषय पर जो लेख लिखा था मैंने यही लिखना चाहा था कि समुचित वातावरण के अभाव में प्रदान की गई यौन शिक्षा अपराध तो नहीं रोक सकती हाँ परिपक्वता की स्थिति में इस शिक्षा से यौन रोगों पर नियंत्रण शायद लग सके ,अभी तक हमारे परिवारों में ये चर्चा ही नहीं होती तो यौन शिक्षा समाज कैसे स्वीकार कर सकता है अपरिपक्व आयु में . इस संदर्भ में हमारी  समृद्ध सांस्कृतिक विरासत विश्व प्रसिद्ध है.हाँ इस केस के विषय में समस्या attitude की भी हो सकती है विद्यार्थी ने संभवतः शिक्षिका को परेशान करने के लिए ऐसा किया हो और राजनीति के चलते मामला उछल गया हो

    आर.एन. शाही के द्वारा
    March 12, 2013

    उत्तर रिप्लाई के स्थान पर नहीं पोस्ट हो रहा है । इसे जाँच के लिये पुन: दे रहा हूँ ।


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