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माता मेरी पुन: बंदिनी

Posted On: 15 Aug, 2013 Others,social issues में

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MF-Hussain, Bharat Mata2_0

माता मेरी पुन: बंदिनी …

आज़ादी की साँस मिली थी, पल भर की मुस्कान लिये
बाल अरुण की आभा बिखरी जैसे नया विहान लिये
निकली जैसे सदा सुहागन, निज अपनी पहचान लिये
पूतों पर थी गर्व कर रही चौहद्दी का मान लिये
सिंह वाहिनी, हाथ तिरंगा, पथ प्रशस्त बढ़ चली गर्विणी …

नहीं जानती थी वो भोली ऐसे दिन भी आएंगे
जब उसकी संतानों के ही रक्त नीर बन जाएंगे
ज़ाफ़र मीर कोई उनमें, और कुछ जयचंद बन जाएंगे
अपनी माँ को ही राहों में, कर निर्वस्त्र घुमाएँगे
छाती पीट-पीट कर देखो बिलख रही वो राजनंदिनी …

बाट जोहती रोती जाती ज़ार-ज़ार वो लट खोले
सवा लाख से एक लड़ाने वाला कोई तो बोले
सवा सौ करोड़ पुत्र हों जिसके, बने नपुंसक से ढोले
मारो वो हुंकार कि अबकी थल काँपे, अम्बर डोले !
बना अभागा देश पुकारे, माता मेरी पुन: बंदिनी …

(चित्र गूगल इमेजेज़ से साभार)

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

आदरणीय शाही जी, सादर अभिनन्दन ! बाट जोहती रोती जाती ज़ार-ज़ार वो लट खोले ! सवा लाख से एक लड़ाने वाला कोई तो बोले ! बहुत सुन्दर और आज भी प्रासंगिक कविता ! मुझे लगता है कि भारत माँ जिस सपूत का सदियों से बाट जोह रही थी, वो उसे वर्तमान समय में मोदीजी के रूप में मिल गया है ! निश्चय ही भारत माता को अब सम्पूर्ण आजादी मिलेगी ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    January 9, 2015

    श्रद्धेय सद्गुरु जी, आपका कथन सत्य है । माता अब बन्दिनी नहीं रहेगी । आपको भी ढेर सारी बधाइयाँ ।

pkdubey के द्वारा
December 26, 2014

सादर साधुवाद आदरणीय ,गंभीर प्रश्न |

    आर.एन. शाही के द्वारा
    December 26, 2014

    दुबे जी जब यह कविता लिखी गई थी, तब भारत माता की स्थितियाँ कुछ और थीं । आज हम सब फख्र के साथ कह सकते हैं कि देश के सपूतों के ईमानदार प्रयास से माँ की बेड़ियाँ चटकने लगी हैं । दूर क्षितिज पर पौ फटने लगी है, नवबिहान का सुरमई उजाला अपनी दस्तक देने लगा है, माता की आँखों में नई उम्मीदों की किरण झिलमिलाने लगी है । यह नवजागरण की दस्तक है । माता अब बन्दिनी नहीं रहेगी । आत्मविश्वास से लबरेज उसकी अंगड़ाइयाँ तमस की जंज़ीरें तोड़कर अपना खोया गौरव हासिल करेगी । आभार !

Santlal Karun के द्वारा
December 16, 2013

आदरणीय शाही जी, बड़ा ही सधा हुआ, सार्थक और वर्तमान परिस्थितियों का राष्ट्रगीत आप ने प्रस्तुत किया है  — “नहीं जानती थी वो भोली ऐसे दिन भी आएंगे जब उसकी संतानों के ही रक्त नीर बन जाएंगे ज़ाफ़र मीर कोई उनमें, और कुछ जयचंद बन जाएंगे अपनी माँ को ही राहों में, कर निर्वस्त्र घुमाएँगे छाती पीट-पीट कर देखो बिलख रही वो राजनंदिनी” … हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

harirawat के द्वारा
December 16, 2013

दिल को छूने वाली , सुन्दर कविता – साधुवाद हरेन्द्र जागते रहो !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    December 16, 2013

    हार्दिक धन्यवाद हरेन्द्र जी ।

Sumit के द्वारा
August 20, 2013

बहुत ही सुंदर

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 22, 2013

    बहुत-बहुत धन्यवाद सुमित जी ।

yogi sarswat के द्वारा
August 19, 2013

नहीं जानती थी वो भोली ऐसे दिन भी आएंगे जब उसकी संतानों के ही रक्त नीर बन जाएंगे ज़ाफ़र मीर कोई उनमें, और कुछ जयचंद बन जाएंगे अपनी माँ को ही राहों में, कर निर्वस्त्र घुमाएँगे छाती पीट-पीट कर देखो बिलख रही वो राजनंदिनी … अति सुन्दर , हकीकत से रूबरू कराती एक बहुत सशक्त रचना !

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 22, 2013

    सार्थक प्रतिक्रिया हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद योगी जी ।

nishamittal के द्वारा
August 16, 2013

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना आदरनीय शाही जी

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 17, 2013

    श्रद्धेया निशा जी, हार्दिक धन्यवाद !

manoranjanthakur के द्वारा
August 16, 2013

आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन! बहुत दिनों के बाद …बहुत बधाई

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 17, 2013

    श्रद्धेय ठाकुर जी, पुराना घर ठहरा, राहों से गुज़रते थम कर देख लेने का लोभ संवरण नहीं होता । आभार !

jlsingh के द्वारा
August 15, 2013

आदरणीय शाही साहब, सादर अभिवादन! आपकी पंक्तियाँ अनमोल है! बाट जोहती रोती जाती ज़ार-ज़ार वो लट खोले सवा लाख से एक लड़ाने वाला कोई तो बोले सवा सौ करोड़ पुत्र हों जिसके, बने नपुंसक से ढोले मारो वो हुंकार कि अबकी थल काँपे, अम्बर डोले ! बना अभागा देश पुकारे, माता मेरी पुन: बंदिनी … वन्दे मातरम!

    आर.एन. शाही के द्वारा
    August 16, 2013

    वन्दे मातरम भाई जी । आभार !

meenakshi के द्वारा
August 15, 2013

शाही जी – देश की वर्तमान हालत का यथार्थ चित्रण किया है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
August 15, 2013

वह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    आर.एन. शाही के द्वारा
    December 26, 2014

    बहुत बहुत धन्यवाद रीता जी ।


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